धरती धोरां री : स्वर्ण नगरी जैसलमेर (द्वितीय भाग) - Yatrafiber

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सोमवार, 9 फ़रवरी 2026

धरती धोरां री : स्वर्ण नगरी जैसलमेर (द्वितीय भाग)

 खम्मा घणी प्रिय पाठकों,

Yatrafiber के पिछले ब्लॉग में मैंने हमारी जैसलमेर यात्रा के प्रथम दिवस के अनुभव साझां किए थे। आज के ब्लॉग में मैं दूसरे दिन के भ्रमण के बारे में बताना चाहूँगी।

दूसरे दिन सुबह 6 बजे उठकर टेंट से बाहर झाँका तो देखा सब तरफ घना कोहरा छा रहा था। 10 मीटर की दूरी पर भी कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। इतनी ठण्ड और कोहरे के बावजूद भी रिसोर्ट की तरफ से बिल्कुल समय पर गर्म पानी और चाय की व्यवस्था उपलब्ध करवा दी गई। चाय की चुस्कियों का आनंद लेते हुए हम फिर से बिस्तर में दुबक गए। लगभग 2 घंटे बाद कोहरा छँट गया और धूप खिल गई, जिसकी हमें बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी। नहाकर तैयार होने के बाद हमने स्वादिष्ट ब्रंच का आनंद लिया और फिर घूमने के लिए गाड़ी बुलवा ली।

जैसलमेर यात्रा के दूसरे दिन हम तनोट माता के दर्शन के लिए रवाना हुए। सड़क के दोनों ओर दूर-दूर तक फैली स्वर्णिम आभायुक्त बालू रेत के दृश्य सफर को खूबसूरत बना रहे थे। जैसलमेर विंड पार्क भारत के सबसे बड़े पावन ऊर्जा संयंत्रों में से एक है। इस विंड पार्क का एक हिस्सा सम से तनोट माता जाते हुए रास्ते में देखने को मिलता है। बड़े-बड़े पंखों वाली ये पवन चक्कियाँ दूर से ही दिखाई देने लगती हैं। रेगिस्तानी परिदृश्य के बीच-बीच में दूर-दूर तक दिखने वाली ये पवन चक्कियाँ पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र हैं। हमारे बच्चे भी पवन चक्कियों को देखते ही उनके बारे में जिज्ञासा प्रकट करने लगे तो हमने भी उन्हें पवन चक्कियों के महत्त्व के बारे में जानकारी दी और एक जगह रूककर उन्हें पास से भी पवन चक्कियाँ दिखाईं। साथ ही हमने पवन चक्कियों के साथ खूबसूरत तस्वीरें भी लीं। इसके बाद हम आगे के सफर पर चल दिए।

रेगिस्तान भी किसी हरियाली से लदे क्षेत्र जितना ही खूबसूरत हो सकता है, यह बात रेतीले टीलों के बीच से गुजरती सड़क पर सफर करते हुए हर पल महसूस होती है। रास्ते में कोई भीड़भाड़, कोई शोरगुल नहीं होता, बस होते हैं दूर-दूर तक फैले थार मरुस्थल के सौंदर्य से भरपूर नजारे। आपाधापी वाली जिंदगी से कुछ पल चुराकर ऐसे मनोरम सफर पर आखिर कौन नहीं जाना चाहेगा? रास्ते में एक जगह हमें बड़े-बड़े रेतीले टीले दिखाई दिए, जो कि सम सैंड ड्यून्स जैसे ही सुंदर थे और वहाँ भी कैमल सफारी हो रही थी। हम भी वहाँ रुक गए और बालू रेत पर बैठकर बातें करते हुए बच्चों को मस्ती करते हुए देखते रहे।

कुछ देर बाद दो बच्चे हमारे पास अपने सुंदर सजेधजे ऊँट को लेकर आए और कहने लगे कि क्या आप हमारे शेरसिंह की सवारी करेंगे? जी हाँ दोस्तों, उन्होंने अपने ऊँट का नाम शेरसिंह रखा हुआ था और उनका शेरसिंह था भी बड़ा समझदार। वो उन बच्चों की हर बात, हर इशारे को तुरंत समझकर उसी अनुसार प्रतिक्रिया दे रहा था। हमारे बच्चे भी कैमल सफारी के लिए मचल उठे तो हमने सबसे पहले तो ऊँट पर बैठकर खूब सारी तस्वीरें लीं और फिर ‘रेगिस्तान के जहाज’ ऊँट की मजेदार सवारी का आनंद लिया। बैठे हुए ऊँट पर सवार होने के बाद जब वह खड़ा होता है, तभी से भय मिश्रित रोमांच प्रारम्भ हो जाता है। ऊँचे-नीचे टीलों पर दौड़कर चढ़ते-उतरते ऊँट की सवारी करने में मजा तो बहुत आता है, लेकिन कहीं ना कहीं गिरने का बाह्य भी हाथों की पकड़ को बार-बार मजबूत करने का इशारा करता रहता है। बच्चे तो ऊँट पर बैठकर इतने आल्हादित थे कि उन्होंने कैमल सफारी दो बार की।

कैमल सफारी के बाद वहीं से हमने एक थार बुक की और आस-पास के इलाकों की सैर के लिए जीप सफारी पर चल दिए। रेतीले टीलों पर जीप सफारी करना बेहद रोमांचक अनुभव है। जीप सफारी के दौरान हमने भारतीय सेना के बंकर भी देखे। लोहे से बने इन बंकरों का उपयोग सेना के जवानों द्वारा भारत-पाक युद्ध के दौरान अपनी सुरक्षा के लिए किया गया था।

वहाँ से आगे चलकर हमने वो कुआँ, मंदिर तथा रेत के टीले देखे, जहाँ बॉर्डर फिल्म की शूटिंग की गई थी। एक सुंदर से रेत के टीले पर कुछ देर बैठकर हमने गप्पे मारे तो बच्चों को भी वहाँ खेलने का मौका मिल गया। वे दोनों कभी टीले से नीचे फिसलते तो कभी दौड़कर वापस टीले पर चढ़ते और कभी तो नाचने लगते। जीप सफारी करते हुए हमने टीलों के बीच बसा रेगिस्तानी गाँव भी देखा। गाँव के आसपास पानी की उपलब्धि के कारण कुछ हरियाली भी थी, अन्यथा वहाँ दूर-दूर तक खेजड़ी के वृक्षों तथा मरुस्थली झाड़ियों के अलावा कोई हरियाली दिखाई नहीं देती। वर्षा की अत्यधिक कमी के कारण वहाँ खेती भी नाममात्र की ही होती है।




वापस आते समय ऊँचे टीलों से तेजी से नीचे उतरती जीप में खड़े होकर हूटिंग करने में बहुत मजे आए। टीलों की ढलान पर दौड़ती जीप में जहाँ रोमांच से हमारे रोंगटे खड़े हो रहे थे, वहीं जीप ड्राइवर एकदम बेफिक्र मुस्कुराते हुए जीप चला रहे थे, उनके लिए धोरों में जीप दौड़ाना बस बाएँ हाथ का खेल था। यहाँ जीप सफारी के लिए हमने 3000 रुपये खर्च किए और हमें सफारी पूरी पैसा वसूल लगी। सफारी के बाद हम वापस अपनी गाड़ी में सवार हुए और अगली मंजिल की तरफ चल दिए।


तनोट माता मंदिर से लगभग 5 किलोमीटर पहले मुख्य रास्ते पर ही घंटियाली माता का मंदिर स्थित है। घंटियाली माता को तनोट माता की ही छोटी बहन माना जाता है। यह भी एक चमत्कारी देवस्थान है। मंदिर के अंदर घंटियाली माता की प्राचीन कहानी लिखी हुई है। सन् 1965 में भारत-पाक युद्ध के समय पाकिस्तानी सैनिकों ने इस मंदिर में घुसकर मूर्तियाँ खंडित कर दीं थी। मंदिर में उन मूर्तियों के अवशेष अभी भी रखे हुए हैं। लोगों का कहना है कि उस समय माताजी के चमत्कार से पाकिस्तानी सैनिक अंधे हो गए थे और एक-दूसरे को ही अपना दुश्मन समझ बैठे थे तथा आपस में लड़कर मर गए थे। भारतीय सैनिकों के लिए यह स्थल श्रद्धा का केन्द्र है। यहाँ माताजी की सेवा-पूजा तथा मंदिर की देखभाल का जिम्मा भी BSF (सीमा सुरक्षा बल) का ही है। मंदिर का पुजारी भी सेना का जवान ही होता है। मंदिर साफ-सुथरा तथा सुरम्य वातावरण वाला है। हमने भी माँ घंटियाली के दर्शन किए, प्रसाद ग्रहण किया और फिर तनोट माता के लिए रवाना हो गए।

