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शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

असाध्य लकवाग्रस्त रोगियों के लिए चमत्कारी देवस्थान : असावरा माताजी

नमस्कार प्रिय पाठकों,

Yatrafiber के आज के ब्लॉग में मैं आपको राजस्थान के प्रसिद्ध मंदिरों में से एक आवरी माताजी के मंदिर के बारे में बताने जा रही हूँ। आवरी माताजी मंदिर राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले की भदेसर तहसील में असावरा गाँव में स्थित है। चित्तौड़गढ़ से इसकी दूरी लगभग 40 किमी है, जबकि उदयपुर से यह लगभग 90 किमी दूर स्थित है। निजी वाहनों के अतिरिक्त सार्वजनिक परिवहन यानि बसों के द्वारा भी यहाँ आसानी से पहुँचा जा सकता है।

यह मंदिर काफी पुराना है। मंदिर के इतिहास के बारे में बताया जाता है कि यहाँ की जागीरदारी आवाजी राठौड़ के पास थी। आवाजी के सात पुत्र तथा एक पुत्री थी। पुत्री का नाम केसर कुँवर था। पुत्री की आयु विवाह योग्य होने पर आवाजी ने अपने सातों पुत्रों को अलग-अलग स्थानों पर उनकी बहिन के लिए उचित वर ढ़ूँढ़ने हेतु भेजा। सातों भाई सात अलग-अलग स्थानों पर बहिन का रिश्ता तय कर आए। इस समस्या का हल निकालने के लिए केसर कुँवर ने अपनी कुलदेवी का ध्यान लगाया। तब कुलदेवी के आशीर्वाद से धरती फटी तथा केसर कुँवर उसमें समाने लगी। पुत्री को धरती में समाते देख आवाजी से रहा नहीं गया तथा उन्होंने दौड़कर उसका पल्लू पकड़ लिया। पल्लू पकड़े जाने पर केसर कुँवर नाराज हो गईं तथा उन्होंने आवाजी को श्राप दे दिया। श्राप से मुक्ति पाने के लिए आवाजी ने अपनी पुत्री केसर कुँवर यानि आवरी माताजी के मंदिर का निर्माण करवाया। कहा जाता है कि मंदिर का गर्भगृह ठीक उसी स्थान पर बनवाया गया है, जहाँ पर केसर कुँवर धरती में समा गई थीं।

असावरा गाँव में स्थित होने के कारण इसे असावरा माताजी के नाम से भी जाना जाता है। मुख्य सड़क पर बड़ा प्रवेश-द्वार बना हुआ है। यहाँ से मंदिर तक जाने के रास्ते पर दोनों तरफ प्रसाद, फूल-माला, पूजन सामग्री, खिलौने व अन्य सामग्री की छोटी-छोटी दुकानें हैं, जोकि आस-पास के ग्रामीणों के लिए रोजगार का साधन हैं। मंदिर के ठीक बाहर नल लगे हुए हैं जहाँ मंदिर में प्रवेश करने से पूर्व हाथ-पैर धोए जा सकते हैं।

                                          

मंदिर प्रांगण के मध्य में मुख्य गर्भगृह स्थित है। यहाँ माताजी की मूर्ति स्थापित है। सुंदर वस्त्रों, आभूषणों तथा फूल-मालाओं से माताजी का श्रृंगार किया जाता है। गर्भगृह की दक्षिणी दीवार में एक खिड़की बनी हुई है। मान्यता है कि इस खिड़की से गर्भगृह में प्रवेश करने पर भक्तों के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।

