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शनिवार, 30 जनवरी 2021

गढ़ तो चित्तौड़गढ़, बाकी सब गढ़ैया (भाग-1)

 चित्तौड़गढ़ का किला

हैलो दोस्तों,

Yatrafiber के आज के ब्लॉग में मैं राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में स्थित गढ़ों के सिरमौर चित्तौड़गढ़ के किले के बारे में बताना चाहूँगी। मेवाड़ की शान कहलाने वाला यह चित्तौड़ का किला भारत के सबसे विशाल किलों में से एक है। कई जौहरों के रंग में रंगी यह वीरता व पराक्रम की भूमि मेवाड़ की राजधानी रही है। कुंभश्याम मंदिर, मीरा मंदिर, कालिका मंदिर, कुंभा महल, पद्मिनी महल, विजय स्तंभ, कीर्ति स्तंभ, गौमुख कुंड जैसे बहुत से मंदिर और ऐतिहासिक स्मारक व भवन इस किले को सुशोभित करते हैं। अनूठी विशेषताओं युक्त यह किला 21 जून, 2013 को यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में शामिल किया जा चुका है।

चित्तौड़गढ़ रेलवे स्टेशन से चित्तौड़ के किले की दूरी लगभग 7 किमी है, जबकि चित्तौड़ के बस स्टैंड से यह महज 4.5 किमी दूर स्थित है। रेलवे स्टेशन या बस स्टैंड से निजी वाहन करके या ऑटोरिक्शा द्वारा आसानी से चित्तौड़ के किले तक पहुँचा जा सकता है। निजी वाहन नहीं होने की स्थिति में ऑटोरिक्शा सबसे बेहतर विकल्प है। क्योंकि ऑटोरिक्शा में बस स्टैंड से किले तक लाने-लेजाने व पूरा किला घूमाने का किराया मात्र 300-400 रुपये लगता है। चित्तौड़ का किला घूमने के लिए सबसे अच्छा समय अक्टूबर से मार्च तक का है, इसके अलावा मानसून में भी यहाँ काफी पर्यटक आते हैं।

इतिहासकारों के अनुसार इस किले का निर्माण 7वीं शताब्दी में चित्रांगद मौर्य ने करवाया था तथा उन्हीं के नाम पर इसका नाम चित्रकूट पड़ा, जो कि बाद में चित्तौड़गढ़ में परिवर्तित हो गया। ऐसा भी कहा जाता है कि इस किले का निर्माण महाभारत काल में पांडव भीम ने किया था। किले में भीमताल व भीमगोड़ी की उपस्थिति को इसका प्रमाण माना जाता है।

मछली के आकार वाला यह किला एक पहाड़ी के ऊपर बना हुआ है तथा लगभग 700 एकड़ भूमि पर फैला हुआ है। पहाड़ी ढ़लान तथा खड़ी चट्टानों जैसी प्राकृतिक सुरक्षा के अतिरिक्त किले में प्रवेश के लिए 7 द्वारों को पार करना पड़ता है, जो कि सुरक्षा की दृष्टि से अति महत्त्वपूर्ण हैं। मजबूत होने के साथ-साथ इनकी ऊँचाई भी काफी अधिक है। मेवाड़ के शासक सूर्यवंशी थे तथा सूर्यदेव के रथ में 7 घोड़े जुते हुए होते हैं। ऐसा माना जाता है कि उनके प्रतीक के रूप में ही ये 7 द्वार बनवाए गए हैं।

ये 7 द्वार निम्न प्रकार हैं -

(1) पाडन पोल - यह सबसे पहला दरवाजा है। कहा जाता है कि एक बार भीषण युद्ध होने पर इतना अधिक खून बहा था कि खून के साथ एक पाडा (भैंस का बच्चा) बहकर यहाँ तक पहुँच गया था। इसी कारण इसका नाम पाडन पोल पड़ा।

(2) भैरो पोल - यह दूसरे नम्बर का दरवाजा है। इसके पास भैरव देव का मंदिर स्थित होने के कारण इसका नाम भैरो पोल रखा गया।

(3) हनुमान पोल - इस तीसरे दरवाजे के पास हनुमान जी का मंदिर स्थित है। इसी कारण इसका नाम हनुमान पोल पड़ा।

(4) गणेश पोल - चौथे दरवाजे के पास गणेश जी का मंदिर स्थित होने के कारण इसे गणेश पोल के नाम से जाना जाता है।

(5) जोड़ला पोल - यह पाँचवा दरवाजा है तथा छठे दरवाजे से मात्र कुछ ही दूरी पर स्थित होने के कारण इसे जोड़ला पोल के नाम से जाना जाता है।

(6) लक्ष्मण पोल - छठे दरवाजे के पास लक्ष्मण जी का मंदिर स्थित है। इसी कारण इसका नाम लक्ष्मण पोल पड़ा।

(7) राम पोल - सातवें दरवाजे के पास सूर्यवंशी राजाओं के ईष्टदेव भगवान श्रीराम का मंदिर स्थित होने के कारण इसका नाम राम पोल पड़ा।

किले के अंदर टिकटघर बना हुआ है। किले के अंदर स्थित विजय स्तंभ, पद्मिनी महल व संग्रहालय आदि में प्रवेश के लिए टिकट लेना पड़ता है, बाकी किला निःशुल्क देखा जा सकता है। किला सुबह 9.30 से शाम 5 बजे तक खुला रहता है। कोविड-19 महामारी के कारण वर्तमान में टिकट ऑनलाईन बुक कराना पड़ता है। महामारी से पूर्व टिकट ऑफलाईन भी ली जा सकती थी। टिकटघर के विपरीत दिशा में दीवार के पास खड़े होकर चित्तौड़ शहर का शानदार नजारा देखा जा सकता है। बहुत से पर्यटक यहाँ खड़े होकर दूर तक फैले हुए चित्तौड़ शहर के साथ सेल्फी लेना पसंद करते हैं।

यहाँ से थोड़ा आगे जाकर दाँहिनी ओर कुम्भा महल स्थित है। महाराणा कुम्भा ने इसकी मरम्मत करवाई थी, इसी कारण इसे कुम्भा महल के नाम से जाना जाता है। वर्तमान में यह महल कुछ खण्डहर सा हो गया है, परन्तु फिर भी इसकी भव्य ईमारत स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नमूना प्रस्तुत करती है। इस विशाल महल में कई छोटे-बड़े कमरे, तहखाने, बरामदे, चौक व अन्य संरचनाएँ बनी हुई हैं।




महल से एक तरफ किले का तथा दूसरी तरफ चित्तौड़ शहर का नजारा दिखाई देता है। कहा जाता है कि कुम्भा महल के तहखाने से गौमुख कुंड तक एक सुरंग बनी हुई है, जिसमें से होकर महारानी पद्मिनी स्नान व पूजा हेतु जाया करती थीं, परन्तु अब इस सुरंग के दरवाजे दोनों ओर से बंद कर दिए गए हैं। इस महल का प्रवेश द्वार त्रिपोलिया के नाम से जाना जाता है।


