धरती धोरां री : स्वर्ण नगरी जैसलमेर (तृतीय व अंतिम भाग) - Yatrafiber

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गुरुवार, 9 अप्रैल 2026

धरती धोरां री : स्वर्ण नगरी जैसलमेर (तृतीय व अंतिम भाग)

 


खम्मा घणी दोस्तों,

Yatrafiber के पिछले ब्लॉग में मैंने हमारी जैसलमेर यात्रा के द्वितीय दिवस के अनुभव साझां किए थे। आज के ब्लॉग में मैं यात्रा के तृतीय व अंतिम दिन के भ्रमण के बारे में बताना चाहूँगी।

सुबह कोहरे की संभावना को देखते हुए हम थोड़ा देर से उठे। लेकिन उठने पर पता चला कि कोहरा बिल्कुल नहीं था, बल्कि सुबह की गुनगुनी धूप खिलने लगी थी। बाहर धूप में बैठकर चाय का आनंद लेने के बाद हम स्नान कर तैयार हो गए और गर्मागर्म ब्रंच (नाश्ता+लंच) के मजे लिए। रात की ट्रेन से हमें वापस घर लौटना था, अतः हमने रिसोर्ट से चेक आउट किया, गाड़ी में समान रखा और पास के गाँव में एक बार फिर धोरों पर मस्ती करने पहुँच गए।

दूर-दूर तक फैले छोटे-बड़े टीलों का मनमोहक नजारा ही तो यहाँ प्रत्येक वर्ष इतने पर्यटकों को खींच लाता है। सड़क के एक तरफ बहुत से टेंट रिसॉर्ट्स बने हुए थे तो दूसरी ओर रेत के टीले फैले हुए थे। सड़क के किनारे बहुत से ऊँट तथा ऊँटगाड़ी जेड सफारी के लिए सजे-धजे तैयार खड़े हुए थे। हमने भी कैमलकार्ट सफारी का निर्णय लिया। पुराने समय में रेगिस्तान की रेतीली धरती पर ऊँटगाड़ी ही सफर का मुख्य साधन हुआ करती थी, परंतु वर्तमान में ऊँटगाड़ी परिवहन से ज्यादा मनोरंजन में काम आने लगी है। रेतीले टीलों पर ऊँटगाड़ी में बैठकर घूमने का भी अलग ही मजा है। रेतीले धोरों पर डगमग चलती ऊँटगाड़ी में बैठकर बचपन में अपने गाँव में ऊँटगाड़ी में किए जाने वाले सफर की यादें ताजा हो गईं। खेजड़ी के वृक्षों तथा कुछ झाड़ियों के झुरमुट के अलावा वहाँ और कोई वनस्पति दिखाई नहीं दे रही थी। बस शांत सुनहरे टीले ही अपनी खूबसूरती बिखेरते फैले हुए थे। बच्चों के लिए ऊँटगाड़ी में बैठना एक नया अनुभव था, अतः वे इसका पूरा आनंद उठा रहे थे।


 

कैमलकार्ट सफारी के बाद हमने रेतीले धोरों की यादों को तस्वीरों के जरिए कैमरे में उतारा। इसके बाद बच्चों के साथ हम भी बच्चे बन गए और टीलों पर बहुत मस्ती की। ऊँचे टीलों पर रेत पर फिसलते, दौड़ते, खेलते हुए सारा तनाव कहीं गायब सा हो जाता है। साथ ले गए हुए स्पीकर पर गाने बजाकर रेत पर सुकून से बैठना इतना अच्छा लग रहा था कि मन कर रहा था, जैसे ये वक्त यहीं ठहर जाए। बच्चों के लिए ऐसी साफ-सुंदर रेत पर खेलना, टीलों पर फिसलना और दौड़ते हुए पैरों के रेत में धँस जाने पर एक-दूसरे की मदद करते हुए वापस बाहर निकलना किसी एम्यूजमेंट पार्क (मनोरंजन पार्क) से भी कहीं अधिक मजेदार था। लगभग दो घंटे वहाँ बिताकर हम वापस चल दिए। आते समय हमने एक बार फिर जीप सफारी का आनंद लिया। टीलों पर जीप के रोमांचक सफर के बाद हम वापस सम के धोरों पर पहुँचे। ये रेतीली धरती बच्चों के साथ-साथ हमें भी इतनी रास आ रही थी कि सोचा चलते-चलते कुछ यादों के मोती और पिरो लेते हैं।

