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गुरुवार, 4 दिसंबर 2025

पहाड़ों से घिरा दैव्य तीर्थ स्थल : वैष्णो माता धाम ( प्रथम भाग )

पहाड़ों से घिरा दैव्य तीर्थ स्थल : वैष्णो माता धाम ( प्रथम भाग )

सादर प्रणाम प्रिय पाठकों,

हरे-भरे पेड़ों से ढके हुए ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों के बीच ‘प्रेम से बोलो जय माता दी, जोर से बोलो जय माता दी’ जैसे जयकारों से गूंजते असीम सुखकारी श्रद्धापूरित वातावरण की बात की जाए तो सुनने वालों के ध्यान में सिर्फ और सिर्फ एक ही नाम आता है और वो है ‘श्री वैष्णो माता धाम’

Yatrafiber के आज के ब्लॉग में मैं वैष्णो माता यात्रा से जुड़े अपने अनुभव साझा करना चाहूँगी ।

वैष्णो माता जी हमेशा से ही मेरा व मेरे पति का पसंदीदा दर्शनीय स्थल रहा है। कोरोना काल के बाद काफी समय से हम वैष्णो माता यात्रा के इच्छुक थे और ऐसी ही इच्छा हमारे कुछ मित्र परिवारों की भी थी। सभी ने आपस में बातचीत की और अप्रेल माह में वैष्णो माताजी जाना तय किया गया। छोटे-बड़े सब मिलाकर हम 23 लोग वैष्णो माताजी जाने वाले थे। हम सभी जयपुर निवासी हैं, अतः हमने 13 अप्रेल, 2022 को जयपुर से जम्मू तक के लिए ‘पूजा एक्सप्रेस’ ट्रेन में आरक्षण करवा लिया और उत्साहपूर्वक प्रस्थान दिवस का इंतजार करने लगे।

13 अप्रेल, 2022 की शाम को हम सभी अपने-अपने सामान के साथ गाँधीनगर रेलवे स्टेशन, जयपुर पहुँच चुके थे। सभी की खुशी और उत्साह देखने लायक था। नियत समय पर ट्रेन आयी और माताजी के जयकारे के साथ हम सब चल दिए अपने गंतव्य की ओर। ट्रेन में बच्चों की मस्ती, बड़ों के हँसी-मजाक और बुजुर्गों की मुस्कान से शानदार माहौल बन गया। बातें करते-करते रात के 8 बज गये और सभी को भूख भी लग गई थी तो बस सभी ने अपने साथ लाया ढेर सारा भोजन निकाला और सजा दिया प्लेट्स में। तरह-तरह के व्यंजनों से ट्रेन की बोगी महकने लगी। ट्रेन के सफर और भोजन का रिश्ता ही कुछ ऐसा है कि भूख अपने आप दुगुनी हो जाती है। सभी ने इस रात्रिभोज का आनंद लिया। पेटभर भोजन करने के बाद सभी ने अपनी-अपनी सीट ले ली और बातें करते-करते सो गए। सुबह उठने के साथ ही शुरू ही गया जम्मू पहुँचने का इंतजार और आखिर 14 अप्रेल, 2022 को सुबह लगभग 7:30 बजे हम जम्मू स्टेशन पहुँच ही गये।

जम्मू से कटरा के लिए हमने ट्रेन बदली और ट्रेन के चलने के साथ ही शुरू हुआ एक बहुत ही रोमांचक सफर। जम्मू से कटरा तक का रेलवे ट्रेक बहुत ही सुंदर प्राकृतिक दृश्यों से परिपूर्ण है। आस-पास की खूबसूरत दृश्यावली इस रास्ते को खास बनाती है। सफर कर रहे यात्री जैसे रास्ते के प्राकृतिक सौंदर्य में खो से जाते हैं। कहीं दूर-दूर तक बड़े-बड़े पेड़ों की हरियाली से ढकी हुई धरती, तो कहीं कल-कल बहती नदी, प्रकृति का ऐसा सुंदर रूप कि बस उसको नजरों में भर लेने का मन होता है। नदियों में पानी की तेज धार से बड़े-बड़े पत्थर भी ऐसा सुंदर गोल रूप धारण कर लेते हैं कि मानो किसी साँचे में ढाल कर बनाये गये हों।


                                        