कुम्भा महल के विपरीत एक अर्द्धवृत्ताकार बुर्ज बना हुआ है। इसका निर्माण अपूर्ण है तथा इसे दासीपुत्र बनवीर द्वारा चित्तौड़ के किले पर कब्जा करने के बाद अपनी सुरक्षा तथा अस्त्र-शस्त्रों के भंडारण हेतु बनवाया गया था। कहा जाता है कि इसमें हमेशा नौ लाख रुपये भरे रहते थे, इसी कारण इसका नाम नवलखा भंडार पड़ा।

इस नवलखा भंडार के आधार पर कुछ लोग यह भी मानते हैं कि इसकी विपरीत दिशा में स्थित सूरजपोल चित्तौड़ के किले का मुख्य द्वार है तथा यह महल का पिछला हिस्सा है। क्योंकि मुख्य द्वार पर कोई भी राजा धन का भंडारण नहीं करेगा।

नवलखा भंडार से आगे बनी हुई दीवार का नाम बनवीर की दीवार है। क्योंकि इसका निर्माण दासीपुत्र बनवीर ने राजगद्दी हथियाने के बाद अपनी सुरक्षा हेतु किले को दो भागों में बाँटने हेतु करवाया था। परन्तु महाराणा उदयसिंह द्वारा बनवीर को खदेड़ दिए जाने के कारण इस दीवार का निर्माण पूर्ण नहीं हो सका था।

(और पढ़ें गढ़ तो चित्तौड़गढ़, बाकी सब गढ़ैया (भाग-2) )

चित्तौड़ के किले में श्रीकृष्ण जी को समर्पित कुम्भश्याम मंदिर भी स्थित है। ऐसा माना जाता है कि प्रारम्भ में यहाँ विष्णु जी के अवतार वराह भगवान की मूर्ति स्थापित की हुई थी। परन्तु मुस्लिम आक्रमण के समय वह प्रतिमा खंडित कर दी गई। अतः बाद में यहाँ कुम्भश्याम की प्रतिमा स्थापित की गई।


यह मंदिर नागर शैली में बना हुआ है। मंदिर का शिखर पिरामिड आकार का है। मंदिर के शिखर, गर्भगृह, आंतरिक व बाह्य दीवारों पर अत्यंत सुंदर कलाकारी की गई है, जो कि इसे भव्य स्वरूप प्रदान करती है। कुम्भश्याम मंदिर की अप्रतिम शिल्पकला पर्यटकों को दाँतों तले अंगुली दबाने पर मजबूर कर देती है। बड़ी ही कुशलता से उकेरी गई सभी कलाकृतियाँ साँचे में ढ़ली हुई सी प्रतीत होती हैं।


मुस्लिम आक्रमण के समय ना केवल चित्तौड़ के किले के अन्य भवनों, बल्कि यहाँ के सभी मंदिरों को भी काफी क्षति पहुँचायी गई थी। इसका अंदाजा आज भी इन मंदिरों की दीवारों पर बनी कलाकृतियों को देखकर लगाया जा सकता है। खूबसूरती से तराशे गए इन मंदिरों की दीवार पर बनी एक भी प्रतिमा अपने वास्तविक स्वरूप में मौजूद नहीं है। सभी का कोई न कोई भाग खंडित है, जो कि आक्रमणकारियों की क्रूर मनोदशा को दर्शाता है।


कुम्भश्याम मंदिर के पास ही श्रीकृष्ण जी की परम भक्त मीरा बाई का मंदिर बना हुआ है। मेवाड़ की बहू मीरा बाई श्रीकृष्ण जी की भक्ति हेतु शाही जीवन त्यागकर संत बन गई थीं। मंदिर में श्रीकृष्ण जी के साथ-साथ मीरा बाई की सुंदर प्रतिमा स्थापित की गई है, जिसके दर्शन से मन को असीम शांति मिलती है।



कहा जाता है कि मीरा बाई इसी मंदिर में श्रीकृष्ण जी की भक्ति में लीन रहती थीं। वे यहीं पद, कविताएँ, भजन आदि रचतीं और गाया करती थीं। इन सबसे चिढ़कर विक्रमादित्य ने इसी मंदिर में उन्हें विष का प्याला भेजा था, जो कि श्रीकृष्ण जी के चमत्कार से अमृत में बदल गया था। मंदिर के सामने मीरा बाई के गुरू रैदास जी को समर्पित छतरी बनी हुई है। इसमें गुरू रैदास जी के पदचिह्न अंकित हैं।

                                                                                                          क्रमशः..................................

सोमवार, 18 जनवरी 2021

आगरा स्थित विश्व का सातवाँ अजूबा : ताजमहल

ताजमहल, आगरा

 नमस्कार प्रिय पाठकों,

         Yatrafiber के आज के ब्लॉग में हम विश्व के सात अजूबों में शामिल प्रेम के प्रतीक ताजमहल की यात्रा के बारे में बात करेंगे। ताजमहल उत्तर प्रदेश राज्य के आगरा शहर में यमुना नदी के किनारे बना हुआ है। आगरा भारत के लगभग सभी मुख्य शहरों से सड़क मार्ग तथा रेलमार्ग द्वारा जुड़ा हुआ है। ताजमहल आगरा फोर्ट रेलवे स्टेशन से महज 3 किमी की दूरी पर स्थित है। आगरा फोर्ट रेलवे स्टेशन से ऑटोरिक्शा या ताँगे के द्वारा आसानी से यहाँ पहुँचा जा सकता है। आगरा वायुमार्ग द्वारा दिल्ली तथा जयपुर से जुड़ा हुआ है। आगरा के पंडित दीनदयाल उपाध्याय हवाईअड्डे से ताजमहल की दूरी लगभग 12 किमी है। यहाँ से आप ताजमहल ऑटोरिक्शा या निजी वाहन करके आसानी से पहुँच सकते हैं।

          अकबर के पोते तथा जहाँगीर के पुत्र मुगल बादशाह शाहजहाँ के द्वारा अपनी प्रिय बेगम मुमताज की याद में ताजमहल का निर्माण करवाया गया था। अतः ताजमहल वास्तव में एक मकबरा है, जहाँ मुमताज बेगम व शाहजहाँ दफन हैं। मुमताज का वास्तविक नाम अर्जुमंद बानो था। शाहजहाँ ने ही उन्हें प्रेम से मुमताज महल नाम दिया था। मुमताज, शाहजहाँ की सबसे प्रिय बेगम थी तथा वह शाही यात्राओं पर भी मुमताज को साथ रखता था। सन् 1631 में अपनी 14वीं संतान को जन्म देते समय मुमताज की मृत्यु हो गई। तब शाहजहाँ ने मुमताज की याद में ताजमहल के निर्माण का निर्णय लिया।

                                                      


