खम्मा घणी प्रिय पाठकों,
‘अतिथि देवो भव:’ वाली संस्कृति से परिपूर्ण राजस्थान की स्वर्ण नगरी जैसलमेर की धोरों वाली धरती ना केवल देशी पर्यटकों अपितु विदेशी मेहमानों को भी अपने आकर्षण में बाँधने में सफल रही है। अपने शाही किले, शानदार नक्काशी वाली हवेलियों, रेतीले टीलों, ठेठ देशी खानपान, पहनावे और संस्कृति से विशेष पहचान बनाने वाले जैसलमेर की यात्रा का अनुभव मैं आज के Yatrafber के ब्लॉग में बाँटना चाहूँगी।
जैसलमेर सड़क, रेल तथा वायुमार्ग द्वारा कई बड़े शहरों से जुड़ा हुआ है। पर्यटक अपनी सुविधानुसार किसी भी मार्ग का चयन कर सकते हैं। हमने अपने मित्र परिवार के साथ अपनी यात्रा की शुरुआत अपने निवास स्थान जयपुर से शाम 4:30 बजे ‘लीलण एक्सप्रेस’ से की। हमारे साथ हमारी 5 वर्षीय पुत्री तथा मित्र परिवार के साथ उनका 5 वर्षीय पुत्र, दोनों ही बच्चे जैसलमेर यात्रा के लिए विशेष रूप से अति उत्साहित थे और ट्रेन में बैठते ही अपनी योजनाएँ बनाने में लगे हुए थे कि जैसलमेर पहुँचकर वहाँ वे लोग क्या-क्या करेंगे।
ट्रेन और भूख का ऐसा अनोखा रिश्ता है कि ट्रेन में बैठकर भोजन करना किसी बड़े से बड़े रेस्तरां में बैठकर भोजन करने से भी कहीं अधिक मजेदार होता है। रात होने पर हमने भी अपने टिफिन निकाले और घर से लाए हुए स्वादिष्ट भोजन का आनंद लिया। कुछ देर बातें करने के बाद अलार्म लगाया और सभी लोग नींद की आगोश में चले गए। जैसलमेर पहुँचने के चाव में सुबह अलार्म बजने से पहले ही नींद खुल गई तो बस बैठकर बातें करते हुए पहुँचने का इंतजार करने लगे। लगभग 5:00 बजे हमारा इंतजार खत्म हुआ और हम लोग जैसलमेर स्टेशन पहुँच गए। स्टेशन से बाहर निकलकर जैसलमेर में सर्द सुबह की शुरुआत चाय की चुस्कियों के साथ करना सबसे अच्छा विकल्प था। चाय की दुकान पर ही पानी गर्म करवाया, हाथ-मुँह धोए और फिर गर्मागर्म चाय का आनंद लिया।
जैसलमेर यात्रा के दौरान टेंट में रूकने का भी एक अलग ही मजा है। अतः हमने पहले से ही कनोई गाँव में लक्ज़री टेंट बुक करवा लिए थे। लेकिन वहाँ का चेक इन करने का समय 11:00 बजे का था, जबकि अभी तो सुबह के 6:00 ही बजे थे। फिर भी हमने एक बार रिसोर्ट में फोन पर बात करना उचित समझा और जैसा कि जैसलमेर अपनी महमानवाजी के लिए विश्वप्रसिद्ध है, टेंट खाली होने के कारण रिसोर्ट मालिक ने खुशी-खुशी हमें उसी वक्त रिसोर्ट में पधारने का निमंत्रण दिया। स्टेशन के बाहर बहुत से टैक्सी वाले उपलब्ध रहते हैं, अतः हमने भी टैक्सी ली और चल दिए अपनी मंजिल की ओर। कोहरे के कारण बाहर की दृश्यता बहुत कम थी, अतः ड्राइवर भी गाड़ी बहुत ध्यान से धीरे-धीरे चला रहा था। अंततः सुबह लगभग 7:15 बजे हम अपने रिसोर्ट पहुँच चुके थे और तब तक कोहरा छँटकर धूप भी निकलने लगी थी।
रिसोर्ट में हमारा स्वागत किया गया और जरूरी कार्यवाही के बाद हमें अपने-अपने टेंट में पहुँचा दिया गया। सीमेंट के चबूतरों पर बने हुए ये टेंट्स होटल के कमरों से किसी भी हाल में कम नहीं थे। अंदर डबल बेड, टेबल-कुर्सी, ब्लॉवर से लेकर अटैच वाशरूम तक सभी सुविधाएँ बहुत अच्छी थीं। चाय पीकर गर्म पानी से स्नान करने के बाद हम सबने ब्रंच (नाश्ता+लंच) किया।
विश्वप्रसिद्ध सम के धोरे हमारे रिसोर्ट से मात्र 6-7 किलोमीटर की दूरी पर स्थित थे। वहाँ तक जाने के लिए हमने गाड़ी बुलवाई, लेकिन बच्चे गाड़ी आने तक भी कहाँ रूकने वाले थे, दोनों ने वहीं रिसोर्ट में ही रेत में खेलना शुरू कर दिया। कुछ देर बाद गाड़ी आ गई और हम चल दिए धोरों के सफर पर। 4-5 मिनट बाद ही हम रेतीले टीलों के बीच थे। चारों तरफ फैले रेत के सुनहरे टीलों को देखकर बच्चों की खुशी का तो ठिकाना ही नहीं था। लग रहा था जैसे हम एक अलग ही दुनिया में आ गए थे। टीलों की साफ सुंदर रेत पर फिसलते, दौड़ते और मस्ती करते हुए हम बड़े भी मानों बच्चे बन गए थे। घंटाभर वहाँ मस्ती करने और फोटो खिंचवाने के बाद हम वहाँ से आगे चल दिए। कुछ दूर चलने के बाद हम पहुँचे धोरों के बीच रोमांच वाली जगह, जहाँ पैरासेलिंग, पैरामोटरिंग, कैमल सफारी, ATV राइड्स जैसी गतिविधियाँ पर्यटकों के लिए उपलब्ध थीं।