ऐसी मान्यता है कि यहाँ पर देवी का चमत्कारी रूप स्थापित है। यहाँ आने वाले लोगों की शारीरिक व्याधियाँ दूर हो जाती हैं। विशेष तौर पर लकवाग्रस्त रोगियों को यहाँ माताजी के दर्शन हेतु लाया जाता है तथा माताजी की असीम कृपा से लकवा रोग पूर्णतः ठीक हो जाता है। रोग की गंभीरता के अनुसार रोगी को समय बताया जाता है कि कितने दिन यहाँ रूकना होगा। रूकने की व्यवस्था मंदिर प्रांगण में ही होती है। रोग ठीक हो जाने पर भक्त ठीक होने वाले अंग के बराबर नाप का सोने या चाँदी का अंग बनवाकर या फिर अपनी क्षमता के अनुसार दान करते हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ जीवित मुर्गे चढ़ाने की भी परम्परा है। भक्त अपनी इच्छापूर्ति हो जाने पर जीवित मुर्गे यहाँ छोड़कर चले जाते हैं। ऐसे बहुत से मुर्गों को मंदिर प्रांगण में घूमते हुए देखा जा सकता है। मंदिर प्रांगण शांत व सुंदर है। काफी दूर-दूर से भक्त यहाँ माताजी के दर्शन हेतु आते हैं।

यहाँ मनाए जाने वाले मुख्य त्यौंहार दीपावली तथा नवरात्र हैं। इस समय यहाँ विशेष सजावट होती है। पूरे मंदिर को फूलों तथा रोशनी से सजाया जाता है। देवी का सुंदर श्रृंगार किया जाता है। महाआरती होती है तथा भक्तगण माताजी की आरती व दर्शन का लाभ लेते हैं।

                                         

यह मंदिर पहाड़ियों से घिरे प्राकृतिक स्थान पर स्थापित है। मंदिर के पास एक बड़ा तालाब भी स्थित है, जोकि बहुत पवित्र माना जाता है। बड़ी संख्या में लोग इस तालाब में स्नान करते हैं। यहाँ लोग तालाब की मछलियों को दाना भी खिलाते हैं। तालाब में जलीय पक्षियों की कई प्रजातियों को देखा जा सकता है। मंदिर के ठीक पास तालाब की उपस्थिति होने से नैनों को शीतलता प्रदान करने वाला सुरम्य वातावरण बन जाता है। तालाब के जल को छूकर आने वाली शीतल हवा मन को सुकून प्रदान करती है। परन्तु कुछ लोग अपनी मान्यतावश या अज्ञानतावश तालाब में पूजन-सामग्री या कचरा डाल देते हैं, जो कि तालाब में जल प्रदूषण का कारण बनता है। तालाब के जल की स्वच्छता तथा पवित्रता को बनाए रखने के लिए ऐसा नहीं किया जाना चाहिए। यहाँ एक वटवृक्ष भी स्थित है, जिसपर लोग इच्छापूर्ति हेतु रक्षासूत्र, मोली का धागा तथा पुरानी श्रृंगार वस्तुएं जैसे चूड़ियाँ आदि बाँधते हैं।

                                                    

माताजी के मंदिर के पास ही एक हनुमान जी का मंदिर भी स्थित है। यहाँ आने वाले श्रद्धालु हनुमान जी के दर्शन का लाभ भी पाते हैं। मंदिर के पास ही बाजार भी है, जहाँ सभी वस्तुओं से संबंधित दुकानें स्थित हैं। यहाँ आस-पास के क्षेत्र में कई धर्मशालाएँ तथा होटल भी उपलब्ध हैं, जिससे बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं को समस्या नहीं होती।

मुझे कई बार सपरिवार आवरी माताजी के दर्शन का सौभाग्य मिला है। यदि आपकी धार्मिक यात्रा में आस्था है तो यकीन मानिए यहाँ आकर आपको असीम सुख व शांति की प्राप्ति होगी।

बुधवार, 10 फ़रवरी 2021

जयपुर के पास खूबसूरत पिकनिक स्थल : सिलिसेढ़ झील

सिलिसेढ़ झील, अलवर

नमस्कार प्रिय पाठकों,

Yatrafiber के आज के ब्लॉग में मैं राजस्थान के अलवर जिले में स्थित सिलिसेढ़ झील के बारे में बताना चाहूँगी। राजस्थान का नंदन कानन कहलाने वाली सिलिसेढ़ झील अपनी सुंदर दृश्यावली, होटल लेक पैलेस, बॉटिंग, मत्स्य पालन तथा मगरमच्छों की उपस्थिति के कारण अलवर के सबसे लोकप्रिय स्थलों में शामिल है।