          ताजमहल का निर्माण कार्य सन् 1631 में प्रारंभ हुआ। उस्ताद अहमद लाहौरी इसके मुख्य कारीगर थे तथा उनके साथ 37 कुशल कारीगरों का एक दल बनाया गया था, जिन्हें बगदाद, बुखारा, तुर्की जैसे स्थानों से विशेष तौर पर बुलवाया गया था। इस दल के निर्देशन में 20000 मजदूरों द्वारा ताजमहल का निर्माण किया गया। ताजमहल के निर्माण के लिए संगमरमर राजस्थान के मकराना से मँगवाया गया था। इसमें 28 तरह के बहुमूल्य रत्न तथा पत्थर जड़े गये थे, जिन्हें एशिया के विभिन्न स्थानों से मँगवाया गया था। परिवहन कार्य के लिए लगभग 1000 हाथियों का उपयोग किया गया था। 22 वर्ष के अथक परिश्रम के परिणामस्वरूप सन् 1653 में कला का यह बेजोड़ नमूना बनकर तैयार हुआ।

                                           


          कहा जाता रहा है कि ताजमहल का निर्माण पूर्ण हो जाने के पश्चात शाहजहाँ ने इसे बनाने वाले सभी मजदूरों के हाथ कटवा दिए थे, ताकि वे भविष्य में फिर ऐसी खूबसूरत इमारत का निर्माण नहीं कर सकें। परन्तु इस बात का कोई प्रमाण मौजूद नहीं है। ऐसा भी कहा जाता है कि शाहजहाँ ने सभी मजदूरों से इकरारनामा लिखवा लिया था कि वे भविष्य में ऐसी किसी भव्य इमारत का निर्माण नहीं करेंगे। एक कथा यह भी प्रचलित है कि शाहजहाँ इस ताजमहल के ठीक विपरीत एक काला ताजमहल भी बनवाना चाहता था, परन्तु ताजमहल का निर्माण पूर्ण होते ही शाहजहाँ को उसी के पुत्र औरंगजेब ने कैद कर लिया था और शाहजहाँ का यह सपना अधूरा ही रह गया था। यद्यपि इस बात का भी कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है। कुछ इतिहासकार यह भी मानते हैं कि वास्तव में यहाँ एक शिव मंदिर था, जिसका नाम था - तेजोमहालय। इसी को बाद में ताजमहल का रूप दिया गया।

          ताजमहल को देखने के लिए बाहर स्थित टिकट काउंटर से टिकट लेना पड़ता है। टिकट  का मूल्य 250 रुपये प्रति व्यक्ति है। ताजमहल का प्रवेश-द्वार स्थापत्य कला का सुंदर नमूना है। यह लाल बलुआ पत्थर तथा संगमरमर से बना हुआ है। इसपर कुरान की आयतों को बड़ी ही कुशलता से इस प्रकार लिखा गया है कि ऊपर से नीचे तक सभी अक्षरों का आकर बिल्कुल समान दिखाई देता है। इसमें सामने दोनों तरफ दो छतरियाँ बनाई गई हैं तथा बीच में छोटी-छोटी 11 छतरियाँ बनाई गई हैं।

                                                         


          मुख्य द्वार से अंदर प्रवेश करने पर ताजमहल तथा मुगल बगीचे का विहंगम दृश्य सहज ही मन मोह लेता है। सफेद संगमरमर को तराशकर बनाए गए ताजमहल की उजली चमक देखते ही बनती है। वैसे ताजमहल का बदलता रंग भी दर्शकों को अचंभे से भर देता है। सूर्योदय के समय यह गुलाबी आभा बिखेरता नजर आता है, तो दिन के उजाले में दूधिया सफेदी से जगमगाता है, वहीं चाँदनी रात में हल्के नीले रंग में रंगकर मन मोहता है।

                                                     


          यहाँ बने बगीचे ताजमहल की खूबसूरती को और बढ़ा देते हैं। प्रारंभ में पूर्णतः मुगल शैली में बने इन बगीचों में ब्रिटिश काल में परिवर्तन कर दिया गया था, जोकि आज भी दृष्टिगोचर होता है। यहाँ मुख्य पथ के दोनों ओर कुल मिलाकर चार बगीचे हैं। इन बगीचों में सुंदर घास, फूलदार पौधे तथा बड़े वृक्ष लगे हुए हैं। मुख्य पथ पर फंव्वारे भी लगाए गए हैं जोकि बगीचे की सुंदरता में चार चाँद लगा देते हैं। ताजमहल के ठीक सामने एक छोटा तालाब बनवाया गया है। इस तालाब के पानी में ताजमहल का प्रतिबिंब दिखाई देता है, जिससे मंत्रमुग्ध कर देने वाला दृश्य उत्पन्न होता है।

 

         उत्तम गुणवत्ता के बहुमूल्य सफेद संगमरमर से बनी यह अद्भुत ऐतिहासिक इमारत लाल बलुआ पत्थर से बने चबूतरे पर बनी हुई है। इसके मध्य में एक बड़ा गुम्बद बना हुआ है। इस गुम्बद पर एक सुंदर कलश स्थापित है। कलश पर चाँद की आकृति बनी हुई है। 1800 ईस्वी तक यह कलश सोने का हुआ करता था, परन्तु बाद में उसके स्थान पर काँसे का कलश स्थापित किया गया, जोकि वर्तमान में भी स्थित है। इस गुम्बद के चारों तरफ छतरियाँ बनी हुई हैं। ताजमहल में चारों दिशाओं में चार दरवाजे बने हुए हैं। वर्तमान में दक्षिणी द्वार से प्रवेश दिया जाता है। मुख्य मकबरे में जूते-चप्पलों के साथ प्रवेश वर्जित है। अतः या तो जूते-चप्पल बाहर उतारने होते हैं, अन्यथा जूते-चप्पलों को पॉलीथीन से बने कवर द्वारा ढ़ककर अंदर जा सकते हैं। ये पॉलीथीन कवर ताजमहल के बाहर 15-20 रुपये में आसानी से मिल जाते हैं।

                                                        


          ताजमहल मुगल तथा हिंदू वास्तुकला के संगम का अप्रतिम उदाहरण है। इसकी दीवारों पर सुंदर लताएँ, फूल-पत्ते आदि तराशे गए हैं। अत्यंत बारीकी से की गई नक्काशी, पच्चीकारी व जड़ाऊ कार्य इसे भव्यता प्रदान करते हैं। ताजमहल के अंदर मुमताज बेगम तथा शाहजहाँ की कब्रें बनी हुई हैं, जिनपर बहुत सुंदर कारीगरी की गई है। कब्रों के चारों तरफ बहुत ही कुशलता से तराशी गयी बारीक कार्य वाली जालियाँ लगी हुई हैं। मुमताज व शाहजहाँ की वास्तविक कब्रें नीचे तहखाने में स्थित हैं, ऊपरी कक्ष में केवल उनकी नकल रखी गयी है। इस कक्ष के ठीक मध्य में एक अष्टधातु की जंजीर लटक रही है, जिसपर अंग्रेजों ने एक दीप स्थापित किया था। ताजमहल के चारों कोनों पर चार मीनारें बनवाई  गई हैं। प्रत्येक मीनार पर एक छतरी बनी हुई है। ताजमहल की चारों मीनारें थोड़ा बाहर की तरफ झुकी हुई हैं, ताकि भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदा आने पर यदि ये गिरें भी तो मुख्य मकबरे को कोई नुकसान ना पहुँचे। ताजमहल में एक मस्जिद भी स्थित है, जिसका निर्माण लाल बलुआ पत्थरों द्वारा किया गया है।

