पहाड़ों से घिरा दैव्य तीर्थ स्थल : वैष्णो माता धाम ( द्वितीय व अंतिम भाग ) - Yatrafiber

Latest

yatrafiber.com is a travel blog website for whom love to travel. The motive of this website is to promote tourism across India. Tourism industry is much affected industry from covid-19, so promoting domestic tourism specially Rajasthan state i decided to write blogs. Blogs on this website will be available from my own experience after visiting any place. Blogs will help in making your travel plans.

सोमवार, 15 दिसंबर 2025

पहाड़ों से घिरा दैव्य तीर्थ स्थल : वैष्णो माता धाम ( द्वितीय व अंतिम भाग )

पहाड़ों से घिरा दैव्य तीर्थ स्थल : वैष्णो माता धाम ( द्वितीय व अंतिम भाग )

सादर प्रणाम प्रिय पाठकों,

Yatrafiber के पिछले ब्लॉग में मैंने अपनी वैष्णो माता यात्रा के अनुभव साँझा किए थे। आज का ब्लॉग उस से आगे की यात्रा से संबंधित है।

भैरव बाबा का स्थान वैष्णो माता से लगभग 1.5-2.0 किलोमीटर ऊपर स्थित है, जहाँ तक पहुँचने के लिए सीधी ढलानों वाली काफी कठिन चढ़ाई वाला रास्ता है। साथ ही पिट्ठू की सवारी करके भी ऊपर पहुँचा जा सकता है। इसके अलावा माता के दरबार से ऊपर भैरव बाबा तक जाने के लिए रोप-वे की सुविधा भी उपलब्ध है। रोप-वे के पास बहुत लंबी लाईन लगी होने के कारण हम सबने पैदल ही ऊपर जाने की ठानी।वहाँ बच्चों के लिए छोटी गाड़ी वाले भी उपलब्ध हैं, जिनको शुल्क चुकाकर छोटे बच्चों को उसमें बैठाया जा सकता है, ताकि आपको पैदल चलने में असुविधा नहीं हो। हमारी बिटिया भी तीन वर्ष की होने के कारण न तो उसका पैदल चलना संभव था और ना हि इस कठिन रास्ते में उसे गोदी में उठाकर चलना हमारे लिए संभव था। अतः हमने भी एक गाड़ी वाले भैया से बात करके बिटिया को गाड़ी में बैठा दिया और उसके साथ-साथ पैदल चलने लगे। इस तरह कठिन रास्ते को पार कर ऊपर भैरव स्थल पहुँचकर सबने भैरू बाबा के दर्शन किए।

कहा जाता है कि वैष्णो माता द्वारा भैरव जी का सिर काटने पर वह ठीक इसी स्थान पर आकर गिरा था। फिर भैरव बाबा ने जब मैया से माफी माँगी, तब उन्होंने भैरव जी को आशीर्वाद दिया कि मेरे दर्शन तभी पूरे माने जाएँगे, जब यहाँ आने वाले श्रद्धालु मेरे साथ-साथ तुम्हारे भी दर्शन करेंगे। कालांतर में यहाँ मंदिर का निर्माण करवाया गया और यहाँ आने वाले सभी लोग माताजी के साथ-साथ भैरू बाबा के दर्शन भी अवश्य करते हैं।

इतनी ऊँचाई से नीचे चारों ओर का रमणीक दृश्य देखकर मन हर्षोल्लास से भर उठा। कुछ देर बैठकर सबने विश्राम किया और फिर वहाँ की प्राकृतिक खूबसूरती के बीच बहुत सारी फोटो खिंचवायी। हरी-भरी घाटी में छितराए हुए बादलों वाले मनोरम दृश्यों को देखते हुए वहाँ घंटों तक बैठे रहा जा सकता है। मस्ती और बातों के बीच बच्चों ने वहाँ कुछ स्नैक्स(नाश्ता) का आनंद लिया।


अब हमें वापस नीचे उतरना था। वापसी के समय रोप-वे के पास भीड़ नहीं होने के कारण सबने रोप-वे का अनुभव लेने की ठानी। रोप-वे की टिकट का शुल्क 100 रुपये प्रति व्यक्ति है, जिससे एक या दोनों तरफ की यात्रा की जा सकती है। टिकट लेकर सब लोग ट्रॉली(केबल कार) में सवार हो गए। इस केबल कार में एक बार में लगभग 45 लोग सवार हो सकते हैं तथा भैरव मंदिर से वैष्णो माता मंदिर की दूरी पार करने में मात्र 3-4 मिनट लगते हैं। केबल पर लटकती वातानुकूलित ट्रॉली में खड़े होकर चारों तरफ के मनोरम दृश्य को निहारने का रोमांच ही कुछ अलग है। ट्रॉली से नीचे घाटी का खूबसूरत नजारा दिखाई देता है। बच्चे, बुजुर्ग, दिव्यांगों के लिए रोप-वे विशेष रूप से उपयोगी है, क्योंकि रोप-वे उन्हें वैष्णो माता से भैरव जी की कठिन चढ़ाई के कष्ट से बचा लेता है। हालांकि जब रोप-वे प्रारंभ हुआ तो पिट्ठू व पालकी के मालिकों और स्थानीय दुकानदारों ने इसका विरोध किया था, क्योंकि उनके अनुसार यह उनके रोजगार के लिए खतरा था।