इस रास्ते से गुजरते हुए छोटी-छोटी तक़रीबन 35 सुरंगें आती हैं, जो कि यात्रा को और अधिक रोमांचक बना देती हैं। जैसे ही ट्रेन किसी सुरंग में प्रवेश करती है, यात्रियों में रोमांच की लहर सी दौड़ जाती है। सुरंग में बच्चों के साथ मिलकर जब सभी बड़े भी हूटिंग करते हैं, तो जैसे सबका बचपन जीवित हो उठता है। ना सिर्फ सुरंगें बल्कि कई छोटे-बड़े पुलों से होकर भी ट्रेन गुजरती है। हरी-भरी वादी में नीचे नदी में बहता साफ पानी और ऊपर पटरी पर दौड़ती हुई ट्रेन किसी फिल्मी दृश्य जैसा प्रतीत होता है।

रास्ते में एक जगह क्रॉसिंग के लिए ट्रेन रुकी तो आस-पास के पेड़ों से बहुत से बंदर भोजन की आस में बाहर निकल आए। रात्रि भोजन में से बचे हुए परांठे, पूरी आदि उन बंदरों को खिलाते हुए बच्चे बहुत खुश हो रहे थे। कुछ देर बाद ट्रेन चल पड़ी और एक सुहाने सफर के बाद हम सब कटरा स्टेशन पहुँच गए।

जम्मू में पोस्टपेड सिम या फिर वहीं की प्रीपेड सिम ही काम करती है, दूसरे राज्यों की प्रीपेड सिम वहाँ पहुँचकर काम करना बंद कर देती है। हम में से किसी के भी पास पोस्टपेड सिम नहीं थी। अतः कटरा पहुँचते ही हमने सबसे पहले वहाँ के नंबर की 4-5 सिम खरीदीं ताकि सब आपस में और अपने परिवार से संपर्क में रह सकें। कटरा रेलवे स्टेशन के बाहर वहाँ की प्रीपेड सिम लगभग 300 रुपये में आसानी से मिल जाती है और सिम लेने के बाद कुछ ही देर में काम भी करना शुरू कर देती है।

कटरा में हमने पहले से ही होटल में कमरे बुक कर रखे थे, जो कि स्टेशन से अधिक दूरी पर नहीं थे। अतः सिम लेने के बाद सब लोग होटल पहुँचे और अपने-अपने कमरे में चले गए। सबने नहा-धोकर कुछ देर आराम किया। सुबह से हल्का-फुल्का नाश्ता ही किया होने के कारण शाम को सबको जल्दी भूख लग गयी तो हम सब लोग भोजन करने हेतु पास ही एक रेस्तरां में पहुँचे और स्वादिष्ट भोजन का आनंद लिया। फिर थोड़ा बहुत आस-पास का बाजार देखने के बाद हम सब अपने होटल आ गए। सबने बैठकर कुछ देर बातें की और यह तय किया कि सुबह 3 बजे से वैष्णो माँ के दरबार के लिए यात्रा प्रारम्भ करनी है, फिर सभी सोने चले गए।

रात्रि 2:30 बजे तक सब लोग नहा-धोकर तैयार होकर होटल के स्वागत कक्ष में इकट्ठे हो गए। जम्मू में ऑटोरिक्शा किसी भी समय आसानी से मिल जाते हैं, अतः हम लोगों ने भी ऑटोरिक्शा बुलाए और दरबार के लिए यात्रा प्रारम्भ होने वाले स्थल पर पहुँच गए। वहाँ प्रसाद, फूल-माला, अन्य पूजन सामग्री, माताजी की मूर्तियाँ, तस्वीरें और इसी तरह की अन्य सामग्री की बहुत सारी दुकानें हैं। हमने वहाँ से माताजी को चढ़ाने के लिए चुनरी-जोड़ा, प्रसाद तथा माथे पर बाँधने के लिए ‘जय माता दी’ लिखी पट्टियाँ खरीदीं। सबने माताजी का जयकारा लिखी पट्टियाँ माथे पर बाँधी और यात्रा प्रारम्भ करने हेतु चल पड़े। सभी माँ वैष्णो के दर्शन पाने के उत्साह से लबरेज थे।

वैष्णो माता के दर्शन हेतु आने वाले सभी श्रद्धालुओं के लिए यात्रा का रजिस्ट्रेशन कराना अति आवश्यक है जो कि नि:शुल्क होता है। यह रजिस्ट्रेशन वहाँ ऑफलाइन भी करवा सकते हैं या फिर ऑनलाइन भी करवाया जा सकता है। हमने पहले ही वैष्णो माता धाम की वेबसाइट से ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन करवा लिया था, जिसकी पर्ची दिखाकर हमने दरवाजे के अंदर प्रवेश किया।