                                                              


         

1857 की क्रांति के समय अंग्रेजों ने इस अद्वितीय इमारत को बहुत नुकसान पहुँचाया था। ताजमहल में जड़े गए बहुत से बहुमूल्य रत्न अंग्रेजों द्वारा निकाल लिए गए। सर्वप्रथम सन् 1942 में तथा फिर सन् 1965 व सन् 1971 में पाकिस्तान से हुए युद्ध के समय ताजमहल के गुम्बद को सुरक्षा कारणों से बाँस की बल्लियाँ लगाकर हरे कपड़े से ढ़क दिया गया था, ताकि दुश्मन के बमवर्षक विमानों की नजर से इसको बचाया जा सके। मथुरा तेलशोधक कारखाने से निकलने वाले धुँए से होने वाले प्रदूषण ने भी ताजमहल को बहुत नुकसान पहुँचाया है। इस धुँए के कारण ताजमहल का रंग पीला पड़ने लगा था, जिसकी सफाई करवाई गई। प्रदूषण से होने वाली अम्ल वर्षा से ताजमहल के संगमरमर का भी संक्षारण होता है। ताजमहल की सुरक्षा के लिए प्रदूषण पर नियंत्रण करना अति आवश्यक है। वर्तमान में ताजमहल के आस-पास के क्षेत्र में प्रदूषणकारी वाहनों के चालन पर पूर्णतः रोक है।

          देशी-विदेशी पर्यटकों की पहली पसंद, बेमिसाल मोहब्बत का प्रतीक ताजमहल विश्व के सात आश्चर्यों में वर्तमान में प्रथम स्थान रखता है। सन् 1983 में ताजमहल को यूनेस्को की विश्व धरोहर में शामिल किया गया था। ताजमहल के सौंदर्य का दीदार करने प्रतिवर्ष 20 से 40 लाख पर्यटक आगरा आते हैं, जिनमें से लगभग 30% विदेशी तथा 70% देशी पर्यटक होते हैं।

          ताजमहल से प्रेरित होकर विश्व में अन्य कई इमारतों का निर्माण किया गया है। भारत के औरंगाबाद (महाराष्ट्र) में बीबी का मकबरा, कलकत्ता में विक्टोरिया मेमोरियल स्मारक, ताजमहल बांग्लादेश, न्यूजर्सी में ट्रंप महल, चीन के शेनज़ेन में विंडो ऑफ द वर्ल्ड थीम पार्क में बनी ताजमहल प्रतिकृति, विस्कज़िन स्थित ट्रिपोली श्राइन मंदिर आदि इसके उदाहरण हैं, परन्तु इनमें से कोई भी इमारत वास्तविक ताजमहल जैसी सुंदरता नहीं पा सकी।

          ताजमहल के आस-पास के क्षेत्र में बहुत से अच्छे होटल उपलब्ध हैं, जहाँ पर्यटक रूक सकते हैं। यहाँ पास में बाजार भी स्थित है, जहाँ से लोग ताजमहल की प्रतिकृतियों को निशानी के तौर पर तथा अपने प्रियजनों के लिए उपहार के तौर पर ले जाना पसंद करते हैं। यहाँ वस्त्र, बैग, पर्स, चूड़ियाँ तथा अन्य बहुत सी वस्तुएँ भी उचित दाम पर मिल जाती हैं। यहाँ आने वाले लोग आगरा का प्रसिद्ध पेठा भी अवश्य खरीदते हैं, जोकि विभिन्न स्वाद में उपलब्ध है। वैसे आगरा की चाट भी काफी प्रसिद्ध है, तभी तो यहाँ आने वाले पर्यटक इसका लुत्फ उठाए बिना नहीं रहते।

          ताजमहल की खूबसूरती यहाँ आने वाले पर्यटकों को सहज ही अपने मोहपाश में जकड़ लेती है। इस अनुपम इमारत की छवि को लोग तस्वीरों के जरिये अपने साथ ले जाते हैं। यहाँ के लोग ठीक ही कहते हैं,"लोग जब यहाँ आकर जाते हैं तो ताज को अपने दिल में लेकर जाते हैं।" वास्तव में ताजमहल को देखने वाला हर व्यक्ति इसकी खूबसूरती का कायल हो जाता है। अद्वितीय, अनुपम, अद्भुत, खूबसूरत जैसे शब्द मिलकर भी ताजमहल का वर्णन करने में अक्षम से प्रतीत होते हैं। मुझे दो बार ताजमहल के दीदार का मौका मिला है तथा भविष्य में भी मैं पुनः सपरिवार ताज को निहारना चाहूँगी

शनिवार, 9 जनवरी 2021

राजस्थान में इतना सुन्दर झरना : भँवर माता (प्रतापगढ़)

भँवर माता (भ्रमर माता)


नमस्कार दोस्तों,

Yatrafiber के आज के ब्लॉग में मैं छोटी सादड़ी में स्थित भँवर माता मंदिर के बारे में बताना चाहूँगी।

भँवर माता मंदिर राजस्थान के प्रतापगढ़ जिले में छोटी सादड़ी तहसील में निम्बाहेड़ा-प्रतापगढ़ मार्ग पर स्थित है। यह मंदिर मध्यप्रदेश के नीमच जंक्शन रेलवे स्टेशन से लगभग 24 किमी दूर स्थित है। चित्तौड़गढ़ रेलवे स्टेशन से इसकी दूरी 64 किमी तथा चित्तौड़गढ़ बस स्टेण्ड से इसकी दूरी लगभग 66 किमी है।

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चारों ओर पहाड़ों की श्रृंखलाओं से घिरे प्राकृतिक स्थल पर यह मंदिर स्थित है। एक बड़े चबूतरे पर भँवर माता(भ्रमर माता) का प्राचीन मंदिर बना हुआ है। प्राचीन समय में यहाँ घना जंगल था और उसमें बहुत से भँवर होने के कारण देवी का नाम भँवर माता पड़ा। भँवर माता को देवी दुर्गा का ही रूप माना जाता है। कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण राजा यशगुप्त के पुत्र गौरी ने किसी प्राचीन भग्न(खण्डित) हो चुके देवस्थान के स्थान पर करवाया था। मंदिर के मुख्य द्वार पर दो बड़ी गज-प्रतिमाएँ लगी हुई हैं। प्रारंभ में यहाँ देवी के पदचिन्हों की ही पूजा की जाती थी, बाद में देवी की प्रतिमा स्थापित की गई। मंदिर के गर्भगृह के सामने देवी के वाहन की मूर्ति, त्रिशूल तथा एक बड़ा वृक्ष स्थित है। यहाँ पास में ही एक शिव मंदिर भी स्थित है।