Siliserh Lake

राजस्थान की सबसे खूबसूरत झीलों में से एक सिलिसेढ़ झील अलवर जिले में स्थित है। यह अलवर शहर से लगभग 26 किमी दूर शांत वातावरण में स्थित है। अलवर रेलवे स्टेशन से इसकी दूरी 24 किमी है। सिलिसेढ़ झील का निकटतम हवाई अड्डा जयपुर इंटरनेशनल एयरपोर्ट है, जो कि यहाँ से लगभग 160 किमी की दूरी पर स्थित है। इंदिरा गाँधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट, दिल्ली से इसकी दूरी लगभग 165 किमी है। दोनों ही जगहों से बस या ट्रेन के द्वारा अलवर पहुँचा जा सकता है। अलवर से निजी वाहन करके आसानी से सिलिसेढ़ झील तक पहुँचा जा सकता है।

मीठे पानी की इस झील का निर्माण महाराज विनय सिंह ने सन् 1845 में शहर में जल आपूर्ति हेतु करवाया था। पहाड़ों से घिरी इस खूबसूरत झील के किनारे पर महाराज विनय सिंह ने अपनी पत्नी हेतु 6 मंजिला शाही महल का निर्माण भी करवाया था। वर्तमान में इस महल में 'राजस्थान पर्यटन विकास निगम' द्वारा 'लेक पैलेस' नाम से होटल चलाया जा रहा है।

Siliserh Lake

Siliserh Lake

Siliserh Lake

सिलिसेढ़ झील घूमने का समय सुबह 9 बजे से शाम 6 बजे तक का है। होटल लेक पैलेस से झील का सुंदर नजारा देखने हेतु 100 रुपये/व्यक्ति शुल्क चुकाना होता है। इन 100 रुपयों में अंदर जाने के टिकट के अतिरिक्त एक पानी की बॉटल या कॉफी या कोल्ड ड्रिंक शामिल होती है। पानी की बॉटल, कॉफी, कोल्ड ड्रिंक तीनों में से अपनी पसंद की कोई भी एक चीज होटल लेक पैलेस के रेस्तरां में टिकट दिखाकर प्राप्त की जा सकती है।

सिलिसेढ़ झील में बॉटिंग का आनंद भी लिया जा सकता है। यहाँ मोटर बॉट तथा जेट स्की की सुविधा उपलब्ध है। 8 व्यक्तियों की क्षमता वाली मोटर बॉट का शुल्क 800 रुपये यानि 100 रुपये/व्यक्ति चुकाना होता है। बॉटिंग करते समय लाईफ जैकेट पहनना अनिवार्य है। लाईफ जैकेट एक सुरक्षा उपकरण है। यदि दुर्घटनावश नाव पलट जाती है, तो लाईफ जैकेट लोगों को डूबने से बचाती है।

Siliserh Lake

Siliserh Lake

हरी-भरी पहाड़ियों से घिरी शांत व सुरम्य झील की सतह पर तैरती नाव में बैठकर प्रकृति की खूबसूरती को महसूस करना एक आनंददायक अनुभव है। नाव के चलने से झील की सतह पर बनकर दूर तक जाती जल तरंगों का मनोहारी दृश्य हर किसी को लुभाता है। बच्चों के लिए तो बॉटिंग प्रिय शगल है। जिस उत्साह से वे बॉटिंग हेतु नाव में चढ़ते हैं, समय पूरा हो जाने पर उतने ही बेमन से वे नाव से उतरते हैं। धीमी गति से चलती नाव में बैठकर झील तथा इसके आसपास के क्षेत्र को करीब से काफी अच्छे से देखा जा सकता है। मानसून के समय बारिश होने के कारण पानी से लबालब भरी सिलिसेढ़ झील और अधिक आकर्षक लगती है। आसमान में उड़ते बादलों के बीच झील के लहराते पानी में बॉटिंग करना एक शानदार अनुभव को आपकी यादों में जोड़ सकता है।

