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शुक्रवार, 2 अप्रैल 2021

भूतों की रहस्यमयी दुनिया वाला राजस्थान का सबसे हॉन्टेड स्थान : भानगढ़ किला

हैलो दोस्तों,

भूत, पिशाच, प्रेत, आत्मा, ये वे शब्द हैं, जिनका नाम सुनते ही कुछ लोग डर से सिहर उठते हैं, तो कुछ लोग एक सिरे से इनका अस्तित्व नकार देते हैं, क्योंकि उनके अनुसार ये सब सिर्फ कोरी कल्पना हैं। सम्पूर्ण विश्व में ऐसे बहुत से स्थान हैं, जिन्हें भूत-प्रेत जैसी नकारात्मक शक्तियों का वास-स्थल माना जाता है तथा लोग ऐसे स्थानों पर कदम रखने से भी डरते हैं। yatrafiber के आज के ब्लॉग में मैं भारत के सबसे डरावने हॉन्टेड प्लेसेज (भूतिया स्थल) में शामिल भानगढ़ के किले के बारे में बताना चाहूँगी।

भानगढ़ का किला राजस्थान के अलवर जिले में राजगढ़ नगरपालिका में स्थित है। भानगढ़ किले तक पहुँचने के लिए नजदीकी हवाई-अड्डा जयपुर इंटरनेशनल एयरपोर्ट है, जो कि यहाँ से लगभग 87 किमी दूर स्थित है। जयपुर जंक्शन रेलवे स्टेशन से इसकी दूरी लगभग 85 किमी है। जयपुर से निजी वाहन करके आसानी से भानगढ़ के किले तक पहुँचा जा सकता है। किले में प्रवेश हेतु मात्र 25 रुपये/व्यक्ति शुल्क लगता है तथा कैमरे का शुल्क 200 रुपये है। भानगढ़ किला घूमने के लिए अक्टूबर से फरवरी तक का समय सबसे अच्छा है, गर्मियों में तापमान अधिक होने के कारण घूमने में परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। मानसून में भी यहाँ भ्रमण किया जा सकता है।

भानगढ़ किले का निर्माण आमेर के शासक राजा भगवंत दास ने 16वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में करवाया था। बाद में माधोसिंह ने इसे अपनी राजधानी बना लिया था। सरिस्का अभयारण्य से मात्र कुछ किमी की दूरी पर अरावली पर्वतमाला से घिरे इस भानगढ़ किले की पूरी बस्ती तीन सुरक्षा प्राचीरों द्वारा सुरक्षित की गई थी, जिनमें से बाह्य सुरक्षा प्राचीर में पाँच द्वार - अजमेरी गेट, लाहौरी गेट, हनुमान गेट, फूलबारी गेट तथा दिल्ली गेट स्थित हैं।

अपनी भूतिया कहानियों के कारण लोगों के लिए कौतूहल का विषय बन चुके भानगढ़ किले के विषय में बहुत सी कथाएँ प्रचलित हैं। इनमें से सबसे अधिक प्रचलित कथा राजकुमारी रत्नावती की है। कहा जाता है कि भानगढ़ की राजकुमारी रत्नावती बहुत ही सुंदर थी। एक दिन जब वह अपनी सहेलियों के साथ बाजार में इत्र खरीद रही थी, तब सिंघिया नाम के तांत्रिक की नजर उसपर पड़ी। तांत्रिक राजकुमारी रत्नावती के रूप-सौंदर्य पर मर मिटा और उसे पाने के ख्वाब देखने लगा। तांत्रिक ने राजकुमारी को वश में करने हेतु उसकी पसंद के इत्र की बोतल पर वशीकरण मंत्र का प्रयोग किया, ताकि उसे इस्तेमाल करते ही रत्नावती उसके प्रेम में पड़ जाए। परन्तु रत्नावती को तांत्रिक के षड्यंत्र का पता चल गया तथा उसने इत्र की बोतल को एक पत्थर पर पटककर तोड़ दिया। वशीकरण मंत्र के प्रभाव से वह पत्थर तांत्रिक सिंघिया के पीछे लुढ़कने लगा और उसे कुचल दिया, जिससे उसकी मृत्यु हो गई। परन्तु मरने से पहले तांत्रिक ने श्राप दिया कि शीघ्र ही भानगढ़ के किले में मौत का तांडव होगा, सभी लोग मारे जाएँगे तथा भानगढ़ उजड़ जाएगा। तांत्रिक के श्राप के कारण भानगढ़ पूर्णतः वीरान हो गया। लोगों का मानना है कि आज भी किले में राजकुमारी रत्नावती की चीखें गूँजती हैं तथा उनके परिवार की आत्माएँ किले में भटक रही हैं।