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भँवर माता मंदिर से संवत् 547 का एक शिलालेख भी प्राप्त हुआ है। इस शिलालेख में माँ पार्वती की भगवान शिव के प्रति अगाध श्रद्धा तथा माता पार्वती द्वारा शिवजी का आधा रूप बनने का वर्णन किया गया है। प्रसिद्ध पुरातत्वविद आर. सी. अग्रवाल के अनुसार इस शिलालेख में माता दुर्गा द्वारा महिसासुर नामक राक्षस का संहार करने हेतु भयंकर सिंहों के रथ पर सवार होने का वर्णन किया गया है। इस प्रकार यह मंदिर ऐतिहासिक दृष्टि से भी काफी महत्वपूर्ण है।

(और पढ़ें - भारत की दूसरी सबसे बड़ी कृत्रिम झील जयसमंद का नजारा)

यहाँ काफी संख्या में श्रद्धालु माताजी के दर्शन हेतु आते हैं, विशेष तौर पर नवरात्रों में दर्शनार्थियों की भारी भीड़ होती है। लोग यहाँ मन्नत माँगते हैं तथा इच्छा पूर्ण हो जाने पर मंदिर में जीवित मुर्गा छोड़कर चले जाते हैं। मंदिर परिसर तथा इसके आसपास ऐसे काफी मुर्गे विचरण करते हुए देखे जा सकते हैं। कहा जाता है कि प्राचीन समय में यहाँ मुर्गों तथा अन्य पशुओं की बलि भी दी जाती थी। मंदिर के गर्भगृह के सामने बने दो खंभे इस बात का प्रमाण हैं, परन्तु वर्तमान में ऐसा नहीं किया जाता है। मंदिर परिसर में लंगूरों को भी काफी संख्या में देखा जा सकता है। मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं से इन्हें प्रसाद व भोजन मिलता रहता है। मंदिर का शांत व सुरम्य प्राकृतिक वातावरण मन को असीम शांति देने वाला है।




माताजी के भक्तों के अतिरिक्त यहाँ मानसून के समय पर्यटकों की भी भारी भीड़ रहती है, जिसका कारण है - वर्षाकाल में यहाँ बहने वाला सुंदर झरना। 70 फीट की ऊँचाई से गिरने वाला यह झरना लोगों के आकर्षण का मुख्य केन्द्र है। बारिश के कारण जब तालाब पूरा भर जाता है तो एनीकट पर चादर चलने से झरना बहने लगता है।


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हरी-भरी प्राकृतिक वादियों में बहते झरने का लुत्फ उठाने लोग भारी तादात में यहाँ पहुँचते हैं। बच्चों से लेकर बड़े-बुजुर्ग तक यहाँ झरने के पानी में नहाने का आनंद लेते हुए देखे जा सकते हैं। बहुत से युवा समूह भी यहाँ पिकनिक मनाने आते रहते हैं। कुछ लोग झरने के ऊपर चढ़कर सेल्फी लेते हुए भी देखे जा सकते हैं, जबकि ऐसा करना बेहद जोखिमभरा कार्य है। जरा सी असावधानी पर पैर फिसलकर नीचे गिरने से चोट लगने या जान जाने की संभावना रहती है। अतः इस प्रकार की गलती करने से बचना चाहिए।


इस झरने के नीचे नहाने के लिए पर्याप्त जगह मौजूद है। झरने से गिरकर नीचे जमा हुए पानी में लोगों को अठखेलियाँ करना तथा फोटो खिंचवाना बेहद पसंद आता है। झरने का शीतल जल तन-मन को सुकून प्रदान करता है। कुछ लोग झरने में नहाने की बजाय किनारे की चट्टानों पर पानी में पैर डालकर बैठना भी पसंद करते हैं। हरियाली की चादर ओढ़ी हुई प्राकृतिक वादियों में कल-कल बहते झरने का विहंगम दृश्य हर किसी को लुभाता है, तभी तो यहाँ बहुत से फोटोशूट भी होने लगे हैं।


झरने से गिरने वाला पानी नीचे स्थित संकरी घाटी में बहते हुए आगे चला जाता है। मंदिर के पीछे की तरफ कुछ दूरी चलने पर सीढ़ियों से नीचे उतरकर भी एक देवस्थान स्थित है। श्रद्धालु यहाँ भी दर्शन का लाभ पाते हैं। झरने से आने वाले पानी को यहाँ से बहकर जाते हुए देखा जा सकता है। यहाँ स्थित ऊँचे-घने वृक्षों के कारण सूर्य की धूप भी नीचे धरातल तक नहीं पहुँच पाती है।





बहुत से लोग भँवर माता आकर प्रसादी भी करते हैं। यहाँ आसपास खाने-पीने के सामान, प्रसाद व खिलौनों की कुछ छोटी-मोटी दुकानें भी स्थित हैं। झरने के शीतल जल में स्नान कर माताजी के दर्शन करना आत्मिक सुख देने वाला होता है। शहरी भीड़भाड़ से दूर सहज प्राकृतिक वातावरण वाला यह स्थल श्रद्धालुओं तथा प्रकृति प्रेमियों के बीच खासा प्रसिद्ध है।

शुक्रवार, 1 जनवरी 2021

भारत में बेहतरीन वाटर स्पोर्ट्स

रोमांचक जलीय खेल (Adventurous Water Sports)

हैलो दोस्तों,

पानी में अठखेलियाँ करना छोटे बच्चों से लेकर बड़े-बुजुर्गों तक सभी को बहुत पसंद होता है। इसी पानी के साथ रोमांच जोड़ दिया जाए तो बन जाते हैं - वाटर स्पोर्ट्स। Yatrafiber का आज का ब्लॉग उन वाटर स्पोर्ट्स से संबंधित है, जिनका अनुभव हमने अपनी विभिन्न यात्राओं के दौरान किया है।

बॉटिंग (Boating)

जलीय खेलों में सबसे आसान व काफी जगहों पर उपलब्ध नाव की सवारी करना सभी को पसंद आता है। नाव भी कई प्रकार की होती हैं। हमारा अनुभव मैं यहाँ साझा कर रही हूँ।

सबसे साधारण इंजन की सहायता से धीमी गति से चलने वाली नाव होती है, जो कि साधारणतः 15-20 सवारियों की क्षमता वाली होती है। उदयपुर की पिछोला झील, जयसमंद झील तथा गोआ के बागा बीच पर हमने इस तरह की नाव में सवारी का आनंद लिया था। धीमी गति से चलने के कारण आस-पास के सुंदर नजारों को बेहतरीन तरीके से देखा जा सकता है। झील के चारों ओर सुंदर इमारतों तथा प्राकृतिक दृश्यों को करीब से देखने व कैमरे में कैद करने की चाहत के कारण हमने इस नाव की सवारी करना पसंद किया। इसका शुल्क तय की जाने वाली दूरी के अनुसार अलग-अलग जगह पर अलग-अलग होता है।

Jai samand Lake


पैडल बॉट (Pedal Boat)