सम पहुँचते ही बच्चे एक बार फिर पैरासेलिंग के लिए मचल उठे। बच्चों को पैरासेलिंग करवाने के बाद वहीं एक छोटी सी टपरी पर हमने मैगी का लुत्फ उठाया। पहाड़ों वाली मैगी तो लोकप्रिय है ही, मगर धोरों वाली मैगी भी कम नहीं है। बालू रेत के टीलों के बीच खाट पर बैठकर देशी अंदाज में मैगी खाकर तो मजा ही आ गया। इसके बाद बच्चों ने वापस ऊँट की मजेदार सवारी की और फिर हम धोरों से विदा लेते हुए जैसलमेर के लिए रवाना हो गए।

जैसलमेर पहुँचकर हमने गड़ीसर झील देखने का निर्णय लिया। जैसलमेर की प्रसिद्ध झील गड़ीसर एक कृत्रिम झील है, जिसका निर्माण राजा राव जैसल ने 1156 ईस्वी में करवाया था। 14वीं शताब्दी में महारावल गड़सी सिंह ने इसका पुनर्गठन करवाया था और उन्हीं के नाम पर इसे गड़ीसर झील कहा जाता है। सन् 1965 तक भी जैसलमेर में जलापूर्ति का मुख्य साधन गड़ीसर झील ही थी। वर्तमान में इंदिरा गाँधी नहर से गड़ीसर झील में जल आता है, जिसके करण यह कभी भी सूखती नहीं है।

गड़ीसर झील का प्रवेश द्वार स्थानीय पीले पत्थरों से बनवाया गया है। जाली-झरोखों व छतरियों वाला यह भवननुमा प्रवेश द्वार दो मंजिला है। स्थापत्य कला तथा वास्तुकला का सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करते इस प्रवेश द्वार को टीलों की पोल के नाम से जाना जाता है, क्योंकि कहा जाता है कि इसका निर्माण टीलों नाम की एक परोपकारी गणिका ने करवाया था। प्राचीन समय में यह प्रवेश द्वार साधु-संतों व यात्रियों के ठहरने था विश्रामस्थल के रूप में काम आता था।

गड़ीसर झील के चारों ओर बहुत ही सुंदर घाट, छतरियाँ, मंदिर तथा बाग-बगीचे बने हुए हैं, जो इसकी सुंदरता में चार चाँद लगा देते हैं। स्थानीय पीले पत्थरों से निर्मित सुंदर छतरियाँ कला का उत्कृष्ट नमूना हैं। ना केवल घाटों पर बल्कि झील के बीच-बीच में भी ऐसी सुंदर छतरियाँ बनी हुई हैं।


 गड़ीसर झील में नौकायन भी किया जा सकता है। नौकायन करते हुए गड़ीसर झील की खूबसूरती को निहारने के साथ-साथ हमने काफी सारी तस्वीरें भी लीं। नौकायन करते समय शाम भी होने लगी थी। शाम के समय गड़ीसर झील का नयनाभिराम दृश्य देखने लायक होता है। सूर्य की किरणों से झील के पानी के साथ-साथ पीले पत्थरों से बने घाट और छतरियाँ भी सुनहरी आभा बिखेरते हुए पर्यटकों को मोहपाश में बाँध लेते हैं। मन मोह लेने वाले ऐसे वातावरण में तो घंटों बैठे रहा जा सकता है। प्रकृति की खूबसूरती में खोकर चित्त शांत हो जाता है। सर्दियों के समय गड़ीसर झील में बहुत से प्रवासी पक्षी भी आते हैं। अतः यहाँ आकर बर्ड-वॉचिंग भी की जा सकती है। विशेषकर सुबह व शाम के समय तो झील के आसपास पक्षियों की अठखेलियाँ देखने लायक होती हैं।

नौकायन कर कब हम बाहर निकलने लगे तो हमारी मुलाकात गोल्डन मैन से हुई। उन्होंने अपने कपड़ों से लेकर सम्पूर्ण शरीर पर सुनहरा रंग करवा रखा था। वे घंटों तक बिना हिले-डुले स्थिर खड़े रह सकते हैं, तभी एकदम से उन्हें देखकर पता ही नहीं चलता की वह मूर्ति है या कोई सजीव व्यक्ति। बच्चे तो उन्हें बोलते देख चौंक ही गए थे कि यह मूर्ति कैसे बोलने लग गई।