ऐसी ही एक कथा तपस्वी बालानाथ से भी जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि महाराज ने भानगढ़ किले का निर्माण प्रारम्भ करवाने से पूर्व यहाँ तपस्या करने वाले बालानाथ जी से आज्ञा माँगी, तब तपस्वी बालानाथ ने आज्ञा देते हुए कहा कि किले की ऊँचाई इतनी ही रखना कि उसकी परछाई मेरे तपस्या स्थल तक ना पहुँचे। परन्तु निर्माण के समय ध्यान नहीं देने के कारण किला अधिक ऊँचा बनवा दिया गया, जिसके कारण उसकी परछाई तपस्वी बालानाथ के तप-स्थल तक पहुँच गई। तपस्वी बालानाथ ने क्रोधित होकर भानगढ़ के किले के उजड़ जाने का श्राप दे दिया, जिसके फलस्वरूप सबकुछ नष्ट हो गया तथा भानगढ़ का किला खण्डहर के रूप में ही शेष बचा। कहा जाता है कि तभी से मरने वाले लोगों की आत्माएँ यहाँ भटक रही हैं।

ऐसी ही कुछ अन्य कथाएँ भी भानगढ़ के किले के बारे में प्रचलित हैं। कथा चाहे जो भी हो, लेकिन यहाँ आस-पास के गाँवों में रहने वाले लोगों का दृढ़ विश्वास है कि किले में प्रेतात्माओं का निवास है। लोगों का कहना है कि यहाँ रात को अजीब सी चीखें सुनाई देती हैं तथा रात को इस किले में प्रवेश करने वाला कोई भी व्यक्ति जीवित वापस नहीं आता है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण की बात की जाए तो भानगढ़ के किले तथा इसके आस-पास के स्थलों पर पानी की कमी की समस्या थी। पानी की कमी के कारण लोगों का पलायन प्रारम्भ हुआ। फिर सन् 1783 में पड़े भीषण अकाल ने भानगढ़ को पूर्णतया उजाड़ दिया और तब से अब तक यह खण्डहर के रूप में मौजूद है।

भानगढ़ किले के उजड़ने के बाद बचे अवशेषों में प्राचीर, द्वार, बाजार, हवेलियाँ, मंदिर, शाही महल, छतरियाँ आदि शामिल हैं। वर्तमान में भानगढ़ का किला भारतीय पुरातत्त्व विभाग के अधीन है, जिसके द्वारा इसकी देखभाल की जाती है।

मुख्य द्वार से प्रवेश करते ही दाहिने हाथ पर हनुमान जी का छोटा सा मंदिर स्थापित है। सामने ही टिकटघर बना हुआ है। मुख्य द्वार के ठीक बाहर चाय, पानी, चाट, नींबू पानी, ज्यूस आदि बेचने वालों की भरमार है। मुख्य द्वार से काफी दूर तक चलने के बाद बाजार प्रारम्भ होता है। सड़क के दोनों ओर करीने से बनी एकसार दो मंजिला दुकानें उस समय की शानदार निर्माण-कला का प्रतिनिधित्व करती हैं। हालांकि वर्तमान में इन दुकानों की छत पूर्णतः नष्ट हो चुकी है। केवल चंद दीवारें मौजूद हैं, जिनको देखकर उस समय यहाँ लगने वाले व्यवस्थित बाजार की रौनक का अंदाजा लगाया जा सकता है।



भानगढ़ के किले में गोपीनाथ मंदिर, सोमेश्वर मंदिर, केशवराय मंदिर, मंगला देवी मंदिर आदि मंदिर स्थित हैं। ये सभी मंदिर नागर शैली में बने हुए हैं। किले के उजड़ने व खण्डित होने के बावजूद इन सभी मंदिरों का सही सलामत होना लोगों को आश्चर्यचकित कर देता है। हालांकि इनमें से कुछ मंदिरों में वर्तमान में कोई मूर्ति प्रतिष्ठित नहीं है। सुंदर नक्काशी युक्त ये मंदिर निर्माण-कला का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। मंदिरों की आंतरिक व बाह्य दीवारों पर बारीकी से तराशी गई कलाकृतियाँ इनकी भव्यता को प्रदर्शित करती हैं।






भानगढ़ किले का शाही महल वास्तव में सात मंजिला बनवाया गया था, परन्तु वर्तमान में इसकी मात्र चार मंजिलें ही मौजूद हैं। खण्डहर में तब्दील हो चुके इस शाही महल के अवशेषों को देखकर ही यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि अपने समय में सभी सुख-सुविधाओं से पूर्ण यह महल कितना भव्य और शानदार रहा होगा। महल में जाने वाले रास्ते की खड़ी चढ़ाई तथा विशाल द्वार इसे पर्याप्त सुरक्षा देते रहे होंगे।





किले के पास की पहाड़ी पर एक छतरी भी बनी हुई है, जिसे तांत्रिक की छतरी कहा जाता है। लोगों का मानना है कि तांत्रिक इसी छतरी में तंत्र-मंत्र किया करता था तथा आज भी इस छतरी में उसकी आत्मा का वास है।