बच्चे तो वहाँ पहुँचते ही पैरासेलिंग करने के लिए मचल उठे। लेकिन छोटे बच्चों के लिए अकेले ऐसी गतिविधियों पर जाने की मनाही है। अतः पैरासेलिंग करवाने वाले खुद के साथ बारी-बारी दोनों बच्चों को लेकर गए। हमें लग रहा था कि बच्चे उत्साहित तो हैं, लेकिन कहीं पैराशूट के साथ ऊँचाई पर जाकर डर ना जाएँ, परंतु हुआ इसका उल्टा। दोनों ही बच्चे पैरासेलिंग करके इतने खुश थे कि दुबारा जाने के लिए भी तैयार थे। पैरासेलिंग के लिए हमने 1200 रु/व्यक्ति चुकाए।
अब रोमांचक गतिविधियों का हिस्सा बनने की बारी हम बड़ों की थी। गोवा यात्रा के दौरान मैं और मेरे पति पैरासेलिंग का अनुभव ले चुके थे। अतः इस बार हमने पैरामोटरिंग को चुना। पैरामोटरिंग में पैराशूट के साथ इंजन जुड़ा होने के कारण पैरासेलिंग की अपेक्षा अधिक ऊँची उड़ान भरी जा सकती है। मैं तो इतना उत्साहित थी कि सबसे पहले पैरामोटरिंग के लिए मैं ही गई। जैसे ही पैराशूट धरती से ऊपर उठना शुरू हुआ, मन में भी रोमांच की लहरें उठना शुरू हो गईं। कुछ ही पलों में मैं पैराशूट के साथ हवा में ऊँचाइयों पर थी और नीचे देखने पर क्या कमाल का नजारा था। दूर-दूर तक रेत के ऊँचे-नीचे टीले ही टीले। सूरज की किरणें पड़ते ही सोने सी चमकती जैसलमेर की बालू रेत को ऊँचाई से पक्षियों की तरह उड़ते हुए निहारने का अनुभव पैरामोटरिंग के माध्यम से लिया जा सकता है। पैरामोटरिंग के लिए हमने 4000 रु/व्यक्ति चुकाए।
पैरामोटरिंग के बाद हम ATV राइड यानि क्वाड बाइक का अनुभव लेने पहुँच गए और यहाँ हमारी मुलाकात एक शानदार शख्सियत से हुई, जिनका नाम था शाहरुख भाई। जितना मजा क्वाड बाइक चलाते समय आया, उतना ही मजा शाहरुख भाई की बातें सुनकर भी आया। जैसलमेर से पहले उनके पास दुबई में ATV राइड्स करवाने का अनुभव था। ATV राइड के साथ-साथ उन्होंने अपनी बातों से हमें इतना हँसाया कि राइडिंग का मजा ही दुगुना हो गया। हवा से बातें करती हुई क्वाड बाइक जब उबड़-खाबड़ टीलों पर दौड़ती है तो रोमांच चरम पर होता है।
उपर्युक्त सारी रोमांचक गतिविधियों का आनंद लेते हुए शाम का समय हो गया था और बच्चे थक भी गए थे, तो हम अपने टेंट में लौट गए। चाय पीकर कुछ देर विश्राम किया। इसके बाद हम अपने रिसोर्ट में होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम का हिस्सा बने। टेंट्स के बीच बालू रेत पर एक पक्का चबूतरा बना हुआ था। एक तरफ राजस्थानी पोशाक पहने लोक कलाकार अपने वाद्य यंत्रों के साथ विराजित थे तो उनके सामने तीनों तरफ टेंट्स में रूकने वाले मेहमानों के लिए गद्दे बिछे हुए थे। हम अब भी वहीं गद्दों पर बैठ गए। वहाँ हमारे लिए गर्मागर्म चाय-पकौड़ों की भी व्यवस्था की गई थी। गद्दों पर पसरकर नाश्ते के साथ लोक कलाकारों द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले राजस्थानी नृत्य-संगीत को देखना किसी राजसी एहसास से कम नहीं था।
संस्कृतिक कार्यक्रम के बाद हम भोजन करने बैठे। वहाँ का भोजन इतना लजीज था कि खाकर तन और मन दोनों ही तृप्त हो गए। एक और बात जिसके हम कायल हुए बिना न रह सके, वह थी रिसोर्ट के मालिक ना सिर्फ भोजन अपितु अन्य सभी सुविधाओं के बारे में प्रतिक्रिया जानने हेतु स्वयं प्रत्येक व्यक्ति से मिलकर बात कर रहे थे। उनके विनम्र व्यक्तित्व तथा मीठी बोली ने सभी का दिल जीत लिया। भोजन के बाद हम टहलते हुए अपने टेंट में पहुँचे और सो गए। रेगिस्तान में तो गर्मियों में भी रात का मौसम काफी शीतल होता है, ऐसे में अभी जनवरी में तो रात में कड़ाके की ठण्ड होनी ही थी, लेकिन टेंट काफी सुविधाजनक था तो उसमें ठण्डी हवा अंदर नहीं आ रही थी और हमें रात में काफी अच्छी नींद आई।
क्रमशः………………
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Bht hi sundar
जवाब देंहटाएंThanks
हटाएंJaisalmer yatra ka bahut hi sundar or sajiv varnan kiya he.esa laga jese ham bhi apke saath yatra ka anand le rahe ho.
जवाब देंहटाएंप्रतिक्रिया के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद 🙏🏻
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