घंटियाली माता mandir
                        (घंटियाली माता मंदिर )

कुछ देर बाद हम तनोट माता के मंदिर पहुँच गए। तनोट माता को हिंगलाज माता का ही रूप माना जाता है। तनोट माता ‘थार की वैष्णो माता’ के नाम से भी प्रसिद्ध है। यह स्थान जैसलमेर से 120 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। मंदिर में तनोट माता मंदिर का संपूर्ण इतिहास लिखा हुआ है, जिसके अनुसार तनोट के अंतिम राजा भाटी तनुराव जी ने वि॰ सं॰ 847 में तनोटगढ़ की नींव रखी तथा मंदिर का निर्माण करवाया।



सन् 1965 में भारत-पाक युद्ध के दौरान पाकिस्तान ने लगभग 3000 बम गिराए थे, जिनमें से लगभग 400 बम इस मंदिर की परिसर में गिरे थे, लेकिन चमत्कारिक रूप से उनमें से एक भी बम नहीं फटा तथा मंदिर को क्षणिक भी नुकसान नहीं पहुँचा। तब से तनोट माता भारतीय सैनिकों के लिए विशेष रूप से श्रद्धा का केंद्र है। तनोट माता को ‘सैनिकों की देवी’ भी कहा जाता है। युद्ध के दौरान गिरे कुछ बम आज भी मंदिर में रखे हुए हैं। यहाँ मंदिर परिसर की देखभाल तथा माता जी की सेवा-पूजा का दायित्व भी BSF (सीमा सुरक्षा बल) ने ही संभाल रखा है। मंदिर में पुजारी भी सेना का जवान ही होता है।

सन् 1965 के भारत-पाक युद्ध में हार के बाद तनोट माता के चमत्कार को स्वीकार करते हुए पाकिस्तानी ब्रिगेडियर शाहनवाज खान ने मंदिर में चाँदी के छत्र भेंट किए थे, जिन्हें मंदिर में देखा जा सकता है। युद्ध से जुड़ी तस्वीरों को भी स्मृति चिह्नों के रूप में मंदिर में प्रदर्शित किया हुआ है।


स्थानीय लोगों की दृढ़ मान्यता है कि माँ तनोट उनकी तथा भारतीय सीमा की शत्रुओं से रक्षा करती है, अतः उनकी तनोट माता में गहरी श्रद्धा है। लोगों का मानना है कि यहाँ सच्चे मन से की जाने वाली सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। मनोकामना पूर्ति हेतु मंदिर परिसर में रूमाल बाँधने की भी परम्परा है, अतः तनोट माता को ‘रूमाली देवी’ के नाम से भी जाना जाता है। मंदिर परिसर में ही एक काफी गहरा प्राचीन कुआ भी है, जिसे जाल से ढका गया है। वर्दीधारी BSF के जवानों को मंदिर के दायित्व निभाते हुए देखना एक अनोखा अनुभव है।


मंदिर का परिसर काफी बड़ा, शांत और सुंदर है। परिसर में ही एक ऑडियो विजुअल हॉल भी है, जहाँ भारतीय सेना की वीरता से जुड़ी डॉक्यूमेंट्री दिखाई जाती है। डॉक्यूमेंट्री देखते समय सेना के जवानों की देशभक्ति तथा बहादुरी के किस्से जानकर मन उनके प्रति नतमस्तक हो उठता है।


दर्शन के पश्चात् हमने मंदिर के बाहर स्थित एक रेस्तरां पर गर्मागर्म मैगी का आनंद लिया और फिर भारत-पाक बॉर्डर की तरफ रवाना हो गए। बॉर्डर पर जाने के लिए पहले अनुमति लेनी पड़ती है, जो कि तनोट माता मंदिर से ली जा सकती है। आगे चेक पोस्ट पर अनुमति-पत्र दिखाना पड़ता है, उसके बाद ही आगे जा सकते हैं। रास्ते में हर जगह बालू रेत के टीलोंयुक्त कमाल के नजारे देखने को मिल रहे थे।