Siliserh Lake

Siliserh Lake

सिलिसेढ़ झील में मत्स्य पालन भी किया जाता है। इसके लिए झील में जाल लगाया जाता है तथा फिर बीज (मछलियों के छोटे बच्चे) डाले जाते हैं। जब मछलियाँ बड़ी हो जाती हैं, तो जाल को खींचकर मछलियों को निकाल लिया जाता है। पर्याप्त जल की उपलब्धता के कारण यहाँ पक्षियों की भी कई प्रजातियाँँ देखी जा सकती हैं।

(और पढ़ें - भारत की दूसरी सबसे बड़ी कृत्रिम झील जयसमंद का नजारा)

सिलिसेढ़ झील मगरमच्छों के लिए भी विख्यात है। सिलिसेढ़ झील में मगरमच्छों की भरमार है। इसी कारण इस झील को खतरनाक माना जाता है। मगरमच्छों की संख्या अधिक होती जाने पर उन्हें पास के एक तालाब में भेज दिया जाता है। सर्दियों में झील के किनारे काफी संख्या में मगरमच्छों को धूप सेकते हुए देखा जा सकता है। इसके अतिरिक्त मानसून में भी इनकी काफी तादात देखी जा सकती है। सिलिसेढ़ झील घूमने जाते समय इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि कोई भी झील के आस-पास के सुनसान क्षेत्र में ना जाए। मगरमच्छ एक शातिर शिकारी होता है, ऐसे में सुनसान क्षेत्र या झील के एकदम किनारे पर जाना बेहद खतरनाक हो सकता है। मगरमच्छ देखने के जुनून में कुछ लोग जान जोखिम में डालकर झील के निर्जन किनारों के पास पहुँच जाते हैं। ऐसा बिल्कुल भी नहीं किया जाना चाहिए।

सिलिसेढ़ झील पर एक बाँध भी बना हुआ है। लेक पैलेस से हरी-भरी पहाड़ियों की तलहटी में फैली हुई सिलिसेढ़ झील का मनमोहक नजारा दिखाई देता है। झील के किनारे रात बिताने के इच्छुक सैलानी होटल लेक पैलेस में रूक सकते हैं। लेक पैलेस की छत पर बैठकर इस शांत व सुंदर झील के मनोरम दृश्यों को देखते हुए शाम बिताना एक सुखद अनुभव है। झील के जल को छूकर आने वाली  शीतर बयार मन को ताजगी से भर देती है। झील के बीच में एक मंच जैसी आकृति बनी हुई है। कहा जाता है कि राजा-महाराजाओं के समय में इसपर नृत्य-संगीत किया जाता था। सिलिसेढ़ झील के खूबसूरत परिदृश्य के कारण यहाँ कुछ फिल्मों की शूटिंग भी की जा चुकी है।

लेक पैलेस के रेस्तरां के अंदर या बाहर खुली छत पर बैठकर खाने-पीने का आनंद लिया जा सकता है। बाहर छत पर बैठकर झील के प्राकृतिक दृश्यों को निहारते हुए खाने का लुत्फ उठाना सभी को बहुत पसंद आता है। लेकिन यहाँ बैठकर कुछ भी खाते समय बंदरों से सावधान रहना बहुत जरूरी है। सिलिसेढ़ झील के आसपास के क्षेत्र में बंदरों की भरमार है। थोड़ा सा ध्यान इधर-उधर होते ही ये शैतान बंदर पर्यटकों के हाथों से खाने-पीने की सामग्री छीनकर भाग जाते हैं। अतः रेस्तरां के अंदर बैठकर खाना एक बेहतर विकल्प है। बाहर के प्राकृतिक वातावरण में चाय-कॉफी की चुस्कियाँ लेते हुए, दोस्तों या परिवार के साथ गपशप करते हुए अच्छा समय बिताया जा सकता है।


भीड़भाड़ व शोरगुल से दूर एकांत में शांति से समय बीताने के इच्छुक लोगों के लिए यह एक पसंदीदा स्थल है, जहाँ वे सुकून से बैठकर प्राकृतिक खूबसूरती को निहारते हुए समय बीता सकते हैं। निःसंदेह यहाँ की मन को तरोताजा कर देने वाली आबोहवा, एक नई ऊर्जा देने वाली है।