रोप-वे का अनुभव लेने के बाद अब हमें वापस नीचे कटरा पहुँचना था। सबसे पहले तो हमने बच्चों के लिए गाड़ी वालों से बात की, क्योंकि थकान के कारण उन्हें गोद में उठाकर नीचे उतरना संभव नहीं था। बाकी सबने पदयात्रा का आनंद लेते हुए ही नीचे उतरना पसंद किया। पतिदेव बिटिया का ध्यान रखते हुए गाड़ीवाले भैया के साथ-साथ चल रहे थे तो बाकी सब भी यात्रा के आनंद के विषय में बातें करते हुए चल पड़े। आने-जाने वाले सभी भक्तगण माता जी के जयकारे लगा रहे थे। चारों ओर पहाड़ों के दिलफरेब नजारों के बीच आते-जाते श्रद्धालुओं की कतारें चली जा रही थीं। नीचे उतरते समय ढलान के कारण चढ़ने की अपेक्षा कम समय लगता है। रास्ते में एक जगह सभी लोग चाय-कॉफी का लुत्फ उठाने के लिए रूके और फिर बिना रूके नीचे उतरने की ठानकर चल पड़े। सभी का बिल्कुल एक साथ एक गति से चलना संभव नहीं होने के कारण पहले ही तय कर लिया गया कि जो भी सदस्य नीचे पहुँचते जाएँ, वे प्रवेश द्वार के पास बैठकर बाकी सबका इंतजार करेंगे। अंततः 15 अप्रेल, 2022 को देर शाम तक ग्रुप के सभी सदस्य प्रवेश द्वार पर एकत्र हो गए। सभी ने एक बार फिर एक साथ ‘जय माता दी’ जयकारा लगाया और फिर ऑटो में बैठकर चल दिए होटल की तरफ। होटल पहुँचकर गर्म पानी से स्नान का आनंद लिया। थकान के कारण किसी का भी बाहर जाने का मन नहीं था, अतः सबने होटल में ही खाना मँगवाकर खाया और सोने चल दिए, क्योंकि अगले दिन सुबह हमें शिवखोड़ी दर्शन हेतु भी निकलना था।

अगले दिन यानि 16 अप्रेल, 2022 को सुबह तैयार होकर सभी लोग होटल के स्वागत-कक्ष में एकत्र हुए। कटरा से शिवखोड़ी की दूरी लगभग 80 किलोमीटर है। वैसे तो कटरा से शिवखोड़ी के लिए सार्वजनिक बसें वगैरह भी आसानी से मिल जाती हैं, परंतु हम तो खुद ही इतने लोग साथ थे कि हमने स्वयं किराए पर बस लेने का तय किया। बस में सवार होकर हम लोग शिवखोड़ी के लिए चल पड़े। पहाड़ों के बीच घुमावदार रास्तों से गुजरते हुए हर तरफ एक से एक सुंदर नजारे दिखाई देते हैं, जो प्रकृति के अनुपम रूप को दर्शाते हैं। लंबे सफर को काटने के लिए सबने अंत्याक्षरी खेलने का मन बनाया और बस एक से एक शानदार गानों का समां बँध गया। हँसते-गाते कब आधा रास्ता गुजर गया, पता ही नहीं चला। सभी को तेज भूख लगी थी तो रास्ते में एक अच्छा सा रेस्तरां देखकर बस रूकवायी और जुट गए पेट पूजा में। भोजन के बाद फिर से चल दिए सुहाने सफर पर।