बॉर्डर पर वेलकम टू इंडो-पाक बॉर्डर लिखा हुआ बड़ा सा गेट बनाया गया है, जहाँ लोग तस्वीरें ले रहे थे। वहीं पास ही एक ऊँचा मचान बना हुआ है, जहाँ से भारत-पाकिस्तान का बॉर्डर देखा जा सकता है। पूरे बॉर्डर पर तारबंदी की हुई है तथा एक गेट भी लगा हुआ है। लोगों को मचान वाली जगह से आगे जाने की अनुमति नहीं है। तारबंदी से आगे पाकिस्तान का क्षेत्र दिखाई देता है। बॉर्डर पर तिरंगा लगा हुआ है, जो शान से लहराता रहता है। पास में ही एक छोटा सा पार्क भी है, जहाँ बच्चों के लिए झूले लगे हुए हैं । थोड़ी देर वहाँ रूककर हम लोंगेवाला वॉर मेमोरियल के लिए निकल गए।



भारत-पाक बॉर्डर से लगभग 57 किलोमीटर की दूरी पर लोंगेवाला वॉर मेमोरियल बना हुआ है। यह मेमोरियल उसी पवित्र भूमि पर बना हुआ है, भारत-पाक युद्ध के समय भारत माँ के वीर सपूतों ने अपनी बहादुरी से दुश्मन देश के छक्के छुटा दिए थे। वॉर मेमोरियल में भारतीय सेना के हथियार, टैंकर, वायु सेना के विमान, तोप आदि सब प्रदर्शन हेतु रखे गए हैं। युद्ध में शहीद हुए सैनिकों की प्रतिमाएँ तथा उनकी वीरता की गाथाएँ भी यहाँ लिखी हुई हैं। सन् 1965 तथा सन् 1971 में हुए भारत-पाक युद्ध के बारे में यहाँ आकर काफी कुछ जाना जा सकता है।






युद्ध में देश को सर्वोपरी मानते हुए अदम्य साहस का परिचय देने वाली भारतीय सेना व सैनिकों का संपूर्ण इतिहास वॉर मेमोरियल में मॉडल्स, तस्वीरों तथा स्मृति चिह्नों के माध्यम से दर्शाया गया है।





सन् 1971 के युद्ध में पाकिस्तान के 3000 सैनिकों ने जब गोला-बारूद, हथियारों, तोपों तथा टैंकरों से लैस होकर अचानक से यहाँ हमला किया तो लोंगेवाला पोस्ट पर मेजर कुलदीप चाँदपुरी की अगुवाई में मात्र 120 भारतीय जवानों ने अपनी बेमिसाल वीरता का प्रदर्शन करते हुए पाकिस्तानी सेना को धूल चटा दी। पाकिस्तानी सैनिक अपने टैंकरों के साथ-साथ अपने घायल साथियों को भी यहीं छोड़कर पीठ दिखाते हुए भाग खड़े हुए। ऐसे पाकिस्तानी टैंकर भी यहाँ प्रदर्शन के लिए रखे गए हैं, जो कि भारतीय सेना की बहादुरी के किस्से स्वयं बयां कर रहे हैं।

        (सन् 1971 के युद्ध में जब्त किया गया पाकिस्तानी टैंक)

यहाँ एक कुआँ भी स्थित है। सन् 1971 के युद्ध तक यह कुआँ ही आसपास के गाँवों में जलापूर्ति का एकमात्र साधन था। परंतु जब पाकिस्तानी सेना हारने लगी तो जाते-जाते इस कुएँ का पानी भी जहरीला कर गई। बाद में सरकार ने इसे साफ भी करवाया पर ग्रामीणों ने फिर इस कुएँ के पानी का उपयोग कभी नहीं किया। यहाँ एक छोटा सा कैफे भी स्थित है, जिसे इस बॉर्डर पर भारत का अंतिम कैफे कहा जा सकता है। लोंगेवाला वॉर मेमोरियल का भ्रमण करते समय हर क्षण मन देशभक्ति की भावना से भरा हुआ होता है। यहाँ की हर एक वस्तु हमें अपने देश तथा देश की शक्तिशाली सेना पर गर्व महसूस करवाती है।

शाम का समय हो रहा था तो लोंगेवाला वॉर मेमोरियल से ही हमने रेगिस्तान में सूर्यास्त का खूबसूरत नजारा देखा। सूरज पीले से लाल होता हुआ मानो सुनहरे रेतीले समुद्र में समा रहा था। सूर्यास्त के साथ ही हम वापस अपने रिसोर्ट की ओर लौट चले। रास्ते में हमने बहुत से हिरण, नीलगाय, तीतर, लोमड़ी जैसे रेगिस्तानी जीव भी देखे। पूरे दिन घूमकर हम सब बहुत थक गए थे, अतः रिसोर्ट पहुँचते ही हमने रात्रिभोज लिया और सोने चले गए।

                                                                                                                  क्रमशः……………

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