पैडल बॉट भी लोगों के द्वारा काफी पसंद की जाती है। इस तरह की नाव में पैडल बने होते हैं तथा सवारी को खुद पैडल मारकर नाव चलानी होती है। यानि कि नाव में घूमने के साथ-साथ उसे चलाने का अनुभव भी मिलता है। बहुत से पार्कों, रिसोर्ट्स तथा होटलों में भी छोटे कृत्रिम तालाब बनवाकर उनमें इस तरह की नाव उपलब्ध करवाई जाती हैं। हमने उदयपुर के सुखाड़िया सर्किल, अजमेर के दौलत बाग, ऊटी की ऊटी झील तथा माउंट आबू की नक्की झील में पैडल बॉट की सवारी करना पसंद किया। नाव चलाने के लिए स्वयं पैडल मारने पर मेहनत तो काफी लगती है, लेकिन इसका भी अपना अलग ही आनंद आता है। जहाँ मर्जी नाव रोक लो, जब मर्जी चलाओ, सुंदर प्राकृतिक दृश्यों को बिल्कुल करीब जाकर देखने जैसे अनुभव पैडल बॉटिंग के दौरान हमें मिले।

ये नाव दिखने में भी बहुत खूबसूरत सी लगती हैं, कोई बतख की आकृति वाली तो कोई मेंढक की आकृति वाली, कोई कबूतर जैसी तो कोई ड्रेगन के आकार में ढ़ली हुई। इसलिए इनमें बैठकर फोटो खिंचवाना सभी को अच्छा लगता है। ये नाव दो या चार सवारी वाली ही होती हैं तथा इनका शुल्क विभिन्न स्थानों पर दूरी के अनुसार अलग-अलग होता है।


स्पीड बॉट (Speed Boat)

स्पीड बॉट का तो नाम सुनकर ही पता चल जाता है कि इसकी गति बेहद तीव्र होती है। यह 15-20 मील/घंटा की रफ्तार से जलीय सतह पर दौड़ती है। इसमें चालक के अलावा 2 से 6 लोगों के बैठने की जगह होती है। तेज गति से चलती नाव, सामने जल से आती शीतल हवा, उड़ते पानी के छींटे सब कुछ मिलाकर एक शानदार अनुभव भ्रमण की यादों में शामिल कर देते हैं। हमने उदयपुर की फतेहसागर झील, गोआ के अंजुना बीच, ऊटी की पायकारा झील, केरल के कोवलम बीच, अंडमान व निकोबार के कोर्बिन कॉव बीच, अलवर की सिलीसेढ़ झील जैसे स्थलों पर स्पीड बॉट की तेज सवारी का आनंद लिया।


ऊटी की पायकारा झील में नौकायन करना काफी यादगार अनुभव रहा, क्योंकि इस दौरान हमें बायसन(जंगली भैंसा) से रूबरू होने का मौका मिला। पायकारा झील के पास वन्य क्षेत्र में बायसन बहुतायत में पाए जाते हैं। स्पीड बॉट की सवारी का आनंद लेते समय हमें एक किनारे की तरफ बायसनों का समूह दिखाई दिया। नौचालक ने उनसे कुछ दूरी पर हमारी नाव रोक दी। जिस कौतूहल से हम उन्हें देख रहे थे, उसी कौतूहल से वे भी हमें देख रहे थे। लेकिन शायद उन्हें हमारा वहाँ होना रास नहीं आया, तभी तो कुछ ही मिनटों में एक-एक कर वे सभी जंगल के अंदर चले गए।


जेट स्की (Jet Ski)

जेट इंजन लगा होने के कारण इसे जेट स्की कहा जाता है। इसे साधारण भाषा में वाटर स्कूटर भी कहते हैं। इसपर एक या दो लोग बैठ सकते हैं तथा यह तेजी से पानी पर दौड़ता है। इसका शुल्क 200-350 रुपये/व्यक्ति होता है। गोआ तथा केरल भ्रमण के दौरान हमने जेट स्की का आनंद लिया। समुद्री लहरों के बीच जेट स्की चलाने के लिए पूर्ण दक्षता होना आवश्यक है। अतः जेट स्की करने वाले सैलानी को स्कूटर को पकड़कर बस आगे बैठना होता है, जबकि स्कूटर को तेजी से चलाने का कार्य प्रशिक्षक के द्वारा किया जाता है। पानी को चीरकर तेजी से चलता जेट स्की जब समुद्र की लहरों पर कूदता हुआ आगे बढ़ता है तो रोमांच दुगुना हो जाता है। इसकी तेज गति के कारण सामने से शीतल हवा के साथ आती पानी की फुहारें मन को तरोताजा कर देती हैं। बहुत सी फिल्मों में हीरो को जेट स्की दौड़ाते हुए देखा जा सकता है। बहरहाल रोमांचकारी जलीय खेल पसंद करने वाले सैलानियों की सूची में जेट स्की अवश्य शामिल होता है।



बम्पर राइडिंग (Bumper Riding)

यह एक साहसिक जलीय खेल होने के साथ-साथ थोड़ा खतरनाक भी है। इसकी आकृति वृत्ताकार होती है तथा यह ट्यूब की तरह फूली हुई होती है। इसमें दो लोगों के लिए सीट बनी होती है। सीट पर लेटकर दोनों तरफ बने हत्थों को कसकर पकड़ना होता है। इसे एक स्पीड बॉट के साथ बाँध दिया जाता है। स्पीड बॉट के साथ यह बहुत तेजी से समुद्र की लहरों पर उछलते हुए आगे बढ़ती है। 200-300 रुपये/व्यक्ति चुकाकर इसका आनंद लिया जा सकता है। गोआ के अंजुना बीच पर बम्पर राइडिंग करना हमारे लिए एक बहुत ही शानदार अनुभव रहा। सीट पर लेटे हुए एक पल को लगता कि अंदर गहराई में जा रहे हैं, तभी अगले ही पल तेजी से आती लहर ऊपर उछाल देती। गति इतनी तेज कि ठीक से संभलने का मौका भी नहीं मिलता और दूसरी लहर आ जाती। कुल मिलाकर बम्पर राइडिंग एक बहुत मजेदार जलीय गतिविधि है, केवल इसमें हाथों की पकड़ मजबूत रखनी होती है, अन्यथा चोट लगने की संभावना रहती है, जैसा कि मेरे साथ हुआ था। बम्पर राइडिंग हमारे लिए एक नया अनुभव था, अतः हाथ थोड़ा सा ढ़ीला छोड़ देने के कारण उछलते बम्पर पर टकराने से मेरे पैर पर चोट लग गई थी। हालांकि यह चोट बहुत ज्यादा गहरी नहीं थी, परन्तु अगली बार के लिए सबक जरूर थी। तो अगर आप बम्पर राइडिंग करने जा रहे हैं, अपने हाथों की पकड़ मजबूत रखें, यकीनन यह रोमांचकारी खेल आपको बहुत पसंद आएगा।


बनाना राइडिंग (Banana Riding)