किले में स्थित सोमेश्वर मंदिर के पास ही एक प्राकृतिक झरना भी स्थित है। झरने का जल नीचे बने कुण्ड में गिरता है। बरसात के मौसम में इस झरने में जल की पर्याप्त मात्रा रहती है। ASI (आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया) को यहाँ की गई खुदाई में इसके प्राचीन ऐतिहासिक स्थल होने के पर्याप्त सबूत मिले हैं।

भानगढ़ किले के वीरान भग्नावशेष ही इसे काफी भयावह स्वरूप प्रदान करते हैं। ऐसे में रात के समय किले को घेरे हुए पहाड़ियाँ व पहाड़ी पर तांत्रिक की छतरी, किले के सुनसान खण्डहर तथा उनमें चमगादड़ों की उपस्थिति, रात के सन्नाटे को चीरती झरने से गिरने वाले जल की ध्वनि और बंदरों की चीखें, तेज बहती हवा के कारण वृक्षों की पत्तियों की सरसराहट, सब मिलाकर किले को पूर्णतः भूतिया स्थल घोषित करते से प्रतीत होते हैं। रात्रि में जमीन पर पड़ने वाली ऊँचे पेड़ों की विशाल छाया, बरगद के वृक्षों से लटकी जड़ें, साँय-साँय की ध्वनि के साथ बहती हवा से सूखी पत्तियों का खड़खड़ाना और तभी अचानक से गूँजने वाली बंदरों की तेज चीखें किसी को भी डराने के लिए काफी हैं। ऐसे में झरने से गिरने वाले जल की ध्वनि भी ऐसी प्रतीत होती है, मानो पैरों में घूँघरू बाँधे कोई स्त्री नाचने में मग्न है। बंदरों के दाँतों की किटकिटाहट सुन ऐसा लगता है, मानो किसी पुरुष की क्रूर हँसी गूँज रही है। यहाँ का यह वातावरण स्वतः ही डर का माहौल उत्पन्न कर देता है। यही कारण है कि भानगढ़ का किला विश्व के सबसे खौंफनाक स्थलों में से एक है।

यहाँ आस-पास के गाँवों में रहने वाले लोगों का ऐसा मानना है कि रात के समय यहाँ प्रेतात्माएँ विचरण करती हैं और रह-रहकर तेज चीखें गूँजती हैं। लोगों का कहना है कि अगर कोई व्यक्ति रात को इस किले में प्रवेश करता है, तो वह जीवित वापस नहीं आता है। ना केवल रात बल्कि दिन में भी लोग यहाँ असहजता तथा बेचैनी महसूस करते हैं। बहुत से लोग यहाँ भूत देखे जाने का दावा भी करते हैं। रात के भयावह माहौल में दुर्घटना की आशंका के चलते सूर्यास्त के पश्चात् इस किले में प्रवेश पूर्णतया वर्जित है तथा किले के द्वार पर रात के समय गार्ड तैनात किए गए हैं, ताकि कोई भी व्यक्ति यहाँ अनाधिकृत प्रवेश ना कर पाए।

अपनी हॉन्टेड कथाओं के चलते भानगढ़ का किला ना केवल भारत अपितु विदेशों में भी बहुत विख्यात है। प्रतिवर्ष काफी संख्या में पर्यटक यहाँ आने को उत्सुक रहते हैं। कुछ लोग यहाँ भूतों से संबंधित अपनी जिज्ञासा शांत करने आते हैं, तो कुछ प्रकृति का आनंद प्राप्त करने। यहाँ केवड़े के वृक्ष बहुतायत में हैं तथा जब हवा चलती है तो संपूर्ण वातावरण केवड़े की सुगंध से महक उठता है। मानसून के समय किले के आसपास का क्षेत्र हरियाली की चादर ओढ़ लेता है। ऐसे में पहाड़ियों से घिरे किले से चारों ओर का ऐसा दिलफरेब नजारा दिखाई देता है कि जिसे नजरों में समेट पाना ही मुश्किल है। चारों ओर बिखरी प्रकृति की मनोरम छटा बरबस ही लोगों को आकर्षित कर लेती है।




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अगर मैं अपने अनुभव की बात करूँ तो भानगढ़ किले का भ्रमण मेरे लिए काफी अच्छा और यादगार रहा। मैं, मेरे पति तथा हमारे साथ गए हमारे मित्रों में से किसी को भी यहाँ कुछ भी अजीब महसूस नहीं हुआ। किले के निर्जन खण्डहरों से लेकर यहाँ बने मंदिरों की कलाकृतियाँ तक सब उस समय की शानदार वास्तुकला का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। पहाड़ियों की गोद में बसे इस किले के रमणीय वातावरण में पर्यटकों की खासी आवाजाही है। किसी भूत-प्रेत या आत्मा से तो सामना नहीं हुआ, परन्तु किले का शांत, सुंदर वातावरण मुझे बहुत पसंद आया।