यहाँ जानकारी के लिए मैं बता दूँ कि गुटखा, पान-मसाला, बीड़ी, सिगरेट, लाईटर जैसे ज्वलनशील पदार्थ और नुकीले हथियार जैसी सामग्री दरबार में ले जाना निषेध है। अगर किसी व्यक्ति के पास ऐसा कोई सामान होता भी है तो उसे बाहर ही छोड़ना पड़ता है। हर एक व्यक्ति को पूरी तलाशी के बाद ही अंदर प्रवेश दिया जाता है।

चूँकि हमारे साथ बड़े-बुजुर्गों से लेकर बच्चे तक सभी तरह के सदस्य थे, अतः हमने अर्द्धकुमारी तक का रास्ता खच्चर पर बैठकर पार करना तय किया। वहाँ बहुत सारे खच्चर वाले उपलब्ध थे, तो हमने उनसे मोलभाव किया। अकेले बैठने वालों के लिए 700 रूपये तथा बच्चे के साथ बैठने वालों के लिए 950 रूपये चुकाने की बात तय हुई और हम माताजी के जयकारे के साथ चल पड़े दरबार की ओर। खच्चर के चलने के साथ ही मेरी बिटिया का ‘चल मेरे घोड़े टिक टिक टिक’ वाला गीत शुरू हो गया। हमारे साथ के दो-तीन युवाओं ने पूरा रास्ता पैदल चढ़ाई करने का निश्चय किया और जोश से माताजी के जयकारे लगाते हुए चल पड़े।

जो लोग पैदल यात्रा करने में असमर्थ हैं, उनके लिए कटरा से ऊपर माताजी के दरबार यानी भवन तक की यात्रा के लिए खच्चर, पालकी, बैटरी कार, हेलीकॉप्टर जैसी सुविधाएँ भी उपलब्ध हैं। यात्री अपनी आवश्यकतानुसार इनका उपयोग किराया चुकाकर कर सकते हैं। हेलीकॉप्टर की सेवा कटरा से सांझी छत के लिए उपलब्ध है, वहाँ से लगभग 2.5 किलोमीटर की यात्रा पैदल पार करनी होती है।

कटरा से माताजी के भवन की दूरी लगभग 13 किलोमीटर है तथा अर्द्धकुमारी को इसका मध्य बिंदु माना जाता है। यहाँ पर एक प्राचीन गुफा मौजूद है, जो कि काफी संकरी है, भक्तों को झुककर या कुछ स्थानों पर रेंगकर इसे पार करना पड़ता है। इस गुफा के बारे में मान्यता है कि यहाँ वैष्णो माता ने नौ महीनों के लिए शरण ली थी तथा यहाँ बैठकर तपस्या की थी। इस गुफा का आकार गर्भ के समान होने के कारण इसे गर्भजून गुफा भी कहा जाता है। कटरा से अर्द्धकुमारी तक जाने के लिए भी दो रास्ते हैं, एक पुराना रास्ता है जो कि थोड़ा लंबा है तथा दूसरा भीड़ का दबाव कम करने के लिए बनाया गया नया रास्ता जो कि पुराने रास्ते की अपेक्षा दूरी को भी थोड़ी कम करता है।

कटरा से यात्रा प्रारम्भ करने पर रास्ते में पवित्र बाणगंगा नदी आती है। मान्यता है कि यह नदी स्वयं माता वैष्णो देवी द्वारा धरती में तीर मारकर उत्पन्न की गई थी, इसी कारण इसका नाम बाणगंगा पड़ा। श्रद्धालु इस नदी में स्नान करके यात्रा प्रारम्भ करते हैं, क्योंकि माना जाता है कि बाणगंगा में स्नान करने से सारे पाप धुल जाते हैं और व्यक्ति पावन हो जाता है। शीतल जल से स्नान करके चित्त भी शुद्ध हो जाता है। बाणगंगा से थोड़ा आगे जाकर चरण पादुका मंदिर आता है, जहाँ माताजी ने अपने चरण चिह्न छोड़े थे। इस मंदिर में आज भी माताजी के चरण चिह्न मौजूद है, जिनके लोग दर्शन करते हैं।