सबसे साहसिक जलीय खेलों में शामिल बनाना राइडिंग करने का अनुभव हमें गोआ भ्रमण के दौरान मिला। इसमें केले के समान आकृति वाली फूली हुई ट्यूब होती है, जिसपर एक साथ 6 लोग बैठ सकते हैं। इसपर पकड़ने के लिए रस्सी के हत्थे बने होते हैं। इसे स्पीड बॉट के पीछे बाँध दिया जाता है। यह स्पीड बॉट के साथ समुद्री लहरों पर बेहद तीव्र गति से चलने वाली बनाना राइडिंग करना सबके बस की बात नहीं है। क्योंकि लगभग 1-1.5 किमी की दूरी तय करने के बाद स्पीड बॉट को तेजी से घूमाकर बनाना ट्यूब पर बैठे लोगों को समुद्र के खारे पानी में गोते लगाने के लिए गिरा दिया जाता है। हालांकि लाईफ जैकेट पहनी होने के कारण जीवन को कोई खतरा नहीं होता है, परन्तु फिर भी बहुत से सैलानी दूसरे लोगों को बनाना राइडिंग करते देखकर ही पीछे हट जाते हैं। बनाना राइडिंग पर जाते समय हमारे मन में भी भय था, अतः हमने स्पीड बॉट चालक से पहले ही कह दिया था कि वे हमें बनाना ट्यूब पर बैठाकर समुद्र की सिर्फ सैर करा लाएं, लेकिन हमें गिराएं नहीं। हम तो नहीं गिराए जाने के विश्वास के साथ बनाना राइडिंग के मजे ले रहे थे, परन्तु नौचालक के दिमाग में अलग ही शैतानी चल रही थी, तभी तो उन्होंने अचानक इतनी तेजी से नाव को घुमाया कि हमें पता ही नहीं चला कि कब हमारे हाथ छूटे और कब हम समुद्र में जा गिरे। गिरने के साथ ही समुद्र के अंदर जाते समय एक पल को तो लगा कि साँस ही रूक गई है, आज हम जीवित नहीं बचने वाले, परन्तु अगले ही पल लाईफ जैकेट ने हमें तुरंत समुद्र की सतह पर पहुँचा दिया। आँखें खोलीं तो वाकई बेहद शानदार नजारा था। चारों तरफ समुद्र का हरा पानी और उसमें गोते लगाते हम। थोड़ी देर तक हमने वहीं समुद्र में डुबकियाँ लगाने का आनंद लिया। फिर चालक महोदय की सहायता से हम वापस बनाना ट्यूब पर बैठकर किनारे की ओर चल दिए। जब नौचालक ने हमसे इस तरह बिना बताए समुद्र में गिराने के अनुभव के बारे में पूछा तो हमारा जवाब था - बेहद मजेदार, शानदार, लाजवाब। अगर हमें नहीं गिराया जाता तो हम इस अनूठे अनुभव से वंचित रह जाते। बनाना राइडिंग हमारे द्वारा की गई सबसे रोमांचक जलीय गतिविधियों में से एक है। इसका शुल्क 200-250 रुपये/व्यक्ति चुकाना होता है।



स्नॉर्कलिंग (Snorkeling)

यह भी एक मजेदार जलीय गतिविधि है। पानी के अंदर के दृश्यों को देखने के लिए स्नॉर्कलिंग की जाती है। इसके लिए किसी विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं होती है। इसमें एक 30-40 सेमी लंबी रबड़ या प्लास्टिक की नली होती है, जिसे स्नॉर्कल कहा जाता है। स्नॉर्कल के एक सिरे को अपने जबड़ों के बीच दाँतों में फँसाकर रखना होता है, ताकि पानी के अंदर श्वांस ली जा सके। स्नॉर्कल का दूसरा सिरा स्वतंत्र होता है तथा बाहर जल की सतह पर निकला रहता है। इसके अतिरिक्त एक चश्मा होता है, जो कि जल को आँखों में जाने से रोकता है। तैराकों द्वारा तैराकी के समय ऐसे चश्मों का ही उपयोग किया जाता है। स्नॉर्कलिंग करते समय पानी के अंदर गहराई में नहीं जाना होता है, बल्कि जलीय सतह पर तैरते हुए केवल गर्दन से ऊपर वाले भाग को पानी में डुबोकर अंदर के दृश्यों को देखा जाता है। अंडमान व निकोबार भ्रमण के दौरान स्वराज(हैवलॉक) द्वीप के खूबसूरत एलिफेंटा बीच पर हमने मूँगा/प्रवाल भित्ति(कोरल रीफ) को देखने के लिए स्नॉर्कलिंग की थी। हमें तैरना नहीं आने के कारण हमने स्नॉर्कल व चश्मे के अतिरिक्त ट्यूब भी ली थी, ताकि उसकी सहायता से आसानी से तैरा जा सके। इसके अलावा हमारे साथ. एक प्रशिक्षक भी था। यदि किसी को तैरना आता है तो उसे ट्यूब की आवश्यकता नहीं होती है, परन्तु प्रशिक्षक या गाइड का साथ होना आवश्यक है, क्योंकि उन्हें उस क्षेत्र की संपूर्ण जानकारी होती है।


अंडमान व निकोबार की कोरल रीफ विश्वप्रसिद्ध है तथा यहाँ आने वाले पर्यटक इसे अवश्य देखना चाहते हैं। दरअसल मूँगा एक ऐसा जीव है, जो कि समूह में रहता है। इनपर कैल्शियम कार्बोनेट से बना कवच होता है, जो कि समुद्रतल में जमता रहता है। यह रंगबिरंगी चट्टानों जैसा बहुत ही सुंदर दिखाई देता है। स्नॉर्कलिंग के दौरान जैसे ही हमने गर्दन पानी में डुबाई, अंदर का दृश्य देखते ही रह गए। चारों तरफ कोरल रीफ की रंगबिरंगी चट्टानें देख ऐसा लग रहा था, मानो किसी दक्ष कलाकार ने उन्हें बनाकर वहाँ स्थापित किया हो। उन्हें देखकर कोई कह ही नहीं सकता कि वे किसी जीव का कवच हैं। चारों तरफ छोटी-बड़ी कई प्रकार की रंगबिरंगी मछलियाँ तैर रही थीं।


कोरल रीफ के साथ बहुत से जलीय पौधे भी उगे हुए थे, जो वहाँ की खूबसूरती को और बढ़ा रहे थे। समुद्र तल में सफेद रेत की परत बिछी हुई थी। मछलियों के अतिरिक्त और भी बहुत से जलीय जीवों का बसेरा कोरल रीफ के आस-पास था, क्योंकि वहाँ उन्हें भोजन व सुरक्षा दोनों मिल जाते हैं। लगभग आधे घंटे स्नॉर्कलिंग करने के बाद जब हम समुद्र तट पर पहुँचे तो ऐसा लग रहा था, मानो हम किसी जादुई दुनिया में होकर आए हैं। पानी की गहराई में जाने से डरने वाले लोग यदि समुद्र के अंदर की दुनिया देखना चाहते हैं, तो स्नॉर्कलिंग उनके लिए एक बेहतर विकल्प है।


जोर्ब बॉल (Zorb Ball)