कटरा से शिवखोड़ी जाते समय रास्ते में कटरा से लगभग 25 किलोमीटर की दूरी पर जम्मू के रियासी जिले में चिनाब नदी रिवर राफ्टिंग के लिए प्रसिद्ध है। अतः हम सब भी रिवर राफ्टिंग का अनुभव लेने हेतु रियासी में रुके। बुकिंग करवाने के बाद हमने अपनी बस को वहीं छोड़ा, क्योंकि रिवर राफ्टिंग वाला स्थान कुछ दूरी पर था। वहाँ तक पहुँचने का अनुभव तो और भी मजेदार था, क्योंकि तब हमारी शाही सवारी बनी एक ट्रॉली गाड़ी, जिसमें दरी बिछी हुई थी तो उसी शाही कालीन पर हम सब विराजित हो गए और हमारी छत थी वही नावें जिनसे हम रिवर राफ्टिंग करने वाले थे। रिवर राफ्टिंग वाले स्थल पर पहुँचकर सबसे पहले हमें वहाँ रिवर राफ्टिंग से संबंधित संपूर्ण सुरक्षा जानकारी दी गई, जिन्हें हमने बड़े ध्यान से सुना, ताकि हम सुरक्षित रूप से रिवर राफ्टिंग कर सकें।फिर सभी ने हेलमेट लगाए तथा लाइफ जैकेट पहनी, जो कि दुर्घटनावश पानी में गिरने पर डूबने से बचती है। इसके बाद दो नावों पर सवार होकर चल पड़े हम लोग एक रोमांचक सफर पर। पानी की तेज लहरों को काटते हुए आगे बढ़ने के लिए सभी को तेजी से चप्पू चलाने पड़ते हैं। चप्पू चलाते-चलाते हाथों में दर्द ही होने लगता है, लेकिन लहरों में हिचकोले खाती नाव को आगे बढ़ाने में इतना मजा आता है ना कि इसके सामने छोटा-मोटा दर्द तो कुछ भी नहीं है। रिवर राफ्टिंग करने के साथ-साथ वहाँ हमने बहुत सी फोटो भी खिंचवायी और फिर इस साहसी रोमांचक खेल की यादों का पिटारा लिए वापस चल दिए अगले पड़ाव यानि शिवखोड़ी की ओर।

शिवखोड़ी में भगवान शिव को समर्पित प्राकृतिक गुफा है, जो कि रियासी जिले के संगरी गाँव में स्थित है। शिवखोड़ी जाने के लिए रणसू गाँव पहुँचना पड़ता है, जो कि शिवखोड़ी गुफा से लगभग 6-7 किलोमीटर दूर स्थित है। आगे की यात्रा पैदल या पिट्ठू पर की जा सकती है। रणसू पहुँचकर बुजुर्गों व बच्चों के लिए हमने पिट्ठू पर यात्रा करना चुना, ताकि वे आसानी से गुफा तक पहुँच सकें। जबकि बाकी लोग पैदल ही ‘बम बम भोले‘ का जयकारा लगाते हुए चल पड़े।

रणसू से शिवखोड़ी गुफा जाने के दौरान कुछ दूरी पर एक नदी भी आती है, जिसे दूधगंगा कहा जाता है। बड़े-बड़े हरे-भरे पेड़ों से ढके ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों पर भक्तगण ‘बम बम भोले‘, ‘ॐ नमः शिवाय‘ के जयकारे लगाते, भक्ति में झूमते गाते इस प्राकृतिक गुफा तक दर्शन हेतु पहुँचते हैं। पूरा रास्ता प्रकृति की चित्ताकर्षक तस्वीर सी प्रस्तुत करता लगता है। इन्हीं हसीन नजारों से होकर हम भी शिवखोड़ी गुफा तक पहुँचे।



शिवखोड़ी शब्द शिव और खोड़ी यानी खोर को मिलाकर बनता है। खोर का अर्थ होता है - गुफा अर्थात् ऐसी गुफा जो शिवजी का निवास स्थान है। मान्यता के अनुसार शिवजी इस गुफा में सपरिवार रहते हैं। यह गुफा लगभग 150 मीटर लंबी है। इस संकरी गुफा से होकर श्रद्धालु शिवजी के दर्शन करने अंदर जाते हैं। गुफा में जगह-जगह प्राकृतिक रूप से पानी टपकता रहता है। गुफा के अंदर स्वयंभू यानि अपने आप प्रकट होया हुआ शिवलिंग स्थित है। शिवलिंग लगभग 4 फीट ऊँचा है तथा उसपर निरंतर गुफा से प्राकृतिक जलाभिषेक होता रहता है। इस गुफा में माता पार्वती, कार्तिकेय जी, गणेश जी, नंदी महाराज सभी की मूर्ति प्राकृतिक रूप से अपने आप बनी हुई है। गुफा की छत पर सर्प की आकृति का बना होना भी लोगों को आश्चर्यचकित करता है। लोगों का मानना है कि इस गुफा से एक रास्ता सीधे अमरनाथ गुफा तक जाता है। प्राचीनकाल में साधु-संत इसी रास्ते का उपयोग कर अमरनाथ जाया करते थे, परंतु वर्तमान में इस रास्ते को बंद कर दिया गया है। इसके अलावा गुफा में एक और रास्ता भी है, जिसके बारे में लोकश्रुति है कि यह रास्ता सीधे स्वर्ग तक जाता है।