बुधवार, 3 फ़रवरी 2021

गढ़ तो चित्तौड़गढ़, बाकी सब गढ़ैया (भाग-2)

 हैलो दोस्तों,

Yatrafiber के पिछले ब्लॉग में मैंने वीरता और शौर्य की भूमि रहे चित्तौड़ के किले के बारे में लिखा था। उसी संदर्भ में मैं आगे की जानकारी यहाँ साझा कर रही हूँ।

चित्तौड़ के किले में स्थित सबसे प्रसिद्ध व शानदार स्मारक विजय स्तंभ है। इसका निर्माण महाराणा कुम्भा ने महमूद खिलजी पर विजय के उपलक्ष में करवाया था। विजय स्तंभ 122 फीट ऊँचा तथा 9 मंजिला स्मारक है। इसकी 8वीं मंजिल तक चढ़ने के लिए 157 सीढ़ियाँ बनी हुई हैं, जबकि 9वीं मंजिल पर चढ़ने के लिए सीढ़ियाँ नहीं हैं। विजय स्तंभ नीचे से चौड़ा, बीच में से संकरा तथा ऊपर से पुनः चौड़ा बनाया गया है।


विजय स्तंभ के अंदर व बाहर बेहद शानदार कलाकारी की गई है। इसमें विष्णु जी के अवतार, रामायण व महाभारत के दृश्य आदि सभी को बहुत ही सुंदर तरीके से उकेरा गया है। इसी कारण इसे हिन्दू देवी-देवताओं का अजायबघर तथा भारतीय मूर्तिकला का शब्दकोश भी कहा जाता है। विजय स्तंभ की 9वीं मंजिल पर कीर्ति प्रशस्ति लिखी गई है तथा रानी पद्मिनी का चित्र भी उकेरा गया है। विजय स्तंभ के वास्तुकारों के नाम भी इसकी 5वीं मंजिल पर लिखे गए हैं। विजय स्तंभ की तीसरी मंजिल पर अरबी भाषा में लिखा गया अल्लाह उस समय के शासकों की धार्मिक सद्भावना को दर्शाता है। संपूर्ण विजय स्तंभ पर की गई बारीक व सुंदर कारीगरी उस समय की स्थापत्य कला की उत्कृष्टता को दर्शाती है।


विजय स्तंभ के ऊपर से चित्तौड़ शहर का सुंदर दृश्य दिखाई देता है। इसके झरोखों से आने वाले शीतल हवा के झोंके मन को तरोताजा कर देते हैं। मेवाड़ के शौर्य का प्रतीक विजय स्तंभ अपनी विशिष्ट कलाकारी से पर्यटकों को सदैव आकर्षित करता रहा है।

चित्तौड़ के किले को देखने आने वाले सैलानियों के कारण यहाँ खाने-पीने की सामग्री बेचने वाले बहुत से लोगों को रोजगार मिला हुआ है। यहाँ लोग चने, भुट्टे, अमरूद, सीताफल, आईसक्रीम, पॉपकॉर्न जैसी बहुत सी खाद्य वस्तुओं का लुत्फ उठाते हुए देखे जा सकते हैं।

विजय स्तंभ के पास ही जौहर स्थल मौजूद है। चित्तौड़ का किला अपने जौहरों के कारण भी जाना जाता है। वीरों की इस भूमि पर तीन बार जौहर हुए हैं।

प्रथम बार सन् 1303 में अलाउद्दीन खिलजी द्वारा आक्रमण किए जाने पर जब राणा रतनसिंह ने केसरिया किया, तब महारानी पद्मिनी ने मेवाड़ की आन की रक्षा हेतु अन्य वीरांगनाओं के साथ जौहर किया था।

दूसरी बार सन् 1534 में बहादुर शाह द्वारा आक्रमण किए जाने पर रानी कर्णवती ने अन्य वीरांगनाओं के साथ जौहर किया था।