यदि आप जयपुर, अलवर या इनके आसपास के क्षेत्र के निवासी हैं और आपको हॉन्टेड स्थलों पर जाना पसंद है या आप किसी हॉन्टेड जगह के वातावरण को महसूस करना चाहते हैं, तो आप भानगढ़ किले का भ्रमण कर अपनी जिज्ञासा शांत कर सकते हैं। यह देखना रुचिकर होगा कि आपको वहाँ भूतों या आत्माओं की उपस्थिति महसूस होती है या फिर मेरी तरह वहाँ के शांत, सरस वातावरण में खोकर रह जाते हो।

गुरुवार, 11 मार्च 2021

नाहरगढ़ बायोलॉजिकल पार्क की यात्रा

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नाहरगढ़ बायोलॉजिकल पार्क, जयपुर 

 नमस्कार प्रिय पाठकों,

मुझे एवं मेरे पति को घूमने-फिरने का बहुत शौक है। मानसून के कारण मौसम बहुत सुहावना हो रहा था। अतः 30 अगस्त, 2020 की रात्रि को बात करते हुए हम दोनों ने आने वाले कल यानि 31 अगस्त को नाहरगढ़ बायोलॉजिकल पार्क घूमने की योजना बनाई। हमारी एक 2 वर्षीय प्यारी सी बेटी है दिनाया। उसे जानवरों से बहुत प्रेम है। हम दोनों इससे पूर्व भी दो बार इस जगह घूम चुके थे। नाहरगढ़ बायोलॉजिकल पार्क मेरे घर (प्रताप नगर) से 38 किलोमीटर दूर दिल्ली रोड पर स्थित है।

 नाहरगढ़ बायोलॉजिकल पार्क जयपुर में सिंधी कैंप से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। हाँ जाने के लिए हमने कैब बुक की थी। कैब का किराया लगभग 500 रुपये था। सिंधी कैंप से आमेर जाने वाली बसों के द्वारा भी हाँ  पहुंचा जा सकता है। हमने साथ में कैमरा भी लिया, ताकि जंगली पशुओं की फोटो ली जा सके। हम लगभग डेढ़ घंटे की यात्रा के पश्चात नाहरगढ़ बायोलॉजिकल पार्क पहुँचे । हमने टिकट काउंटर से टिकट खरीदे।  टिकट का मूल्य 50 रुपए प्रति व्यक्ति था तथा कैमरे का टिकट 200 रुपए था। टिकट लेने के पश्चात हमने ई-रिक्शा लिया जो हमें पार्क के मुख्य द्वार तक लेकर गया। ई-रिक्शा का किराया 30 रुपए प्रति व्यक्ति था।

                                                           
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हमने बायोलॉजिकल पार्क में प्रवेश किया ही था कि बारिश शुरू हो गई और कुछ देर हमें वहीं एक टीन शेड के नीचे शरण लेनी पड़ी। कुछ देर बाद बारिश रुक गई और हमने घूमना शुरू किया।बायोलॉजिकल पार्क के अंदर घूमने के दो विकल्प हैं - आप पैदल घूम सकते हैं, अन्यथा इलेक्ट्रिक गाड़ी भी उपलब्ध है। हमने पैदल ही घूमने का विकल्प चुना। पैदल घूमने का अलग ही मजा है, वहाँ आप आराम से जितनी देर रुकना चाहें, रुक सकते हैं और अपनी पसंद के जीवों को निहार सकते हैं। ना केवल जंगली जीव-जंतु बल्कि प्राकृतिक सौंदर्य भी यहाँ प्रचुर मात्रा में भरा पड़ा है। मानसून में हरियाली की चादर ओढ़े पहाड़ियों पर उतरते-चढ़ते बादलों को देखकर मन प्रसन्न हो गया। बारिश के कारण कहीं-कहीं थोड़ा सा पानी एकत्र हो गया था, जिसे देखते ही दिनाया को मुँह-माँगी मुराद मिल गई और उसने पानी में छप-छप करते हुए कूदना शुरू कर दिया। उसकी नटखट हरकतों पर आसपास के अन्य पर्यटक भी मुस्कुरा उठे।
                                         
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कुछ दूर चलने के बाद हम जानवरों के बाड़ों तक पहुँच गए। प्रारंभ में भेड़िया, सियार तथा जरख प्रजाति के बाड़े थे। यहाँ बाड़े पर्याप्त क्षेत्रफल में बनाए गए हैं। कमरों के अलावा जीवों के लिए विचरण हेतु पर्याप्त क्षेत्र उपलब्ध है, जिसमें प्राकृतिक पेड़-पौधों के अलावा कृत्रिम गुफाएँ, कैनोपी, मचान जैसी संरचनाएँ भी बनाई गई हैं, ताकि जीवों को पूर्ण प्राकृतिक वातावरण का अनुभव हो। कुछ भेड़िए अंदर आराम कर रहे थे जबकि एक बाहर लगातार दौड़ने में व्यस्त था। सियारों के लिए उस समय खाना आया ही था और वे उछल-कूद करते हुए खाने पर टूट पड़े। उन्हें इस तरह दौड़ते-भागते और मस्ती करते देख कर सभी लोग विशेषकर बच्चे बेहद खुश हो रहे थे। जरख शायद विश्राम करने का इच्छुक था तभी तो काफी इंतजार करने के बाद भी गुफा से बाहर ना निकल कर अंदर ही बैठा रहा।
                                                  