रास्ते की रौनक और भक्तिमय माहौल के बीच कब हम अर्द्धकुमारी पहुँच गये पता ही नहीं चला। कटरा से अर्द्धकुमारी पहुँचने में हमें लगभग डेढ़ घंटे का समय लगा। अर्द्धकुमारी गुफा के अंदर जाने के लिए लोगों की लंबी लाइन लगी रहने के कारण घंटों इंतजार करना पड़ता है। बच्चे व बुजुर्गों के साथ इतना इंतजार करना संभव नहीं होने के कारण हमने सीधे ऊपर जाकर माता वैष्णो देवी के दर्शन करना तय किया। परन्तु आगे का रास्ता हमें पैदल पार करना था, इसलिए कुछ देर किसी रेस्तरां में विश्राम करना तय किया गया। वहाँ हमने बच्चों को नाश्ता करवाया तथा कुछ लोगों ने चाय-कॉफी का आनंद लिया और कुछ ने बिना कुछ खाए-पिए माताजी के दर्शन करने का निर्णय लिया। लगभग एक घंटे बाद हमने अपनी पदयात्रा प्रारम्भ की। वैष्णो माताजी के दर्शन का असली आनंद ही पदयात्रा करने में आनंद आता है।

 


पहाड़ों को काटकर बनाया गया बहुत सारे मोड़ लिया हुआ सर्पिलाकार रास्ता, रास्ते के किनारे अलग-अलग सामान से सुसज्जित दुकानें और माताजी के जयकारे लगाते, भक्ति में झूमते-गाते लोगों के काफिले लगातार आगे बढ़ रहे थे। जैसे-जैसे हम ऊँचाई पर चढ़ते जा रहे थे, बादलों के छोटे-बड़े टुकड़े हमसे नीचे तैरते नजर आने लगे थे। पहाड़ों के बीच कहीं-कहीं छोटे-छोटे घर नजर आ रहे थे और मेरे मन में उन घरों को देखकर विचार उमड़ रहा था कि कितना कठिन होता होगा इन पहाड़ी लोगों का जीवन, कैसे ये लोग इन पहाड़ों में जीवन के लिए आवश्यक सुविधाएँ जुटाते होंगे। वैष्णो माताजी के दरबार को जाने वाला ये रास्ता पूरी तरह छत से ढका हुआ है, जिसके कारण बारिश या धूप पदयात्रा में बाधक नहीं बनते। इसी प्रकार रोशनी की भी पर्याप्त व्यवस्था है, जिससे रात्रि में भी यात्रा की जा सकती है। यही कारण है कि माताजी के दरबार के लिए पदयात्रा दिन-रात हर समय चलती रहती है।


 

रास्ते में जगह-जगह पर पीने के पानी के नल और शौचालय की भी व्यवस्था है। चाय, कॉफी, पानी जैसी चीजें पूरे रास्ते में आसानी से उपलब्ध है। किसी व्यक्ति की अचानक से तबीयत खराब हो जाए तो अस्पताल की सुविधा भी उपलब्ध है। फिर भी एहतियात के तौर पर साधारण दवाईयों का किट अपने पास जरूर रखना चाहिए। पैदल यात्रा से थकान तो होती है पर इसके कारण श्रद्धालुओं के उत्साह में कोई कमी नहीं आती, अपितु जैसे-जैसे माँ का भवन पास आता जाता है, उत्साह बढ़ता ही जाता है।



रास्ते से जब भवन नजर आने लगता है तो थकान भूलकर कदम वैसे ही जल्दी-जल्दी आगे बढ़ने लगते हैं। तो यूँ ही माँ के जयकारे लगाते, हँसते-बोलते हम भी आखिर माँ भवानी के दरबार में पहुँच ही गए।



भवन के पास धर्मशाला, होटल आदि सब उपलब्ध हैं, जहाँ किराया चुकाकर रूका जा सकता है। इसके अलावा मुफ्त में बड़े-बड़े हॉल भी उपलब्ध हैं, जहाँ संयुक्त रूप से रूका जा सकता है तथा यहाँ पहले आओ पहले पाओ वाली स्थिति होती है। यहाँ पर स्नानगृह व शौचालय की भी सुविधा उपलब्ध है। श्रद्धालुओं की संख्या अधिक होने पर बहुत से लोग कॉरिडोर में भी सोते हुए दिख जाते हैं। भवन में कंबल भी उपलब्ध हैं, जो कुछ शुल्क चुकाकर प्राप्त की जा सकती हैं। बाद में कंबल वापस लौटाने पर जमा कराए गए पैसे वापस मिल जाते हैं।

ऊपर लॉकर की सुविधा भी उपलब्ध है, जहाँ शुल्क चुकाकर लोग अपने सामान को रख सकते हैं। माँ के मंदिर में पर्स, मोबाईल, घड़ी, चश्मा, बेल्ट तथा चमड़े से बनी अन्य सामग्री ले जाने की सख्त मनाही है। हम सब भी अपना समान सुरक्षित रखने के बाद दर्शन हेतु लाईन में लग गए। माँ वैष्णो के दर्शन हेतु बहुत लंबी कतार लगी होने के बावजूद भी ना तो कोई भी श्रद्धालु थका हुआ दिखता है और ना ही परेशान होता प्रतीत होता है, अपितु सब माँ के दर्शन पाने को लालायित नजर आते हैं। सभी लोग माँ के जयकारे लगाते हुए आगे बढ़ते जा रहे थे।

हरियाली की चादर ओढ़े पहाड़ों के बीच श्रद्धापूरित भक्तों से भरे हुए माँ के भवन में खुद के खड़े होने के एहसास से मन में भक्ति का सागर हिलोरे ले रहा था। ऐसे ही प्रसन्नचित मन से जय माता दी, जय माता दी जपते हुए जब हम माँ वैष्णो की गुफा के द्वार पर पहुँचे तो बस आतुर मन माँ के दर्शन को लालायित हो उठा। यहाँ की प्राकृतिक गुफा से होकर दर्शन करने का रास्ता ज्यादातर बंद ही रहता है, क्योंकि भीड़ के दबाव में संकरी गुफा से इतने लोगों का दर्शन करना संभव नहीं है। अतः कृत्रिम गुफा से ही दर्शन हेतु जाना पड़ता है। परंतु वर्षभर में जब भी भीड़ कम होती है, तब श्रद्धालुओं को प्राकृतिक गुफा से दर्शन का मौका भी मिलता है।

गुफा के अंदर कुछ दूर चलते ही तीन पिंडियों के रूप में माँ वैष्णो देवी विराजित हैं। ये तीनों पिंडियाँ त्रिकुटा पर्वत की इस गुफा में प्राकृतिक रूप से प्रकट हुई थीं। इन्हें देवी महालक्ष्मी, महासरस्वती तथा महाकाली का रूप माना जाता है तथा सम्मिलित रूप से वैष्णो माता के नाम से जाना जाता है। जैसे ही वैष्णो मैया के दर्शन हुए मन प्रसन्नता से झूम उठा और नजरें तो माँ के दिव्य स्वरूप से हटाए भी नहीं हट रही थीं। मन कर रहा था की बस यूँ ही एकटक उनको निहारते रहें। लेकिन माँ के दर्शन पाने के लिए भक्तों की कतार इतनी लंबी होती है कि न चाहते हुए भी आगे बढ़ना ही पड़ता है। गुफा में काफी कम जगह होने के कारण श्रद्धालुओं द्वारा लाई जाने वाली चुनरी, चोला, छत्र, प्रसाद जैसी वस्तुएँ माँ को छुआकर वापस श्रद्धालुओं को दे दी जाती हैं। इनमें से कुछ भी वहाँ नहीं रखा जाता है।

वैष्णो माता के दर्शन पाकर प्रसन्न मन से हम सभी बाहर निकले। बाहर माता का प्रसाद बँट रहा था, जो कि शुद्ध देशी घी में बना हुआ स्वादिष्ट हलवा था। प्रसाद ग्रहण कर हम आगे चल दिए। पिंडी दर्शन कर बाहर निकलने के बाद थोड़ी ही दूरी पर दाँयी तरफ नीचे कुछ सीढ़ियाँ नीचे उतरने पर भगवान शिव की गुफा है। अधिकांश दर्शनार्थियों को इसकी जानकारी नहीं होने के कारण बिना दर्शन किए ही निकल जाते हैं। यह एक प्राकृतिक गुफा है, जिससे पानी टपकता रहता है। यहाँ शिवलिंग की स्थापना की गई है। हमने भी इस छोटे से रमणीक स्थल पर शिवलिंग के दर्शन किए।

माँ वैष्णो के दर्शन पाकर अंतर्मन की खुशी तो सबके चेहरों से ही झलक रही थी। साथ ही सबको तेज भूख भी सता रही थी। अतः सबने तय किया कि अब हमें भोजन करना चाहिए। ऊपर भवन के पास रत्नसागर रेस्तराँ में भोजन किया जाना तय हुआ। सभी ने छककर भोजन का आनंद लिया। यहाँ के भोजन का स्वाद था भी बहुत ही लाजवाब। भोजन के बाद हमें और ऊपर भैरव बाबा के दर्शन हेतु जाना था।

क्रमश: ……..


12 टिप्‍पणियां:

  1. Your blog is incredibly inspiring and immersive ✨🌠

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  2. यात्रा का बहुत शानदार एवं संजीदगी भरा चित्रण।

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    1. आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद 🙏🏻

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  3. Apne apne sath hme bhi mata rani ke darsan krwa diye

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