तीसरी बार सन् 1567 में अकबर द्वारा आक्रमण किए जाने पर वीर राजपूत पत्ता सिसोदिया की पत्नी फूल कँवर ने अन्य वीरांगनाओं के साथ अग्नि स्नान किया था।


वर्तमान में इस स्थान पर बगीचा बना दिया गया है। पुरातत्त्व विभाग द्वारा इस स्थल की खुदाई करवाई जाने पर यहाँ राख की कई परतें पाई गईं, जो कि वीरांगनाओं के करूण बलिदान को इंगित करती हैं।

यहाँ दो द्वार भी स्थित हैं, जिन्हें महासती द्वार के नाम से जाना जाता है। माना जाता है कि उस समय ये द्वार गुप्त सुरंग द्वारा कुम्भा महल व गौमुख कुंड से जुड़े हुए थे।

(और पढ़ें गढ़ तो चित्तौड़गढ़, बाकी सब गढ़ैया (भाग-1) )

चित्तौड़ के किले में समिद्धेश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर भी स्थित है। मंदिर की बाहरी व भीतरी दीवारों पर बारीकी से की गई कलाकारी बेहद सुंदर दिखाई देती है। मंदिर के गर्भगृह में शिव जी की त्रिमुखी बड़ी प्रतिमा स्थित है। मूर्ति के दाँये व बाँये मुख एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं। गर्भगृह में शिवलिंग तथा शिव परिवार को भी स्थापित किया गया है। महादेव की विशाल प्रतिमा के दर्शन अति सुखदायी हैं। इस मंदिर में दो शिलालेख भी स्थापित किए गए हैं। मंदिर के सामने शिव जी के प्रिय वाहन नंदी की मूर्ति बनी हुई है। यहाँ से नीचे गौमुख कुंड का सुंदर दृश्य दिखाई देता है।




गौमुख कुंड चित्तौड़ के किले में स्थित सबसे सुंदर स्थलों में से एक है। यहाँ गाय के मुख की आकृति बनी हुई है, जिसमें से गिरने वाला प्राकृतिक जल लगातार यहाँ स्थित शिवलिंग का अभिषेक करता रहता है, इसी कारण इसे गौमुख कुंड कहा जाता है। कहा जाता है कि रानी पद्मिनी प्रतिदिन यहाँ पूजा-अर्चना करने आया करती थीं।



जल से लबालब भरे विशाल कुंड में बहुत सी मछलियाँ हैं, जिन्हें यहाँ आने वाले लोग चने खिलाते हैं। यहाँ लोग गौमुख से आने वाले प्राकृतिक जल से ही शिव जी का अभिषेक कर पुण्य पाते हैं। पहाड़ियों से घिरे इस पवित्र कुंड का दृश्य बहुत मनमोहक है। यहीं पास ही एक कक्ष में रानी पद्मिनी की प्रतिमा अंकित है, जहाँ लोग उन्हें नमन करते हैं। प्रतिमा के पास ही उस सुरंग का द्वार भी स्थित है, जिससे होकर रानी पद्मिनी कुम्भा महल से यहाँ तक आया करती थीं। वर्तमान में सुरंग का द्वार पूर्णतया बंद कर दिया गया है। कुछ इतिहासकारों का यह भी मानना है कि रानी पद्मिनी ने अन्य वीरांगनाओं के साथ इसी सुरंग में जौहर किया था।

चित्तौड़ के किले में बहुत से छोटे-बड़े जलाशय स्थित हैं। इस विशाल किले में कई सारे उद्यान भी मौजूद हैं, जो कि इसकी सुंदरता को और बढ़ा देते हैं। यहाँ लंगूर भी बड़ी तादात में पाए जाते हैं। घूमने आने वाले लोग लंगूरों को चने, प्रसाद, फल, बिस्किट आदि खिलाते हैं। चित्तौड़ के किले में सीताफल के वृक्ष भी बहुत अधिक संख्या में लगे हुए हैं, जिनसे प्रतिवर्ष सीताफलों की भारी मात्रा प्राप्त होती है। इन सीताफलों को निर्यात किया जाता है।