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आगे के यात्रा अनुभव साझा करने से पूर्व मैं बताना चाहूँगी कि यहाँ घूमने आने वाले स्त्री व पुरुषों के लिए अलग-अलग शौचालय तथा पीने के पानी के वाटर कूलर की सुविधा भी उपलब्ध है, जिससे पर्यटकों को असुविधा नहीं होती।
जरख के बाड़े से आगे चलकर बिल्ली परिवार के सदस्यों बाघ, तेंदुआ तथा शेर के बाड़े स्थित हैं। बाड़े में बाघ व बाघिन आराम से घूम रहे थे तथा लोग उन्हें देखकर रोमांचित हो रहे थे। सभी लोग बाघों के साथ सेल्फी तथा फोटोग्राफ लेने में व्यस्त थे। सुनहरे पीले रंग के धारीदार इस शानदार वन्य प्राणी को निहारने के बाद हम तेंदुए के बाड़े के पास पहुँचे। दो तेंदुए ऊँचे बने मचान पर विश्राम कर रहे थे जबकि एक तेंदुआ नीचे घूम रहा था। यहाँ भी लोग फोटो ले रहे थे, तभी एक तेंदुए ने दहाड़ना शुरू कर दिया। दिनाया तथा अन्य बच्चे खुश होकर तालियाँ बजाने लगे, तभी हमने देखा कि एक शरारती युवकों का समूह आया तथा तरह-तरह की आवाजें निकालते हुए तेंदुए को चिढ़ाने लगा, ताकि उसे गुस्से से दहाड़ते हुए सुन सके। हमारे साथ कुछ अन्य लोगों ने भी उन्हें ऐसा करने से रोका।इस तरह से जीवों को तंग किया जाना बहुत गलत है। हमें अपने मनोरंजन के साथ इन जीव-जंतुओं की सुविधा का भी ध्यान रखना चाहिए। तेंदुए के पश्चात शेर का बाड़ा था परंतु कुछ माह पूर्व बीमार हो जाने के कारण यहाँ के शेर व शेरनी की मृत्यु हो जाने से बाड़ा अभी खाली था। यहाँ लॉयन सफारी भी होती है, जहाँ अन्य शेरों को विचरण करते हुए देखा जा सकता है।
                                                   
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बायोलॉजिकल पार्क के अंदर आगंतुकों के विश्राम हेतु कैनोपी, बगीचा तथा बेंच भी बने हुए हैं। ऐसी ही एक बेंच पर बैठकर हमने भी कुछ देर विश्राम किया। कुछ अन्य लोग बगीचे व कैनोपी में बैठकर आराम कर रहे थे। पूरे बायोलॉजिकल पार्क में काफी स्थानों पर कचरा पात्र भी रखे गए हैं, जोकि इसे साफ सुथरा बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं।
                                            
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बिल्ली परिवार से आगे चलकर हिरण की विभिन्न प्रजातियों के बाड़े स्थित हैं। यहाँ हमने बारहसिंगा, पाढा, चीतल, चिंकारा, सांभर, कृष्ण मृग आदि प्रजातियों के हिरणों को अठखेलियाँ करते हुए देखा। आगे चलना प्रारंभ ही किया था कि अचानक काले बादल पुनः घिर आए और वर्षा प्रारंभ हो गई। सभी लोग इधर-उधर शरण ढूंढ़ने लगे। हमने भी साथ लाई छतरी को खोला और थोड़ा आगे चलकर एक टीन शेड के नीचे शरण ली। 10 मिनट बाद बारिश कुछ कम हो गई थी। दिनाया बारिश में भीगना चाह रही थी कि तभी फिसल कर गिर गई। हालांकि उसे चोट नहीं लगी परंतु गिरने से उसके कपड़े गंदे हो गए।हमने पास ही लगे नल से पानी लेकर उसके हाथ-पैर धुलवाए तथा मैंने साथ में लाए हुए दूसरे कपड़े उसे पहना दिए। तब तक बरसात भी पूरी तरह रुक चुकी थी।
छोटे बच्चों को साथ लेकर भ्रमण करने वाले साथियों को मैं यह सलाह अवश्य देना चाहूँगी कि हमेशा बच्चे के एक-दो जोड़ी कपड़े, साफ रुमाल या स्कार्फ तथा जरूरी दवाईयाँ साथ रखें, ताकि तुरंत जरूरत होने पर काम में लिया जा सके।
                                           