गड़ीसर झील के पास पूरा बाजार सजा हुआ है, जहाँ बहुत सी कलात्मक वस्तुएँ मिलती हैं। आसपास कई रेस्तरां, चाय-कॉफी व जूस की दुकानें भी स्थित हैं। देशी-विदेशी पर्यटकों की अच्छीखासी भीड़ से गड़ीसर झील गुलजार हो रही थी।

गड़ीसर झील के बाद हम वहाँ से लगभग 1.5 किलोमीटर दूर स्थित जैसलमेर का किला देखने पहुँचे। स्थानीय पीले बलुआ पत्थरों से निर्मित जैसलमेर के किले पर जब सूर्य-रश्मियाँ पड़ती हैं, तब यह बालू रेत के साथ एकाकार होता हुआ सोने सा चमकने लगता है। यही कारण है कि जैसलमेर के किले को ‘स्वर्ण किला’ या ‘सोनार किला’ भी कहा जाता है। जैसलमेर के इस स्वर्ण दुर्ग का निर्माण राजा राव जैसल ने 1156 ईस्वी में त्रिकूट पहाड़ी पर 250 फीट ऊँचाई पर करवाया था। त्रिकूट पहाड़ी पर स्थित होने के कारण इसे त्रिकूटगढ़ के नाम से भी जाना जाता है। यह भव्य किला राजस्थान के जीवित किलों में से एक है, क्योंकि इसमें आज भी जैसलमेर की काफी आबादी निवास करती है। जैसलमेर के किले के चार पोल (प्रवेश द्वार) हैं, जिन्हें अखाई पोल, गणेश पोल, सूरज पोल तथा हवा पोल के नाम से जाना जाता है। किले की मजबूत दीवार तीन परतों वाली है तथा इसमें 99 बुर्जों का निर्माण करवाया गया है। राजपूत-इस्लामी वास्तुकला पर आधारित यह स्वर्ण किला स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण है। विदेशी पर्यटकों को कला के ऐसे बेजोड़ नमूने बेहद आकर्षित करते हैं। किले के अंदर महारावल महल, जवाहर महल, चामुण्डा देवी मंदिर, लक्ष्मीनाथ मंदिर, जैन मंदिर जैसी बहुत सी इमारतें स्थित हैं। किले में पुराने समय की तोप भी रखी हुई है, जिसके साथ लोग तस्वीरें खिंचवाना पसंद करते हैं। किले की ऊँचाई से जैसलमेर शहर का शानदार नजारा दिखाई देता है। जैसलमेर की शान इस स्वर्ण किले को सन् 2013 में यूनेस्को के विश्व धरोहर स्थलों में शामिल किया गया है।



जैसलमेर के किले में बहुत सी फिल्मों की शूटिंग भी की गई है। इस किले में बाजार भी स्थित है, जहाँ पर स्थानीय लोगों द्वारा तैयार की गई बहुत सी कलात्मक वस्तुएँ मिलती हैं। देशी-विदेशी पर्यटक जैसलमेर की यादों के रूप में चाव से इन वस्तुओं की खरीददारी करते हुए देखे जा सकते हैं।

किले का भ्रमण करने के बाद हमने एक रेस्तरां में रात्रि-भोजन किया और फिर जैसलमेर रेलवे स्टेशन की ओर चल दिए, जहाँ से हमें निज निवास के लिए ट्रेन पकड़नी थी।

रेतीले धोरों की मस्ती, खेलों का रोमांच, मंदिरों की आस्था, बॉर्डर पर हिंदुस्तानी फौज की वीरता, किलों व हवेलियों की भव्यता, अनूठी कला व संस्कृति, सुस्वाद रेगिस्तानी व्यंजन आदि सभी का संगम जैसलमेर यात्रा के दौरान पर्यटकों को इतना लुभाता है कि वहाँ से वापस आने का मन ही नहीं होता। अगर आप भी भ्रमण के शौकीन हैं तो कुदरत की इस अनोखी खूबसूरती यानि कि रेगिस्तानी धरती पर एक बार आना तो बनता ही है।


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