चित्तौड़ के किले में कालिका माता का बहुत प्राचीन मंदिर भी स्थित है। इतिहासकारों के मुताबिक प्रारंभ में यह मंदिर सूर्यदेव को समर्पित था। मंदिर की बाह्य दीवारों, गर्भगृह की दीवार आदि पर अंकित सूर्यदेव की छवियाँ इस बात को प्रमाणित करती हैं। अलाउद्दीन खिलजी ने आक्रमण के समय मंदिर को क्षति पहुँचाने के साथ-साथ सूर्यदेव की मूर्ति को भी खंडित कर दिया था। काफी समय तक वीरान रहने के बाद इस मंदिर में कालिका माँ की मूर्ति स्थापित की गई।

ऊँचे चौक पर बना हुआ माँ काली का यह मंदिर यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं की आस्था का मुख्य केंद्र है। आक्रमण व क्षति झेलने के बाद भी मंदिर के अंदर व बाहरी दीवारों पर किया गया सुंदर शिल्प कार्य दर्शनीय है।

मंदिर परिसर में ही शिव जी को समर्पित एक छोटा सा मंदिर भी स्थित है। यहाँ भैरव बाबा को भी स्थापित किया गया है। परिसर में मौजूद प्राचीन बड़े वटवृक्ष पर लोग इच्छापूर्ति हेतु मौली का धागा बाँधते हुए देखे जा सकते हैं।

महारानी पद्मिनी का महल चित्तौड़ के किले के सबसे सुंदर महलों में से एक है। सफेद रंग का यह महल जलाशय के बीच में स्थित है। महल तक जाने के लिए नाव का उपयोग किया जाता था। यह महल रानी पद्मिनी का पसंदीदा स्थल था, जहाँ वे काफी समय व्यतीत किया करती थीं। इसे जनाना महल भी कहा जाता है। मलिक मोहम्मद जायसी की पुस्तक पद्मावत के अनुसार जब अलाउद्दीन खिलजी ने रानी पद्मिनी को देखा था, तब वे इसी महल की सीढ़ियों पर खड़ी थीं तथा सामने के मरदाना महल में लगे दर्पण में उनकी झलक दिख रही थी, जिसे अलाउद्दीन खिलजी ने देखा था। दर्पण में प्रतिबिंब दिखने के बावजूद भी पीछे मुड़ने पर सीधे महल की सीढ़ियाँ दिखाई नहीं देती हैं। हालांकि उस समय तक दर्पण का आविष्कार नहीं हुआ था, अतः यह बात काल्पनिक ही प्रतीत होती है।




पहले मरदाना महल में प्रतीक के तौर पर दर्पण लगे हुए थे, जिनमें यहाँ आने वाले सैलानी पद्मिनी महल की सीढ़ियों का प्रतिबिंब उत्सुकता से देखा करते थे। परन्तु कुछ समय पूर्व किसी फिल्म में ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ को लेकर विवाद होने पर अब वे प्रतीकात्मक दर्पण हटा दिए गए हैं।

यहाँ एक सुंदर उद्यान तथा पुष्पवाटिका भी स्थित है। इस उद्यान में गुलाब के फूलों की बहुत सी किस्में लगाई गई हैं। छोटे से लेकर बड़े तक, कई रंगों वाले गुलाब इस उद्यान में देखे जा सकते हैं। दरवाजे से अंदर प्रवेश करते ही गुलाबों की भीनी महक मन को तरोताजा कर देती है। सैलानी यहाँ बैठकर आराम करना बहुत पसंद करते हैं। उद्यान से फूलों को तोड़ना व घास-स्थल में प्रवेश करना वर्जित है।