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अगला बड़ा जंगली सूअर का था, जो कि कीचड़ में पसरकर आराम फरमा रहा था। उसे देख कर यह साफ पता चल रहा था कि अभी उसका उठने का कोई इरादा नहीं था। अगले बाड़ों में सेही, जंगली बिल्ली, पाम सीविट तथा लोमड़ी को रखा गया था। इन से आगे चलकर घड़ियाल तथा मगरमच्छों को रखा गया है। उनके लिए यहाँ तालाब बनाए गए हैं। घड़ियाल तैरने का आनंद ले रहे थे तो मगरमच्छ कुछ समय के लिए निकली धूप सेकने का आनंद ले रहा था।
अगला बाड़ा था - हमारे सबसे पसंदीदा जंगली जानवर गोलू-मोलू भालू का। भालू महाशय वहाँ बनी छतरी में गोल-गोल घूम रहे थे। कुछ देर बाद वह मिट्टी में लोट लगाने लगा और फिर अपने दूसरे साथी के पास जाकर आराम से बैठ गया। इसके आगे सफेद बाघ का बाड़ा है, परंतु बाघ की मृत्यु हो जाने के कारण यह नए बाघ के इंतजार में सूना पड़ा है। यहाँ से कुछ दूरी पर बायोलॉजिकल पार्क का मुख्य द्वार है।
                                          
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बायोलॉजिकल पार्क के अंदर खाद्य सामग्री ले जाने पर पूर्णतः पाबंदी है तथा किसी भी व्यक्ति के पास खाद्य सामग्री पाए जाने पर जुर्माने का भी प्रावधान है। वैसे मुख्य द्वार से बाहर निकलने से कुछ दूरी पहले एक कैंटीन स्थित है, जहाँ आगंतुक खाने-पीने का लुत्फ उठा सकते हैं। हमने भी यहाँ चाय-बिस्किट का नाश्ता किया। कोरोना महामारी के कारण अभी यहाँ बहुत ज्यादा भीड़ नहीं थी, परंतु फिर भी काफी लोग यहाँ जीव-जंतुओं तथा प्रकृति का आनंद लेने पहुँच रहे हैं और धीरे-धीरे पर्यटकों की संख्या वापस बढ़ रही है।
                                             
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मुख्य द्वार से बाहर निकलने से ठीक पहले बायीं ओर एक गली जाती है। इसमें लगभग 200 मीटर की दूरी पर बायोलॉजिकल पार्क के सबसे नए सदस्य हिप्पोपोटेमस का बाड़ा स्थित है। कुछ महीनों पूर्व ही यहाँ हिप्पोपोटेमस का जोड़ा लाया गया है और अभी जुलाई 2020 में ही एक छोटे हिप्पो ने जन्म लिया है। मादा हिप्पो चारा खा रही थी और नन्हा हिप्पो पानी में आराम फरमा रहा था। पेट भरने के बाद मादा हिप्पो भी अपने बच्चे के पास पानी में चली गई। इस समय नर हिप्पो हमें दिखाई नहीं दिया। हमने पूरे पार्क का दौरा कर लिया था और शाम भी हो चुकी थी, इसलिए हमने कैब बुक की तथा वापस घर की ओर लौट पड़े।
शहर की भीड़भाड़ से दूर नाहरगढ़ की पहाड़ियों में प्राकृतिक वातावरण में स्थित यह बायोलॉजिकल पार्क जीव-जंतु प्रेमियों के लिए जयपुर में सबसे अच्छा स्थान है।

मंगलवार, 2 मार्च 2021

भारत में रहस्यमयी सुरंग युक्त सबसे बड़ी व गहरी बावड़ी : चाँद बावड़ी (आभानेरी)

हैलो दोस्तों,
राजस्थान की शुष्क जलवायु में जल की कमी की समस्या के समाधान हेतु प्राचीन काल से ही जल संरक्षण की तकनीकें अपनाई जाती रही हैं। विभिन्न जिलों में बावड़ी, टांके, जोहड़ जैसी जल संरक्षण करने वाली संरचनाओं का पाया जाना इसका उदाहरण है। राजस्थान के दौसा जिले में जयपुर-आगरा मार्ग पर स्थित आभानेरी गाँव में राजस्थान की सबसे प्राचीन बावड़ियों में से एक चाँद बावड़ी स्थित है। yatrafiber के आज के ब्लॉग में मैं चाँद बावड़ी भ्रमण के अनुभव साझा करना चाहूँगी।
चाँद बावड़ी जाने के लिए नजदीकी हवाईअड्डा जयपुर इंटरनेशनल एयरपोर्ट है, जो कि इससे लगभग 95 किमी दूर स्थित है। जयपुर जंक्शन रेलवे स्टेशन से भी इसकी दूरी लगभग 95 किमी ही है। जयपुर से निजी वाहन करके चाँद बावड़ी आसानी से पहुँचा जा सकता है।

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दौसा जिले का आभानेरी गाँव अपनी ऐतिहासिक धरोहर चाँद बावड़ी के लिए संपूर्ण विश्व में प्रसिद्ध है। चाँद बावड़ी का निर्माण निकुंभ राजवंश के राजा चाँद(चंद्र) ने 8वीं-9वीं शताब्दी में करवाया था तथा उनके नाम पर ही इसे चाँद बावड़ी के नाम से जाना जाता है। चाँद बावड़ी के बारे में यह किवदंती भी प्रसिद्ध है कि इसका निर्माण मात्र एक रात में भूत-प्रेतों द्वारा किया गया था।
चाँद बावड़ी का प्रवेश-द्वार उत्तर दिशा की तरफ है। मंडप से अंदर प्रवेश कर बरामदों के पास से होकर चाँद बावड़ी के पास पहुँचते ही वहाँ का दृश्य देखकर पर्यटक बिल्कुल चकित रह जाते हैं। क्योंकि चाँद बावड़ी तस्वीरों में जितनी सुंदर दिखाई देती है, वास्तव में उससे कहीं ज्यादा आकर्षक है।

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35 मीटर चौड़ी तथा 19.5 मीटर गहरी, 13 मंजिला चाँद बावड़ी देश की सबसे बड़ी व गहरी बावड़ी है। नीचे उतरने के लिए इसमें तीन तरफ से दोहरे सोपान(सीढ़ियाँ) की व्यवस्था है। लगभग 3500 सीढ़ियाँ नीचे उतरने हेतु बनवाई गई हैं। सममितीय त्रिकोणीय रूप से व्यवस्थित ये सीढ़ियाँ बावड़ी को भव्य स्वरूप प्रदान करती हैं। इन सीढ़ियों के बारे में कहा जाता है कि इनसे नीचे जाने वाला व्यक्ति इनकी भूलभुलैया में इस कदर खो जाता है कि वह चाहकर भी वापस उन सीढ़ियों से ऊपर नहीं आ सकता, जिनसे होकर वह नीचे गया था। चाँद बावड़ी की शानदार वास्तुकला को देखकर पर्यटक दाँतों तले अंगुली दबाने पर मजबूर हो जाते हैं।

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तीन तरफ सीढ़ियों के अतिरिक्त चौथी तरफ यानि उत्तरी भाग में स्तंभों पर आधारित एक बहुमंजिला दीर्घा बनाई गई है। इसमें नीचे की तरफ दो मंडपों में महिषासुरमर्दिनी तथा गणेश जी की सुंदर प्रतिमाएँ प्रतिष्ठित की गई हैं। इन प्रतिमाओं का मुख बावड़ी की तरफ है। भारतीय संस्कृति में जल स्रोतों को विष्णु जी के निवास स्थल क्षीरसागर स्वरूप माना जाता है, अतः विष्णु जी की प्रतिमा भी इसकी निचली मंजिल के बरामदे के अंदर स्थापित की गई है। परन्तु वर्तमान में चाँद बावड़ी में नीचे जाना या सीढ़ियाँ उतरना पर्यटकों के लिए पूर्णतया वर्जित है। अतः विष्णु जी की प्रतिमा के दर्शन कर पाना संभव नहीं है। भले ही बावड़ी में नीचे उतरना मना है, परन्तु ऊपर से देखने पर भी चाँद बावड़ी की बेहतरीन स्थापत्य कला दर्शकों पर गहरा प्रभाव छोड़ती है।

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वर्गाकार स्वरूप में बनी चाँद बावड़ी ऊपर से चौड़ी तथा नीचे से संकरी है। बावड़ी का निर्माण इस प्रकार से किया गया है कि जल-स्तर कम हो जाने पर भी जल आसानी से प्राप्त किया जा सकता है, जो कि इसकी उत्कृष्ट जल प्रबंधन प्रणाली को इंगित करता है। जल निकालने वाला यंत्र भी इस प्रकार से व्यवस्थित किया गया है कि बहुत ध्यान से देखने पर ही दिखाई देता है। इतनी खूबसूरत तथा उत्तम तकनीक से बनी बावड़ियाँ कम ही देखने को मिलती हैं।

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चाँद बावड़ी चाँदनी रात में दूधिया सफेद रंग में चमकती है, इसी कारण इसे अंधेरे-उजाले की बावड़ी भी कहा जाता है। इसके उत्तरी भाग की दीर्घा के अंदर नृत्य कक्ष तथा एक गुप्त सुरंग भी बनी हुई है। यह सुरंग लगभग 17 किमी लम्बी है तथा पास के गाँव भांडारेज गाँव में निकलती है। संभवतः इसका उपयोग राजा तथा उसकी सेना द्वारा युद्ध व आपातकाल के समय किया जाता था।
चाँद बावड़ी के चारों तरफ स्तंभ युक्त बरामदे बने हुए हैं। इन बरामदों में बहुत सी खण्डित परन्तु शानदार नक्काशी युक्त देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ, स्तंभ तथा अन्य मूर्तियाँ रखी हुई हैं। बावड़ी के चारों तरफ ऊँची चारदीवारी निर्मित की गई है, जो इसे सुरक्षित स्वरूप प्रदान करती है। यह चारदीवारी, बरामदे तथा प्रवेश-द्वार बावड़ी के समकालीन नहीं हैं, इन्हें बाद में बनवाया गया है। वर्तमान में बावड़ी को लोहे की रेलिंग लगाकर सुरक्षित कर दिया गया है। इस रेलिंग के अंदर जाना निषेध है।

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बावड़ी की चारदीवारी में ही एक मंदिर भी स्थित है। हमारे देश में निर्माण कार्य प्रारंभ करने से पूर्व ईश-प्रतिमा स्थापित करने की परम्परा रही है, ताकि निर्माण कार्य में कोई विघ्न ना आए। अतः चाँद बावड़ी के निर्माण के समय यहाँ भी हनुमान जी की प्रतिमा स्थापित की गई थी, जिसे बाद में मंदिर का स्वरूप दे दिया गया।

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बावड़ी में जल की उपलब्धता तथा हवादार बरामदे यहाँ के वातावरण को शीतल बनाते हैं। प्राचीन समय में बनी इस बेजोड़ कला युक्त चाँद बावड़ी के अनूठे सौंदर्य से प्रभावित होकर यहाँ कई फिल्म निर्माताओं ने अपनी फिल्मों की शूटिंग की है। एक तरफ हवादार गलियारों, शानदार मंडपों तथा सुंदर स्थापत्य वाली 13 मंजिला दीर्घा तथा तीन तरफ एकसार सीढ़ियों युक्त ऊपर से नीचे संकरी होती जाती चाँद बावड़ी का आकर्षण इसे घंटों निहारने के साथ-साथ यह सोचने पर भी मजबूर कर देता है कि कैसे जल प्रबंधन की श्रेष्ठ तकनीक युक्त इस अप्रतिम कला वाली बावड़ी के निर्माण की कल्पना की गई होगी।
चाँद बावड़ी के पश्चिम में हर्षद माता का मंदिर भी स्थित है, जो कि बावड़ी का समकालीन है। इसका निर्माण भी राजा चाँद के द्वारा 8वीं-9वीं शताब्दी में करवाया गया था। यह पूर्वाभिमुख मंदिर दोहरी जगती पर स्थित है। मंदिर का निर्माण महामेरू शैली में करवाया गया है। इसकी छत गुम्बदाकार है। मंदिर में पंचरथ गर्भगृह तथा स्तंभों पर आधारित मंडप स्थित है। इसकी बाहरी दीवारों पर ताखों में हिन्दू देवी-देवताओं की बेहद सुंदर प्रतिमाएँ उत्कीर्णित की गई हैं। इसके अतिरिक्त धार्मिक व लौकिक जीवन को दर्शाती चित्ताकर्षक प्रतिमाएँ उकेरी गई हैं। मंदिर की दीवारों पर सूर्यमुखी के पुष्प बने हुए हैं। सुंदर नक्काशी युक्त इस मंदिर से एक अभिलेख भी प्राप्त हुआ है, जिसमें इसे हरसिद्धि माता मंदिर कहा गया है।

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प्राचीन समय में इस मंदिर में हर्षद माता की पूर्णतया नीलम पत्थर से बनी 6 फुट ऊँची प्रतिमा स्थापित थी, जो कि सन् 1968 में चोरी हो गई। यहाँ के निवासियों का कहना है कि माताजी गाँव की रक्षा करती थीं तथा आने वाली आपदाओं के प्रति ग्रामवासियों को पहले ही सचेत कर दिया करती थीं। मंदिर में वर्तमान में माताजी की जो मूर्ति है, वह ग्रामवासियों द्वारा ही स्थापित की गई है।
उत्तम स्थापत्य कला युक्त इस मंदिर को भी मोहम्मद गजनवी का आक्रमण झेलना पड़ा। मोहम्मद गजनवी द्वारा आक्रमण के समय मंदिर को काफी क्षति पहुँचायी गई, बहुत सी मूर्तियाँ खंडित कर दी गईं। बाद में इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया गया। परन्तु फिर भी मंदिर की खंडित अवस्था तथा चाँद बावड़ी के बरामदों में रखी गई खंडित प्रतिमाएँ आक्रमणकारियों की क्रूर मनोदशा का प्रमाण प्रस्तुत करती हुई सी प्रतीत होती हैं। खंडित अवस्था में भी प्रतिमाओं की अद्भुत नक्काशी में उस समय के पूर्णस्वरूप मंदिर की महिमा की झलक देखी जा सकती है।

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वर्तमान में हर्षद माता मंदिर तथा चाँद बावड़ी दोनों ही पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग के अधीन हैं। प्रतिवर्ष काफी संख्या में देशी-विदेशी पर्यटक जल संरक्षण के इस अनोखे उदाहरण तथा हर्षद माता मंदिर के दर्शन हेतु आते हैं।
यदि आप ऐतिहासिक स्मारकों तथा स्थापत्य कला में रुचि रखते हैं, तो आपको चाँद बावड़ी देखने अवश्य जाना चाहिए। यकीनन ऐसी व्यवस्थित ज्यामितीय आकार वाली भव्य, शानदार बावड़ी देख आप अचरज से भर जाएँगे तथा कला का यह उत्कृष्ट नमूना आपके द्वारा देखी गई सबसे खूबसूरत ऐतिहासिक धरोहरों में से एक होगा।