इस गुफा से जुड़ी पौराणिक कथा भी भगवान शिव से संबंधित है, जिसके अनुसार भस्मासुर नामक दैत्य ने तपस्या से भगवान शिव को प्रश्न कर उनसे वर माँगा कि मैं जिसके भी सिर पर हाथ रखूँ, वह जलकर भस्म हो जाए। शिवजी ने उसे यह वर दे दिया, तब भस्मासुर ने मद में चूर होकर भगवान शिव को ही भस्म कर देना चाहा। शिवजी और भस्मासुर में युद्ध हुआ, तब शिवजी इस गुफा में आकर छुप गए। पीछे-पीछे भस्मासुर भी गुफा में आ गया। तब विष्णु जी एक सुंदर स्त्री का रूप धरकर आए। भस्मासुर उनपर मोहित हो गया और उनके साथ नृत्य करने लगा। नृत्य करते-करते उसका ध्यान भटक गया तथा उसने अपने ही सिर पर हाथ रख दिया, जिससे वह जलकर राख हो गया। इस प्रकार भस्मासुर का अंत हुआ।

गुफा के अंदर पंडित जी लोगों को गुफा से जुड़ी कथा तथा इसके महत्त्व को बताते रहते हैं। गुफा के अंदर काफी अंधेरा रहता है, अतः सुविधा हेतु लोग टॉर्च भी साथ ले जाते हैं। शिवलिंग तथा शिव परिवार के दर्शन हेतु एक कृत्रिम रास्ता भी बनाया गया है, जो कि सीधे शिवलिंग स्थल से जुड़ा हुआ है। गुफा वाला रास्ता संकरा होने के कारण उसमें से सीमित लोगों को ही प्रवेश दिया जा सकता है। अतः भीड़ बढ़ने पर सीधे रास्ते से ही प्रवेश दिया जाता है, ताकि सभी लोग शिवलिंग के दर्शन पा सकें। एक प्राकृतिक गुफा में सम्पूर्ण शिव परिवार की छवि अपने आप प्रकट होना लोगों को अचंभित कर देता है। खैर हम सबने भी पूर्ण श्रद्धा भाव से शिवलिंग के साथ-साथ सम्पूर्ण शिव परिवार के दर्शन किए, कुछ देर वहाँ रुककर गुफा के महत्त्व के बारे में जाना तथा प्रसाद प्राप्त किया।

प्रभु शिव को समर्पित इस दैव्य गुफा के दर्शन कर हम लोग वापस रणसू के लिए चल दिए। इस बार सब लोग पैदल ही वापस आए। रास्ते के सुंदर दृश्यस्थलों पर फोटो खिंचवाते तथा आपस में बातें करते हुए कब हम लोग रणसू पहुँच गए, पता ही नहीं चला।


शाम हो चुकी थी, अतः सभी लोग बस में सवार हुए और जम्मू के लिए निकल गए। रास्ते में फिर से अंत्याक्षरी का दौर चला। वापसी में रास्ते में एक जगह चाय की चुस्कियों के बाद वापस चल दिए और सीधे होटल जाकर ही रूके। होटल पहुँचने तक रात के लगभग 11 बज चुके थे और थकान से बुरा हाल था। रेस्तरां जाने की हिम्मत नहीं थी, तो होटल में ही खाना मँगवाया और सबने साथ बैठकर खाया। खा-पीकर सभी लोग सोने चले गए।

अगले दिन यानि 17 अप्रेल, 2022 को हमें वापस गृहस्थान की ओर कूच करना था। अतः सुबह उठकर, तैयार होकर गाड़ी मँगवायी और जम्मू हवाईअड्डे के लिए निकल गए। जम्मू से दिल्ली हवाईजहाज और फिर दिल्ली से जयपुर ट्रेन का सफर कर हम जब घर पहुँचे तो हमारे पास एक बहुत ही यादगार धार्मिक यात्रा का शानदार अनुभव था। आज के दौर की इस भागमभाग वाली जिंदगी के बीच हमें अपने करीबियों के साथ इस तरह की यात्रा के अवसर अवश्य खोज लेने चाहिए दोस्तों, क्योंकि ये अवसर हमारी बोझिल बनती जिंदगी में फिर से ताजगी और स्फूर्ति ला देते हैं।




4 टिप्‍पणियां: