पेज

सोमवार, 29 दिसंबर 2025

उदयपुर में हैं प्रसिद्ध मूवी के नाम वाली इतनी खूबसूरत पहाड़ियाँ ⛰️⛰️ (बाहुबली हिल्स)

उदयपुर में हैं प्रसिद्ध मूवी के नाम वाली इतनी खूबसूरत पहाड़ियाँ ⛰️⛰️ (बाहुबली हिल्स)

 

 हैलो दोस्तों,

झीलों की नगरी उदयपुर की खूबसूरती ने इसे ना केवल देश में अपितु विश्व स्तर पर पहचान दिलाई है। प्रतिवर्ष लाखों देशी-विदेशी पावणे यहाँ भ्रमण हेतु आते हैं। झीलों और महलों के अतिरिक्त यहाँ की पहाड़ियों की भी अपनी ही खासियत है। Yatrafiber के आज के ब्लॉग में हम उदयपुर स्थित ‘बाहुबली हिल्स’ के बारे में बात करेंगे।

उदयपुर जंक्शन रेलवे स्टेशन तथा उदयपुर के रोडवेज बस स्टैण्ड, उदयपोल से बाहुबली हिल्स लगभग 17 किलोमीटर दूर स्थित हैं। हवाई मार्ग से आने वाले पर्यटकों के लिए नजदीकी हवाईअड्डा डबोक(उदयपुर) स्थित महाराणा प्रताप हवाईअड्डा है, जो कि यहाँ से लगभग 34 किलोमीटर दूर स्थित है। यहाँ से निजी वाहन करके बाहुबली हिल्स जा सकते हैं। वैसे बस से भी यहाँ पहुँचा जा सकता है।

बड़ी झील के पास स्थित इन खूबसूरत पहाड़ियों को पहले बाड़ी पहाड़ियों के नाम से जाना जाता था, परन्तु बाहुबली फिल्म में ऐसी ही पहाड़ियों का दृश्य आ जाने के बाद ये पहाड़ियाँ बाहुबली हिल्स के नाम से मशहूर हो गईं।

शहर से दूर खुले शांत वातावरण में स्थित इन पहाड़ियों के आस-पास ज्यादा बसावट नहीं है। यहाँ वाहन पार्किंग के लिए मामूली शुल्क लिया जाता है। पहाड़ियों के ऊपर पैदल ही जाना होता है, जिसमें लगभग 15-20 मिनट का समय लगता है। टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडी पर ट्रैकिंग करते हुए ऊपर पहुँचना बहुत मजेदार होता है, बस थोड़ी सावधानी रखना आवश्यक है ताकि फिसलकर गिरने या चोट लगने से बचा जा सके।

ट्रैकिंग करते हुए जब ऊपर पहुँचते हैं तो हरी-भरी पहाड़ियों और बड़ी झील का ऐसा मनमोहक नजारा दिखाई पड़ता है कि बस मन ठहर सा जाता है। मानसून यहाँ आने का सबसे उत्तम समय है, क्योंकि चारों ओर हरियाली की चादर ओढ़े पहाड़ियों के बीच फैली साफ-सुथरी बड़ी झील के विहंगम दृश्य को अनुभूत करते हुए आराम से बैठना भला किसे अच्छा नहीं लगेगा।

बड़ी झील उदयपुर की सबसे स्वच्छ झीलों में से एक है। इसमें व्यवसायिक गतिविधियाँ नहीं होती हैं। बड़ी झील मीठे पानी की कृत्रिम झील है, जिसका निर्माण महाराजा राजसिंह ने करवाया था। अकाल के समय उदयपुर निवासियों को इससे जल की आपूर्ति की जाती थी।



बाहुबली हिल्स से सूर्योदय तथा सूर्यास्त का बहुत ही शानदार दृश्य दिखाई देता है। सुकून से प्रकृति की गोद में वक्त बिताने के लिए बाहुबली हिल्स बहुत अच्छा स्थान है, क्योंकि यहाँ भीड़ का शोरगुल बिल्कुल भी नहीं है। उदयपुर आने वाले अधिकांश पर्यटकों को बाहुबली हिल्स की जानकारी नहीं होने के कारण यहाँ कम ही लोग पहुँच पाते हैं।


यहाँ आस-पास कोई बाजार या बड़ी दुकानें नहीं हैं। हाँ ऊपर चाय-नाश्ते की स्टॉल जरूर उपलब्ध है। वैसे अगर खाने-पीने का समान साथ में ही लाया जाए तो बेहतर होगा। कुछ लोग खाने-पीने के बाद बचे हुए समान, पॉलीथीन आदि को यहीं फेंक जाते हैं, जो कि बहुत ही गलत है। आज के समय में ऐसे मनोरम प्राकृतिक स्थल हमारे लिए कुदरत का वरदान हैं। इसलिए हमें इन्हें प्रदूषित करने की अपेक्षा सहेजने का प्रयास करना चाहिए।

बाहुबली हिल्स की कुदरती सुंदरता के बीच काफी लोग प्री-वेडिंग फोटोशूट, मॉडलिंग फोटोशूट तथा रील्स, वीडियो आदि बनाने के लिए पहुँचते रहते हैं। यहाँ एक छोटा सा देवस्थान भी स्थित है।

उदयपुर में विशुद्ध प्रकृति के बीच एकांत में वक्त गुजारना पसंद करने वाले लोगों के लिए बाहुबली हिल्स एक उपयुक्त स्थान है।

रविवार, 21 दिसंबर 2025

ये कोई डिश नहीं उदयपुर की पहाड़ियाँ हैं : रायता हिल्स

ये कोई डिश नहीं उदयपुर की पहाड़ियाँ हैं : रायता हिल्स


 हैलो दोस्तों,

देशी-विदेशी पर्यटकों का पसंदीदा स्थल तथा राजस्थान के सबसे खूबसूरत शहरों में शुमार उदयपुर को सामान्यतः इसकी झीलों के लिए जाना जाता है। परंतु झीलों के साथ-साथ यहाँ की सुंदर पहाड़ियाँ भी पर्यटकों को लुभाती हैं। Yatrafiber के आज के ब्लॉग में हम ‘रायता हिल्स’ के बारे में जानेंगे।

‘रायता हिल्स’ नाम सुनकर तो प्रसिद्ध खाद्य व्यंजन ‘रायता’ ही याद आता है। लेकिन यह कोई खाद्य व्यंजन नहीं अपितु उदयपुर में स्थित सुरम्य पहाड़ियाँ हैं। उदयपुर जंक्शन रेलवे स्टेशन उदयपुर रोडवेज बस स्टैंड, उदयपोल दोनों से ही रायता हिल्स की दूरी लगभग 16-17 किलोमीटर है। नजदीकी हवाई मार्ग की बात करें तो महाराणा प्रताप हवाईअड्डा, डबोक से इनकी दूरी 35 किलोमीटर है। तीनों ही जगह से रायता हिल्स के लिए आसानी से वाहन मिल जाते हैं।

मुख्य उदयपुर शहर से दूर गिरवा तहसील के एक छोटे से ग्रामीण अंचल में स्थित रायता हिल्स कुदरती खूबसूरती से परिपूर्ण हैं। हरे-भरे वृक्षों तथा घास से ढकी ये पहाड़ियाँ ‘नेचर रिजर्व एरिया’ में भी शामिल हैं।

उदयपुर घूमने के लिए मानसून के मौसम को बेहतरीन माना जाता है, परंतु रायता हिल्स का वातावरण वर्ष के अधिकांश समय सुहावना ही रहता है। तभी शहर की भीड़भाड़ से दूर स्थित ये पहाड़ियाँ हमेशा लोगों से गुलजार रहती हैं।

शहर से दूर रायता हिल्स की ओर जाने वाले घुमावदार रास्ते पर चारों ओर फैली हरियाली के बीच सफर करना ही अपने आप में आनंददायक है। मानसून के मौसम में तो यहाँ का माहौल और भी खुशनुमा हो जाता है। पहाड़ियों के बीच बिखरे बादलों से बरसती बूँदों वाला नजारा किसी हिल स्टेशन से कम नहीं होता। बारिश के बाद तो मानो सभी ओर हरियाली की चादर सी बिछ जाती है। ऐसे में यहाँ आने वाले पर्यटकों की संख्या में भी बढ़ोतरी हो जाती है।

रायता हिल्स से सूर्योदय तथा सूर्यास्त का इतना सुंदर दृश्य दिखाई देता है कि उसे सभी कैमरे में कैद करने के लिए लालायित रहते हैं। वैसे भी अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के चलते वर्तमान में यह स्थान प्री-वेडिंग व मॉडलिंग फोटोशूट करवाने वाले लोगों का पसंदीदा स्थल बना हुआ है। साथ ही मीडिया कंटेंट जैसे रील्स आदि बनाने वाले लोगों की भीड़ भी यहाँ हर समय लगी रहती है।

हरियाली की चूनर ओढ़े पहाड़ियों के पर कुदरती नजारों के बीच बैठकर बतियाते हुए कब सुबह से शाम हो जाती है, पता ही नहीं चलता। यहाँ आस-पास ज्यादा कुछ नहीं मिलता। बस कुछ छोटी-मोटी चाय-मैगी, बिस्किट की स्टॉल ही उपलब्ध हैं। वैसे मानसून के भीगे मौसम में यहाँ पहाड़ों वाली मैगी की अनुभूति ली जा सकती है।

उदयपुर या इसके आस-पास के निवासियों के लिए परिवार तथा दोस्तों के साथ शांति से सुकून भरे पल बिताने के लिए तो यह एक उपयुक्त स्थान है ही, बल्कि उदयपुर घूमने आने वाले पर्यटकों को भी अगर शुद्ध प्राकृतिक वातावरण की तलाश है तो यहाँ आकर समय बिताना बिल्कुल भी व्यर्थ नहीं जाएगा।

सोमवार, 15 दिसंबर 2025

पहाड़ों से घिरा दैव्य तीर्थ स्थल : वैष्णो माता धाम ( द्वितीय व अंतिम भाग )

पहाड़ों से घिरा दैव्य तीर्थ स्थल : वैष्णो माता धाम ( द्वितीय व अंतिम भाग )

सादर प्रणाम प्रिय पाठकों,

Yatrafiber के पिछले ब्लॉग में मैंने अपनी वैष्णो माता यात्रा के अनुभव साँझा किए थे। आज का ब्लॉग उस से आगे की यात्रा से संबंधित है।

भैरव बाबा का स्थान वैष्णो माता से लगभग 1.5-2.0 किलोमीटर ऊपर स्थित है, जहाँ तक पहुँचने के लिए सीधी ढलानों वाली काफी कठिन चढ़ाई वाला रास्ता है। साथ ही पिट्ठू की सवारी करके भी ऊपर पहुँचा जा सकता है। इसके अलावा माता के दरबार से ऊपर भैरव बाबा तक जाने के लिए रोप-वे की सुविधा भी उपलब्ध है। रोप-वे के पास बहुत लंबी लाईन लगी होने के कारण हम सबने पैदल ही ऊपर जाने की ठानी।वहाँ बच्चों के लिए छोटी गाड़ी वाले भी उपलब्ध हैं, जिनको शुल्क चुकाकर छोटे बच्चों को उसमें बैठाया जा सकता है, ताकि आपको पैदल चलने में असुविधा नहीं हो। हमारी बिटिया भी तीन वर्ष की होने के कारण न तो उसका पैदल चलना संभव था और ना हि इस कठिन रास्ते में उसे गोदी में उठाकर चलना हमारे लिए संभव था। अतः हमने भी एक गाड़ी वाले भैया से बात करके बिटिया को गाड़ी में बैठा दिया और उसके साथ-साथ पैदल चलने लगे। इस तरह कठिन रास्ते को पार कर ऊपर भैरव स्थल पहुँचकर सबने भैरू बाबा के दर्शन किए।

कहा जाता है कि वैष्णो माता द्वारा भैरव जी का सिर काटने पर वह ठीक इसी स्थान पर आकर गिरा था। फिर भैरव बाबा ने जब मैया से माफी माँगी, तब उन्होंने भैरव जी को आशीर्वाद दिया कि मेरे दर्शन तभी पूरे माने जाएँगे, जब यहाँ आने वाले श्रद्धालु मेरे साथ-साथ तुम्हारे भी दर्शन करेंगे। कालांतर में यहाँ मंदिर का निर्माण करवाया गया और यहाँ आने वाले सभी लोग माताजी के साथ-साथ भैरू बाबा के दर्शन भी अवश्य करते हैं।

इतनी ऊँचाई से नीचे चारों ओर का रमणीक दृश्य देखकर मन हर्षोल्लास से भर उठा। कुछ देर बैठकर सबने विश्राम किया और फिर वहाँ की प्राकृतिक खूबसूरती के बीच बहुत सारी फोटो खिंचवायी। हरी-भरी घाटी में छितराए हुए बादलों वाले मनोरम दृश्यों को देखते हुए वहाँ घंटों तक बैठे रहा जा सकता है। मस्ती और बातों के बीच बच्चों ने वहाँ कुछ स्नैक्स(नाश्ता) का आनंद लिया।


अब हमें वापस नीचे उतरना था। वापसी के समय रोप-वे के पास भीड़ नहीं होने के कारण सबने रोप-वे का अनुभव लेने की ठानी। रोप-वे की टिकट का शुल्क 100 रुपये प्रति व्यक्ति है, जिससे एक या दोनों तरफ की यात्रा की जा सकती है। टिकट लेकर सब लोग ट्रॉली(केबल कार) में सवार हो गए। इस केबल कार में एक बार में लगभग 45 लोग सवार हो सकते हैं तथा भैरव मंदिर से वैष्णो माता मंदिर की दूरी पार करने में मात्र 3-4 मिनट लगते हैं। केबल पर लटकती वातानुकूलित ट्रॉली में खड़े होकर चारों तरफ के मनोरम दृश्य को निहारने का रोमांच ही कुछ अलग है। ट्रॉली से नीचे घाटी का खूबसूरत नजारा दिखाई देता है। बच्चे, बुजुर्ग, दिव्यांगों के लिए रोप-वे विशेष रूप से उपयोगी है, क्योंकि रोप-वे उन्हें वैष्णो माता से भैरव जी की कठिन चढ़ाई के कष्ट से बचा लेता है। हालांकि जब रोप-वे प्रारंभ हुआ तो पिट्ठू व पालकी के मालिकों और स्थानीय दुकानदारों ने इसका विरोध किया था, क्योंकि उनके अनुसार यह उनके रोजगार के लिए खतरा था।


रोप-वे का अनुभव लेने के बाद अब हमें वापस नीचे कटरा पहुँचना था। सबसे पहले तो हमने बच्चों के लिए गाड़ी वालों से बात की, क्योंकि थकान के कारण उन्हें गोद में उठाकर नीचे उतरना संभव नहीं था। बाकी सबने पदयात्रा का आनंद लेते हुए ही नीचे उतरना पसंद किया। पतिदेव बिटिया का ध्यान रखते हुए गाड़ीवाले भैया के साथ-साथ चल रहे थे तो बाकी सब भी यात्रा के आनंद के विषय में बातें करते हुए चल पड़े। आने-जाने वाले सभी भक्तगण माता जी के जयकारे लगा रहे थे। चारों ओर पहाड़ों के दिलफरेब नजारों के बीच आते-जाते श्रद्धालुओं की कतारें चली जा रही थीं। नीचे उतरते समय ढलान के कारण चढ़ने की अपेक्षा कम समय लगता है। रास्ते में एक जगह सभी लोग चाय-कॉफी का लुत्फ उठाने के लिए रूके और फिर बिना रूके नीचे उतरने की ठानकर चल पड़े। सभी का बिल्कुल एक साथ एक गति से चलना संभव नहीं होने के कारण पहले ही तय कर लिया गया कि जो भी सदस्य नीचे पहुँचते जाएँ, वे प्रवेश द्वार के पास बैठकर बाकी सबका इंतजार करेंगे। अंततः 15 अप्रेल, 2022 को देर शाम तक ग्रुप के सभी सदस्य प्रवेश द्वार पर एकत्र हो गए। सभी ने एक बार फिर एक साथ ‘जय माता दी’ जयकारा लगाया और फिर ऑटो में बैठकर चल दिए होटल की तरफ। होटल पहुँचकर गर्म पानी से स्नान का आनंद लिया। थकान के कारण किसी का भी बाहर जाने का मन नहीं था, अतः सबने होटल में ही खाना मँगवाकर खाया और सोने चल दिए, क्योंकि अगले दिन सुबह हमें शिवखोड़ी दर्शन हेतु भी निकलना था।

अगले दिन यानि 16 अप्रेल, 2022 को सुबह तैयार होकर सभी लोग होटल के स्वागत-कक्ष में एकत्र हुए। कटरा से शिवखोड़ी की दूरी लगभग 80 किलोमीटर है। वैसे तो कटरा से शिवखोड़ी के लिए सार्वजनिक बसें वगैरह भी आसानी से मिल जाती हैं, परंतु हम तो खुद ही इतने लोग साथ थे कि हमने स्वयं किराए पर बस लेने का तय किया। बस में सवार होकर हम लोग शिवखोड़ी के लिए चल पड़े। पहाड़ों के बीच घुमावदार रास्तों से गुजरते हुए हर तरफ एक से एक सुंदर नजारे दिखाई देते हैं, जो प्रकृति के अनुपम रूप को दर्शाते हैं। लंबे सफर को काटने के लिए सबने अंत्याक्षरी खेलने का मन बनाया और बस एक से एक शानदार गानों का समां बँध गया। हँसते-गाते कब आधा रास्ता गुजर गया, पता ही नहीं चला। सभी को तेज भूख लगी थी तो रास्ते में एक अच्छा सा रेस्तरां देखकर बस रूकवायी और जुट गए पेट पूजा में। भोजन के बाद फिर से चल दिए सुहाने सफर पर।

कटरा से शिवखोड़ी जाते समय रास्ते में कटरा से लगभग 25 किलोमीटर की दूरी पर जम्मू के रियासी जिले में चिनाब नदी रिवर राफ्टिंग के लिए प्रसिद्ध है। अतः हम सब भी रिवर राफ्टिंग का अनुभव लेने हेतु रियासी में रुके। बुकिंग करवाने के बाद हमने अपनी बस को वहीं छोड़ा, क्योंकि रिवर राफ्टिंग वाला स्थान कुछ दूरी पर था। वहाँ तक पहुँचने का अनुभव तो और भी मजेदार था, क्योंकि तब हमारी शाही सवारी बनी एक ट्रॉली गाड़ी, जिसमें दरी बिछी हुई थी तो उसी शाही कालीन पर हम सब विराजित हो गए और हमारी छत थी वही नावें जिनसे हम रिवर राफ्टिंग करने वाले थे। रिवर राफ्टिंग वाले स्थल पर पहुँचकर सबसे पहले हमें वहाँ रिवर राफ्टिंग से संबंधित संपूर्ण सुरक्षा जानकारी दी गई, जिन्हें हमने बड़े ध्यान से सुना, ताकि हम सुरक्षित रूप से रिवर राफ्टिंग कर सकें।फिर सभी ने हेलमेट लगाए तथा लाइफ जैकेट पहनी, जो कि दुर्घटनावश पानी में गिरने पर डूबने से बचती है। इसके बाद दो नावों पर सवार होकर चल पड़े हम लोग एक रोमांचक सफर पर। पानी की तेज लहरों को काटते हुए आगे बढ़ने के लिए सभी को तेजी से चप्पू चलाने पड़ते हैं। चप्पू चलाते-चलाते हाथों में दर्द ही होने लगता है, लेकिन लहरों में हिचकोले खाती नाव को आगे बढ़ाने में इतना मजा आता है ना कि इसके सामने छोटा-मोटा दर्द तो कुछ भी नहीं है। रिवर राफ्टिंग करने के साथ-साथ वहाँ हमने बहुत सी फोटो भी खिंचवायी और फिर इस साहसी रोमांचक खेल की यादों का पिटारा लिए वापस चल दिए अगले पड़ाव यानि शिवखोड़ी की ओर।

शिवखोड़ी में भगवान शिव को समर्पित प्राकृतिक गुफा है, जो कि रियासी जिले के संगरी गाँव में स्थित है। शिवखोड़ी जाने के लिए रणसू गाँव पहुँचना पड़ता है, जो कि शिवखोड़ी गुफा से लगभग 6-7 किलोमीटर दूर स्थित है। आगे की यात्रा पैदल या पिट्ठू पर की जा सकती है। रणसू पहुँचकर बुजुर्गों व बच्चों के लिए हमने पिट्ठू पर यात्रा करना चुना, ताकि वे आसानी से गुफा तक पहुँच सकें। जबकि बाकी लोग पैदल ही ‘बम बम भोले‘ का जयकारा लगाते हुए चल पड़े।

रणसू से शिवखोड़ी गुफा जाने के दौरान कुछ दूरी पर एक नदी भी आती है, जिसे दूधगंगा कहा जाता है। बड़े-बड़े हरे-भरे पेड़ों से ढके ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों पर भक्तगण ‘बम बम भोले‘, ‘ॐ नमः शिवाय‘ के जयकारे लगाते, भक्ति में झूमते गाते इस प्राकृतिक गुफा तक दर्शन हेतु पहुँचते हैं। पूरा रास्ता प्रकृति की चित्ताकर्षक तस्वीर सी प्रस्तुत करता लगता है। इन्हीं हसीन नजारों से होकर हम भी शिवखोड़ी गुफा तक पहुँचे।



शिवखोड़ी शब्द शिव और खोड़ी यानी खोर को मिलाकर बनता है। खोर का अर्थ होता है - गुफा अर्थात् ऐसी गुफा जो शिवजी का निवास स्थान है। मान्यता के अनुसार शिवजी इस गुफा में सपरिवार रहते हैं। यह गुफा लगभग 150 मीटर लंबी है। इस संकरी गुफा से होकर श्रद्धालु शिवजी के दर्शन करने अंदर जाते हैं। गुफा में जगह-जगह प्राकृतिक रूप से पानी टपकता रहता है। गुफा के अंदर स्वयंभू यानि अपने आप प्रकट होया हुआ शिवलिंग स्थित है। शिवलिंग लगभग 4 फीट ऊँचा है तथा उसपर निरंतर गुफा से प्राकृतिक जलाभिषेक होता रहता है। इस गुफा में माता पार्वती, कार्तिकेय जी, गणेश जी, नंदी महाराज सभी की मूर्ति प्राकृतिक रूप से अपने आप बनी हुई है। गुफा की छत पर सर्प की आकृति का बना होना भी लोगों को आश्चर्यचकित करता है। लोगों का मानना है कि इस गुफा से एक रास्ता सीधे अमरनाथ गुफा तक जाता है। प्राचीनकाल में साधु-संत इसी रास्ते का उपयोग कर अमरनाथ जाया करते थे, परंतु वर्तमान में इस रास्ते को बंद कर दिया गया है। इसके अलावा गुफा में एक और रास्ता भी है, जिसके बारे में लोकश्रुति है कि यह रास्ता सीधे स्वर्ग तक जाता है।

इस गुफा से जुड़ी पौराणिक कथा भी भगवान शिव से संबंधित है, जिसके अनुसार भस्मासुर नामक दैत्य ने तपस्या से भगवान शिव को प्रश्न कर उनसे वर माँगा कि मैं जिसके भी सिर पर हाथ रखूँ, वह जलकर भस्म हो जाए। शिवजी ने उसे यह वर दे दिया, तब भस्मासुर ने मद में चूर होकर भगवान शिव को ही भस्म कर देना चाहा। शिवजी और भस्मासुर में युद्ध हुआ, तब शिवजी इस गुफा में आकर छुप गए। पीछे-पीछे भस्मासुर भी गुफा में आ गया। तब विष्णु जी एक सुंदर स्त्री का रूप धरकर आए। भस्मासुर उनपर मोहित हो गया और उनके साथ नृत्य करने लगा। नृत्य करते-करते उसका ध्यान भटक गया तथा उसने अपने ही सिर पर हाथ रख दिया, जिससे वह जलकर राख हो गया। इस प्रकार भस्मासुर का अंत हुआ।

गुफा के अंदर पंडित जी लोगों को गुफा से जुड़ी कथा तथा इसके महत्त्व को बताते रहते हैं। गुफा के अंदर काफी अंधेरा रहता है, अतः सुविधा हेतु लोग टॉर्च भी साथ ले जाते हैं। शिवलिंग तथा शिव परिवार के दर्शन हेतु एक कृत्रिम रास्ता भी बनाया गया है, जो कि सीधे शिवलिंग स्थल से जुड़ा हुआ है। गुफा वाला रास्ता संकरा होने के कारण उसमें से सीमित लोगों को ही प्रवेश दिया जा सकता है। अतः भीड़ बढ़ने पर सीधे रास्ते से ही प्रवेश दिया जाता है, ताकि सभी लोग शिवलिंग के दर्शन पा सकें। एक प्राकृतिक गुफा में सम्पूर्ण शिव परिवार की छवि अपने आप प्रकट होना लोगों को अचंभित कर देता है। खैर हम सबने भी पूर्ण श्रद्धा भाव से शिवलिंग के साथ-साथ सम्पूर्ण शिव परिवार के दर्शन किए, कुछ देर वहाँ रुककर गुफा के महत्त्व के बारे में जाना तथा प्रसाद प्राप्त किया।

प्रभु शिव को समर्पित इस दैव्य गुफा के दर्शन कर हम लोग वापस रणसू के लिए चल दिए। इस बार सब लोग पैदल ही वापस आए। रास्ते के सुंदर दृश्यस्थलों पर फोटो खिंचवाते तथा आपस में बातें करते हुए कब हम लोग रणसू पहुँच गए, पता ही नहीं चला।


शाम हो चुकी थी, अतः सभी लोग बस में सवार हुए और जम्मू के लिए निकल गए। रास्ते में फिर से अंत्याक्षरी का दौर चला। वापसी में रास्ते में एक जगह चाय की चुस्कियों के बाद वापस चल दिए और सीधे होटल जाकर ही रूके। होटल पहुँचने तक रात के लगभग 11 बज चुके थे और थकान से बुरा हाल था। रेस्तरां जाने की हिम्मत नहीं थी, तो होटल में ही खाना मँगवाया और सबने साथ बैठकर खाया। खा-पीकर सभी लोग सोने चले गए।

अगले दिन यानि 17 अप्रेल, 2022 को हमें वापस गृहस्थान की ओर कूच करना था। अतः सुबह उठकर, तैयार होकर गाड़ी मँगवायी और जम्मू हवाईअड्डे के लिए निकल गए। जम्मू से दिल्ली हवाईजहाज और फिर दिल्ली से जयपुर ट्रेन का सफर कर हम जब घर पहुँचे तो हमारे पास एक बहुत ही यादगार धार्मिक यात्रा का शानदार अनुभव था। आज के दौर की इस भागमभाग वाली जिंदगी के बीच हमें अपने करीबियों के साथ इस तरह की यात्रा के अवसर अवश्य खोज लेने चाहिए दोस्तों, क्योंकि ये अवसर हमारी बोझिल बनती जिंदगी में फिर से ताजगी और स्फूर्ति ला देते हैं।




गुरुवार, 4 दिसंबर 2025

पहाड़ों से घिरा दैव्य तीर्थ स्थल : वैष्णो माता धाम ( प्रथम भाग )

पहाड़ों से घिरा दैव्य तीर्थ स्थल : वैष्णो माता धाम ( प्रथम भाग )

सादर प्रणाम प्रिय पाठकों,

हरे-भरे पेड़ों से ढके हुए ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों के बीच ‘प्रेम से बोलो जय माता दी, जोर से बोलो जय माता दी’ जैसे जयकारों से गूंजते असीम सुखकारी श्रद्धापूरित वातावरण की बात की जाए तो सुनने वालों के ध्यान में सिर्फ और सिर्फ एक ही नाम आता है और वो है ‘श्री वैष्णो माता धाम’

Yatrafiber के आज के ब्लॉग में मैं वैष्णो माता यात्रा से जुड़े अपने अनुभव साझा करना चाहूँगी ।

वैष्णो माता जी हमेशा से ही मेरा व मेरे पति का पसंदीदा दर्शनीय स्थल रहा है। कोरोना काल के बाद काफी समय से हम वैष्णो माता यात्रा के इच्छुक थे और ऐसी ही इच्छा हमारे कुछ मित्र परिवारों की भी थी। सभी ने आपस में बातचीत की और अप्रेल माह में वैष्णो माताजी जाना तय किया गया। छोटे-बड़े सब मिलाकर हम 23 लोग वैष्णो माताजी जाने वाले थे। हम सभी जयपुर निवासी हैं, अतः हमने 13 अप्रेल, 2022 को जयपुर से जम्मू तक के लिए ‘पूजा एक्सप्रेस’ ट्रेन में आरक्षण करवा लिया और उत्साहपूर्वक प्रस्थान दिवस का इंतजार करने लगे।

13 अप्रेल, 2022 की शाम को हम सभी अपने-अपने सामान के साथ गाँधीनगर रेलवे स्टेशन, जयपुर पहुँच चुके थे। सभी की खुशी और उत्साह देखने लायक था। नियत समय पर ट्रेन आयी और माताजी के जयकारे के साथ हम सब चल दिए अपने गंतव्य की ओर। ट्रेन में बच्चों की मस्ती, बड़ों के हँसी-मजाक और बुजुर्गों की मुस्कान से शानदार माहौल बन गया। बातें करते-करते रात के 8 बज गये और सभी को भूख भी लग गई थी तो बस सभी ने अपने साथ लाया ढेर सारा भोजन निकाला और सजा दिया प्लेट्स में। तरह-तरह के व्यंजनों से ट्रेन की बोगी महकने लगी। ट्रेन के सफर और भोजन का रिश्ता ही कुछ ऐसा है कि भूख अपने आप दुगुनी हो जाती है। सभी ने इस रात्रिभोज का आनंद लिया। पेटभर भोजन करने के बाद सभी ने अपनी-अपनी सीट ले ली और बातें करते-करते सो गए। सुबह उठने के साथ ही शुरू ही गया जम्मू पहुँचने का इंतजार और आखिर 14 अप्रेल, 2022 को सुबह लगभग 7:30 बजे हम जम्मू स्टेशन पहुँच ही गये।

जम्मू से कटरा के लिए हमने ट्रेन बदली और ट्रेन के चलने के साथ ही शुरू हुआ एक बहुत ही रोमांचक सफर। जम्मू से कटरा तक का रेलवे ट्रेक बहुत ही सुंदर प्राकृतिक दृश्यों से परिपूर्ण है। आस-पास की खूबसूरत दृश्यावली इस रास्ते को खास बनाती है। सफर कर रहे यात्री जैसे रास्ते के प्राकृतिक सौंदर्य में खो से जाते हैं। कहीं दूर-दूर तक बड़े-बड़े पेड़ों की हरियाली से ढकी हुई धरती, तो कहीं कल-कल बहती नदी, प्रकृति का ऐसा सुंदर रूप कि बस उसको नजरों में भर लेने का मन होता है। नदियों में पानी की तेज धार से बड़े-बड़े पत्थर भी ऐसा सुंदर गोल रूप धारण कर लेते हैं कि मानो किसी साँचे में ढाल कर बनाये गये हों।


                                        

इस रास्ते से गुजरते हुए छोटी-छोटी तक़रीबन 35 सुरंगें आती हैं, जो कि यात्रा को और अधिक रोमांचक बना देती हैं। जैसे ही ट्रेन किसी सुरंग में प्रवेश करती है, यात्रियों में रोमांच की लहर सी दौड़ जाती है। सुरंग में बच्चों के साथ मिलकर जब सभी बड़े भी हूटिंग करते हैं, तो जैसे सबका बचपन जीवित हो उठता है। ना सिर्फ सुरंगें बल्कि कई छोटे-बड़े पुलों से होकर भी ट्रेन गुजरती है। हरी-भरी वादी में नीचे नदी में बहता साफ पानी और ऊपर पटरी पर दौड़ती हुई ट्रेन किसी फिल्मी दृश्य जैसा प्रतीत होता है।

रास्ते में एक जगह क्रॉसिंग के लिए ट्रेन रुकी तो आस-पास के पेड़ों से बहुत से बंदर भोजन की आस में बाहर निकल आए। रात्रि भोजन में से बचे हुए परांठे, पूरी आदि उन बंदरों को खिलाते हुए बच्चे बहुत खुश हो रहे थे। कुछ देर बाद ट्रेन चल पड़ी और एक सुहाने सफर के बाद हम सब कटरा स्टेशन पहुँच गए।

जम्मू में पोस्टपेड सिम या फिर वहीं की प्रीपेड सिम ही काम करती है, दूसरे राज्यों की प्रीपेड सिम वहाँ पहुँचकर काम करना बंद कर देती है। हम में से किसी के भी पास पोस्टपेड सिम नहीं थी। अतः कटरा पहुँचते ही हमने सबसे पहले वहाँ के नंबर की 4-5 सिम खरीदीं ताकि सब आपस में और अपने परिवार से संपर्क में रह सकें। कटरा रेलवे स्टेशन के बाहर वहाँ की प्रीपेड सिम लगभग 300 रुपये में आसानी से मिल जाती है और सिम लेने के बाद कुछ ही देर में काम भी करना शुरू कर देती है।

कटरा में हमने पहले से ही होटल में कमरे बुक कर रखे थे, जो कि स्टेशन से अधिक दूरी पर नहीं थे। अतः सिम लेने के बाद सब लोग होटल पहुँचे और अपने-अपने कमरे में चले गए। सबने नहा-धोकर कुछ देर आराम किया। सुबह से हल्का-फुल्का नाश्ता ही किया होने के कारण शाम को सबको जल्दी भूख लग गयी तो हम सब लोग भोजन करने हेतु पास ही एक रेस्तरां में पहुँचे और स्वादिष्ट भोजन का आनंद लिया। फिर थोड़ा बहुत आस-पास का बाजार देखने के बाद हम सब अपने होटल आ गए। सबने बैठकर कुछ देर बातें की और यह तय किया कि सुबह 3 बजे से वैष्णो माँ के दरबार के लिए यात्रा प्रारम्भ करनी है, फिर सभी सोने चले गए।

रात्रि 2:30 बजे तक सब लोग नहा-धोकर तैयार होकर होटल के स्वागत कक्ष में इकट्ठे हो गए। जम्मू में ऑटोरिक्शा किसी भी समय आसानी से मिल जाते हैं, अतः हम लोगों ने भी ऑटोरिक्शा बुलाए और दरबार के लिए यात्रा प्रारम्भ होने वाले स्थल पर पहुँच गए। वहाँ प्रसाद, फूल-माला, अन्य पूजन सामग्री, माताजी की मूर्तियाँ, तस्वीरें और इसी तरह की अन्य सामग्री की बहुत सारी दुकानें हैं। हमने वहाँ से माताजी को चढ़ाने के लिए चुनरी-जोड़ा, प्रसाद तथा माथे पर बाँधने के लिए ‘जय माता दी’ लिखी पट्टियाँ खरीदीं। सबने माताजी का जयकारा लिखी पट्टियाँ माथे पर बाँधी और यात्रा प्रारम्भ करने हेतु चल पड़े। सभी माँ वैष्णो के दर्शन पाने के उत्साह से लबरेज थे।

वैष्णो माता के दर्शन हेतु आने वाले सभी श्रद्धालुओं के लिए यात्रा का रजिस्ट्रेशन कराना अति आवश्यक है जो कि नि:शुल्क होता है। यह रजिस्ट्रेशन वहाँ ऑफलाइन भी करवा सकते हैं या फिर ऑनलाइन भी करवाया जा सकता है। हमने पहले ही वैष्णो माता धाम की वेबसाइट से ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन करवा लिया था, जिसकी पर्ची दिखाकर हमने दरवाजे के अंदर प्रवेश किया।

यहाँ जानकारी के लिए मैं बता दूँ कि गुटखा, पान-मसाला, बीड़ी, सिगरेट, लाईटर जैसे ज्वलनशील पदार्थ और नुकीले हथियार जैसी सामग्री दरबार में ले जाना निषेध है। अगर किसी व्यक्ति के पास ऐसा कोई सामान होता भी है तो उसे बाहर ही छोड़ना पड़ता है। हर एक व्यक्ति को पूरी तलाशी के बाद ही अंदर प्रवेश दिया जाता है।

चूँकि हमारे साथ बड़े-बुजुर्गों से लेकर बच्चे तक सभी तरह के सदस्य थे, अतः हमने अर्द्धकुमारी तक का रास्ता खच्चर पर बैठकर पार करना तय किया। वहाँ बहुत सारे खच्चर वाले उपलब्ध थे, तो हमने उनसे मोलभाव किया। अकेले बैठने वालों के लिए 700 रूपये तथा बच्चे के साथ बैठने वालों के लिए 950 रूपये चुकाने की बात तय हुई और हम माताजी के जयकारे के साथ चल पड़े दरबार की ओर। खच्चर के चलने के साथ ही मेरी बिटिया का ‘चल मेरे घोड़े टिक टिक टिक’ वाला गीत शुरू हो गया। हमारे साथ के दो-तीन युवाओं ने पूरा रास्ता पैदल चढ़ाई करने का निश्चय किया और जोश से माताजी के जयकारे लगाते हुए चल पड़े।

जो लोग पैदल यात्रा करने में असमर्थ हैं, उनके लिए कटरा से ऊपर माताजी के दरबार यानी भवन तक की यात्रा के लिए खच्चर, पालकी, बैटरी कार, हेलीकॉप्टर जैसी सुविधाएँ भी उपलब्ध हैं। यात्री अपनी आवश्यकतानुसार इनका उपयोग किराया चुकाकर कर सकते हैं। हेलीकॉप्टर की सेवा कटरा से सांझी छत के लिए उपलब्ध है, वहाँ से लगभग 2.5 किलोमीटर की यात्रा पैदल पार करनी होती है।

कटरा से माताजी के भवन की दूरी लगभग 13 किलोमीटर है तथा अर्द्धकुमारी को इसका मध्य बिंदु माना जाता है। यहाँ पर एक प्राचीन गुफा मौजूद है, जो कि काफी संकरी है, भक्तों को झुककर या कुछ स्थानों पर रेंगकर इसे पार करना पड़ता है। इस गुफा के बारे में मान्यता है कि यहाँ वैष्णो माता ने नौ महीनों के लिए शरण ली थी तथा यहाँ बैठकर तपस्या की थी। इस गुफा का आकार गर्भ के समान होने के कारण इसे गर्भजून गुफा भी कहा जाता है। कटरा से अर्द्धकुमारी तक जाने के लिए भी दो रास्ते हैं, एक पुराना रास्ता है जो कि थोड़ा लंबा है तथा दूसरा भीड़ का दबाव कम करने के लिए बनाया गया नया रास्ता जो कि पुराने रास्ते की अपेक्षा दूरी को भी थोड़ी कम करता है।

कटरा से यात्रा प्रारम्भ करने पर रास्ते में पवित्र बाणगंगा नदी आती है। मान्यता है कि यह नदी स्वयं माता वैष्णो देवी द्वारा धरती में तीर मारकर उत्पन्न की गई थी, इसी कारण इसका नाम बाणगंगा पड़ा। श्रद्धालु इस नदी में स्नान करके यात्रा प्रारम्भ करते हैं, क्योंकि माना जाता है कि बाणगंगा में स्नान करने से सारे पाप धुल जाते हैं और व्यक्ति पावन हो जाता है। शीतल जल से स्नान करके चित्त भी शुद्ध हो जाता है। बाणगंगा से थोड़ा आगे जाकर चरण पादुका मंदिर आता है, जहाँ माताजी ने अपने चरण चिह्न छोड़े थे। इस मंदिर में आज भी माताजी के चरण चिह्न मौजूद है, जिनके लोग दर्शन करते हैं।

रास्ते की रौनक और भक्तिमय माहौल के बीच कब हम अर्द्धकुमारी पहुँच गये पता ही नहीं चला। कटरा से अर्द्धकुमारी पहुँचने में हमें लगभग डेढ़ घंटे का समय लगा। अर्द्धकुमारी गुफा के अंदर जाने के लिए लोगों की लंबी लाइन लगी रहने के कारण घंटों इंतजार करना पड़ता है। बच्चे व बुजुर्गों के साथ इतना इंतजार करना संभव नहीं होने के कारण हमने सीधे ऊपर जाकर माता वैष्णो देवी के दर्शन करना तय किया। परन्तु आगे का रास्ता हमें पैदल पार करना था, इसलिए कुछ देर किसी रेस्तरां में विश्राम करना तय किया गया। वहाँ हमने बच्चों को नाश्ता करवाया तथा कुछ लोगों ने चाय-कॉफी का आनंद लिया और कुछ ने बिना कुछ खाए-पिए माताजी के दर्शन करने का निर्णय लिया। लगभग एक घंटे बाद हमने अपनी पदयात्रा प्रारम्भ की। वैष्णो माताजी के दर्शन का असली आनंद ही पदयात्रा करने में आनंद आता है।

 


पहाड़ों को काटकर बनाया गया बहुत सारे मोड़ लिया हुआ सर्पिलाकार रास्ता, रास्ते के किनारे अलग-अलग सामान से सुसज्जित दुकानें और माताजी के जयकारे लगाते, भक्ति में झूमते-गाते लोगों के काफिले लगातार आगे बढ़ रहे थे। जैसे-जैसे हम ऊँचाई पर चढ़ते जा रहे थे, बादलों के छोटे-बड़े टुकड़े हमसे नीचे तैरते नजर आने लगे थे। पहाड़ों के बीच कहीं-कहीं छोटे-छोटे घर नजर आ रहे थे और मेरे मन में उन घरों को देखकर विचार उमड़ रहा था कि कितना कठिन होता होगा इन पहाड़ी लोगों का जीवन, कैसे ये लोग इन पहाड़ों में जीवन के लिए आवश्यक सुविधाएँ जुटाते होंगे। वैष्णो माताजी के दरबार को जाने वाला ये रास्ता पूरी तरह छत से ढका हुआ है, जिसके कारण बारिश या धूप पदयात्रा में बाधक नहीं बनते। इसी प्रकार रोशनी की भी पर्याप्त व्यवस्था है, जिससे रात्रि में भी यात्रा की जा सकती है। यही कारण है कि माताजी के दरबार के लिए पदयात्रा दिन-रात हर समय चलती रहती है।


 

रास्ते में जगह-जगह पर पीने के पानी के नल और शौचालय की भी व्यवस्था है। चाय, कॉफी, पानी जैसी चीजें पूरे रास्ते में आसानी से उपलब्ध है। किसी व्यक्ति की अचानक से तबीयत खराब हो जाए तो अस्पताल की सुविधा भी उपलब्ध है। फिर भी एहतियात के तौर पर साधारण दवाईयों का किट अपने पास जरूर रखना चाहिए। पैदल यात्रा से थकान तो होती है पर इसके कारण श्रद्धालुओं के उत्साह में कोई कमी नहीं आती, अपितु जैसे-जैसे माँ का भवन पास आता जाता है, उत्साह बढ़ता ही जाता है।



रास्ते से जब भवन नजर आने लगता है तो थकान भूलकर कदम वैसे ही जल्दी-जल्दी आगे बढ़ने लगते हैं। तो यूँ ही माँ के जयकारे लगाते, हँसते-बोलते हम भी आखिर माँ भवानी के दरबार में पहुँच ही गए।



भवन के पास धर्मशाला, होटल आदि सब उपलब्ध हैं, जहाँ किराया चुकाकर रूका जा सकता है। इसके अलावा मुफ्त में बड़े-बड़े हॉल भी उपलब्ध हैं, जहाँ संयुक्त रूप से रूका जा सकता है तथा यहाँ पहले आओ पहले पाओ वाली स्थिति होती है। यहाँ पर स्नानगृह व शौचालय की भी सुविधा उपलब्ध है। श्रद्धालुओं की संख्या अधिक होने पर बहुत से लोग कॉरिडोर में भी सोते हुए दिख जाते हैं। भवन में कंबल भी उपलब्ध हैं, जो कुछ शुल्क चुकाकर प्राप्त की जा सकती हैं। बाद में कंबल वापस लौटाने पर जमा कराए गए पैसे वापस मिल जाते हैं।

ऊपर लॉकर की सुविधा भी उपलब्ध है, जहाँ शुल्क चुकाकर लोग अपने सामान को रख सकते हैं। माँ के मंदिर में पर्स, मोबाईल, घड़ी, चश्मा, बेल्ट तथा चमड़े से बनी अन्य सामग्री ले जाने की सख्त मनाही है। हम सब भी अपना समान सुरक्षित रखने के बाद दर्शन हेतु लाईन में लग गए। माँ वैष्णो के दर्शन हेतु बहुत लंबी कतार लगी होने के बावजूद भी ना तो कोई भी श्रद्धालु थका हुआ दिखता है और ना ही परेशान होता प्रतीत होता है, अपितु सब माँ के दर्शन पाने को लालायित नजर आते हैं। सभी लोग माँ के जयकारे लगाते हुए आगे बढ़ते जा रहे थे।

हरियाली की चादर ओढ़े पहाड़ों के बीच श्रद्धापूरित भक्तों से भरे हुए माँ के भवन में खुद के खड़े होने के एहसास से मन में भक्ति का सागर हिलोरे ले रहा था। ऐसे ही प्रसन्नचित मन से जय माता दी, जय माता दी जपते हुए जब हम माँ वैष्णो की गुफा के द्वार पर पहुँचे तो बस आतुर मन माँ के दर्शन को लालायित हो उठा। यहाँ की प्राकृतिक गुफा से होकर दर्शन करने का रास्ता ज्यादातर बंद ही रहता है, क्योंकि भीड़ के दबाव में संकरी गुफा से इतने लोगों का दर्शन करना संभव नहीं है। अतः कृत्रिम गुफा से ही दर्शन हेतु जाना पड़ता है। परंतु वर्षभर में जब भी भीड़ कम होती है, तब श्रद्धालुओं को प्राकृतिक गुफा से दर्शन का मौका भी मिलता है।

गुफा के अंदर कुछ दूर चलते ही तीन पिंडियों के रूप में माँ वैष्णो देवी विराजित हैं। ये तीनों पिंडियाँ त्रिकुटा पर्वत की इस गुफा में प्राकृतिक रूप से प्रकट हुई थीं। इन्हें देवी महालक्ष्मी, महासरस्वती तथा महाकाली का रूप माना जाता है तथा सम्मिलित रूप से वैष्णो माता के नाम से जाना जाता है। जैसे ही वैष्णो मैया के दर्शन हुए मन प्रसन्नता से झूम उठा और नजरें तो माँ के दिव्य स्वरूप से हटाए भी नहीं हट रही थीं। मन कर रहा था की बस यूँ ही एकटक उनको निहारते रहें। लेकिन माँ के दर्शन पाने के लिए भक्तों की कतार इतनी लंबी होती है कि न चाहते हुए भी आगे बढ़ना ही पड़ता है। गुफा में काफी कम जगह होने के कारण श्रद्धालुओं द्वारा लाई जाने वाली चुनरी, चोला, छत्र, प्रसाद जैसी वस्तुएँ माँ को छुआकर वापस श्रद्धालुओं को दे दी जाती हैं। इनमें से कुछ भी वहाँ नहीं रखा जाता है।

वैष्णो माता के दर्शन पाकर प्रसन्न मन से हम सभी बाहर निकले। बाहर माता का प्रसाद बँट रहा था, जो कि शुद्ध देशी घी में बना हुआ स्वादिष्ट हलवा था। प्रसाद ग्रहण कर हम आगे चल दिए। पिंडी दर्शन कर बाहर निकलने के बाद थोड़ी ही दूरी पर दाँयी तरफ नीचे कुछ सीढ़ियाँ नीचे उतरने पर भगवान शिव की गुफा है। अधिकांश दर्शनार्थियों को इसकी जानकारी नहीं होने के कारण बिना दर्शन किए ही निकल जाते हैं। यह एक प्राकृतिक गुफा है, जिससे पानी टपकता रहता है। यहाँ शिवलिंग की स्थापना की गई है। हमने भी इस छोटे से रमणीक स्थल पर शिवलिंग के दर्शन किए।

माँ वैष्णो के दर्शन पाकर अंतर्मन की खुशी तो सबके चेहरों से ही झलक रही थी। साथ ही सबको तेज भूख भी सता रही थी। अतः सबने तय किया कि अब हमें भोजन करना चाहिए। ऊपर भवन के पास रत्नसागर रेस्तराँ में भोजन किया जाना तय हुआ। सभी ने छककर भोजन का आनंद लिया। यहाँ के भोजन का स्वाद था भी बहुत ही लाजवाब। भोजन के बाद हमें और ऊपर भैरव बाबा के दर्शन हेतु जाना था।

क्रमश: ……..