चित्तौड़ के किले में बहुत से फोटोग्राफर भी उपलब्ध हैं, जिनके माध्यम से यहाँ आने वाले सैलानी किले की खूबसूरत यादों को तस्वीरों के रूप में सहेजकर ले जाते हैं। फोटो खिंचवाने के बाद आधे से एक घंटे में उनके प्रिंट उपलब्ध करवा दिए जाते हैं। फोटो के आकर के हिसाब से शुल्क लिया जाता है। यहाँ राजस्थानी पोशाक भी 50-100 रुपये में किराये पर मिलती हैं, जिनको पहनकर फोटो खिंचवाई जा सकती हैं। इसके अतिरिक्त सजे-धजे घोड़े व ऊँट भी यहाँ उपलब्ध रहते हैं, जिनपर बैठकर फोटो खिंचवाना पर्यटकों को बहुत पसंद आता है।

किले की पूर्व दिशा में भी एक दरवाजा स्थित है, जिसे सूरज पोल के नाम से जाना जाता है। इस दरवाजे से नीचे मैदान में जाने का रास्ता है। कुछ लोग सूरज पोल को ही किले का मुख्य द्वार मानते हैं।




चित्तौड़ के किले में भगवान आदिनाथ को समर्पित एक भव्य ऐतिहासिक स्मारक कीर्ति स्तंभ भी स्थित है। 22 मीटर ऊँचे इस स्तंभ का निर्माण जैन व्यापारी जीजाजी राठौड़ ने 12वीं शताब्दी में करवाया था। यह सात मंजिला स्तंभ नीचे से चौड़ा तथा ऊपर से कुछ संकरा है। इसपर जैन तीर्थंकरों की सुंदर प्रतिमाएँ बनाई गई हैं। पत्थरों को कुशलतापूर्वक तराशकर की गई सुंदर कलाकारी पर्यटकों को आश्चर्यचकित कर देती है।


अंदर से संकरा होने के कारण कीर्ति स्तंभ के अंदर प्रवेश की अनुमति नहीं है। तीर्थंकरों तथा जैन धर्म से संबंधित अन्य कलाकृतियों से सजा यह सुंदर स्मारक ऐतिहासिक तथा धार्मिक दोनों दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। कीर्ति स्तंभ के ठीक पास भगवान आदिनाथ को समर्पित एक जैन मंदिर भी स्थित है।

चित्तौड़ के किले में फतेह प्रकाश महल भी स्थित है, जो कि अपनी सुंदरता से पर्यटकों को आकर्षित करता है। इसका अधिकांश हिस्सा वर्तमान में संग्रहालय में तब्दील कर दिया गया है। संग्रहालय में रानी पद्मिनी,  मीरा बाई आदि की सुंदर प्रतिमाओं के अतिरिक्त उस समय के अस्त्र-शस्त्र, वस्त्रों तथा अन्य राजसी वस्तुओं का संग्रह किया गया है, जिनसे उस समय के रहन-सहन की झलक मिलती है।

इन सब के अतिरिक्त चित्तौड़ के किले में नीलकंठ महादेव मंदिर, गोरा-बादल की घूमरें, जयमल-पत्ता की हवेलियाँ, खातन रानी का महल, घोड़े दौड़ने के चौगान, भाक्सी, बीका खोह, राव रणमल की हवेली, जटाशंकर महादेव मंदिर, सतबीस देवलां, मोती बाजार, श्रृंगार चौरी जैसी बहुत सी इमारतें, महल व मंदिर स्थित हैं। परन्तु वर्तमान में इनमें से अधिकांश इमारतें खंडहर अवस्था में हैं।

शक्ति व भक्ति के नगर चित्तौड़गढ़ में पहाड़ी पर बसे इस शानदार किले को देखकर मुहणैत नैनसी ने कहा था, "गढ़ तो चित्तौड़गढ़, बाकी सब गढ़ैया"। वाकई मेवाड़ी राजाओं के शौर्य तथा वीरांगनाओं के जौहर की याद दिलाते चित्तौड़ के किले के विशाल स्वरूप के आगे राजस्थान के बाकी सब किले बहुत छोटे प्रतीत होते  हैं। अपनी शौर्य कथाओं, मातृभूमि प्रेम, विशालता तथा स्थापत्य कला की उत्कृष्टता जैसी खूबियों के चलते चित्तौड़ का किला हमेशा से पर्यटकों को आकर्षित करता रहा है।