यह भी एक मजेदार जलीय खेल है। इसे वाटर रोलर के नाम से भी जाना जाता है। माउंट आबू की यात्रा के दौरान हमने जोर्ब बॉल को को लुढ़काने वाले इस खेल का आनंद लिया था। इसमें प्लास्टिक का एक रोलर होता है, जिसकी दीवारों को पम्प से हवा भरकर फुलाया जाता है। अंदर से यह खोखला होता है। दोनों तरफ हवा पार होने तथा अंदर आने-जाने के लिए स्थान होता है। इसमें दो या तीन लोग अंदर जा सकते हैं, फिर इस रोलर को पानी में उतार दिया जाता है। रोलर का एक सिरा रस्सी से किनारे पर बँधा रहता है। पानी पर तैरते रोलर के अंदर बैठकर या खड़े होकर उसे तेजी से लुढ़काने में बड़ा ही मजा आता है। ऐसा करते हुए बचपन में प्लास्टिक की टंकी के अंदर घुसकर उसे लुढ़काने वाले खेल से जुड़ी यादें ताजा हो गईं। इस प्रकार हमने जोर्ब बॉल में बच्चों की तरह बहुत मस्ती की। बचपन की यादों में पहुँचा देने वाले इस जलीय खेल में गिरने या चोट लगने का खतरा नहीं होने के कारण यह सभी सैलानियों को बहुत पसंद आता है। इसका शुल्क 200-250 रुपये/व्यक्ति लगता है।

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माउंट आबू यात्रा  PART-1

माउंट आबू यात्रा  PART-2

माउंट आबू यात्रा  PART-3


पैरासेलिंग (Parasailing)

सबसे रोमांचक जलीय गतिविधियों में शामिल पैरासेलिंग करने का मौका हमें गोआ के अंजुना बीच पर मिला। गोआ के अंजुना बीच, बागा बीच तथा कलंगुट बीच पैरासेलिंग के लिए विश्वप्रसिद्ध हैं। इसमें एक विशेष प्रकार के पैराशूट को स्पीड बॉट के पीछे बाँधकर उड़ाया जाता है। इस पैराशूट को पैरासेल कहा जाता है। कई फिल्मों में हीरो-हीरोइन इस मजेदार गतिविधि का आनंद लेते दिखाए गए हैं। पैरासेलिंग के लिए हम 5-6 लोग स्पीड बॉट में बैठकर समुद्र में लगभग 1 किमी दूर पहुँचे। हमारी बॉट में पीछे पैरासेल रस्सी के सहारे बँधा हुआ था। एक बार में एक या दो व्यक्ति ही पैरासेलिंग कर सकते हैं। पैरासेलिंग करने वाले व्यक्ति को पैराशूट के साथ जुड़े बेल्ट की मदद से मजबूती से बाँध दिया जाता है। पैराशूट पूरी तरह नौचालक के नियंत्रण में रहता है, जबकि पैरासेलिंग करने वाले व्यक्ति का इसपर कोई नियंत्रण नहीं होता है। बहुत से लोग तो दूसरों को यूँ पैराशूट से बँधकर ऊँचाई पर उड़ते हुए तथा पानी में डुबकी लगाते देख कर ही घबरा जाते हैं तथा पैरासेलिंग करने की हिम्मत नहीं कर पाते हैं, लेकिन वास्तव में इसमें कोई खतरा नहीं है। जब दो लोगों के बाद मेरी बारी आई तो मैं पैरासेलिंग करने के लिए बेहद उत्साहित थी, क्योंकि किसी फिल्म में पहली बार पैरासेलिंग के दृश्य को देखने के बाद से ही पैरासेलिंग करना मेरी इच्छासूची में शामिल था।


पैरासेल की बेल्ट को अच्छी तरह बाँधने के बाद शरीर को आरामदायक स्थिति में ढ़ीला छोड़ना होता है। फिर नौचालक धीरे-धीरे रस्सी छोड़ना शुरू कर देता है। नाव छोड़कर समुद्र के ऊपर धीरे-धीरे ऊँचाई की ओर उठते जाना मन को रोमांच से भर देता है। पूरी ऊँचाई पर जाने के बाद जब तेजी से पैरासेल को नीचे लाकर समुद्र के पानी में गोते लगवाए जाते हैं तो यह रोमांच दुगुना-तिगुना हो जाता है। पैरासेल से बाँधकर यूँ समुद्री जल में अठखेलियाँ करवाने वाली यह साहसिक लेकिन मजेदार गतिविधि पर्यटकों को बेहद आकर्षित करती है। डुबकियाँ लगवाने के बाद कुछ मिनटों तक पूर्ण ऊँचाई पर उड़ते रहने का अनुभव मिलता है। ऊँचाई से नाव भी छोटे टब जैसी दिखाई देने लगती है। पैरासेल से नीचे फैले हरे समुद्र तथा उसमें उठती लहरों का ऐसा शानदार नजारा दिखाई देता है कि वापस नीचे उतरने का मन ही नहीं होता है। समुद्र की सतह पर विभिन्न जलक्रिड़ाएँ तथा दौड़ती नौकाएँ, ऊपर हवा में तैरते रंग-बिरंगे पैरासेल, समुद्र तट पर पानी में मस्ती करते तथा खाने-पीने का लुत्फ उठाते सैलानी, ऐसा खुशनुमा माहौल किसी का भी तनाव दूर करने के लिए काफी है। पैरासेल जब धीरे-धीरे वापस नाव की ओर आता है तो शरीर बिल्कुल हल्का महसूस होता है। ऐसा लगता है, मानो हम हवा में तैरते हुए नीचे उतर रहे हैं। मेरे बाद मेरे पति पैरासेलिंग हेतु गए। उन्हें पैरासेलिंग करना इतना अधिक रास आया कि उन्होंने पहले से ही दो बार डुबकियाँ लगवाने का शुल्क चुका दिया। साधारणतया पैरासेलिंग का शुल्क 700-800 रुपये/व्यक्ति होता है तथा डुबकियाँ लगवाने के लिए अतिरिक्त 300 रुपये/व्यक्ति का भुगतान करना होता है। पैरासेलिंग का अनोखा अनुभव हमारे लिए गोआ भ्रमण के सबसे यादगार लम्हों में से एक है।

(गोआ में जलीय गतिविधियों पर पैकेज भी मिलता है। यहाँ स्पीड बॉट, बम्पर राइडिंग, बनाना राइडिंग, जेट स्की तथा पैरासेलिंग पाँचों खेलों का अनुभव 1300-1500 रुपये/व्यक्ति चुकाकर लिया जा सकता है।)


स्कूबा डाइविंग (Scuba Diving)

जल में डूब गए जहाजों या बहुमूल्य वस्तुओं को ढ़ूँढ़ने के लिए की जाने वाली गोताखोरी का वर्तमान में मनोरंजन के क्षेत्र में विशेष स्थान है। पानी के अंदर गहराई में जाकर जलीय जीवन को करीब से देखने के लिए स्कूबा डाइविंग की जाती है। स्कूबा डाइविंग में स्कूबा नाम का विशेष श्वसन उपकरण होता है, जिसका उपयोग गोताखोरी के समय श्वांस लेने के लिए किया जाता है। स्कूबा डाइविंग करते समय ऑक्सीजन गैस का सिलेंडर साथ लेकर जाते हैं, ताकि पानी के नीचे आसानी से श्वांस लेते हुए अधिक समय बिताया जा सके। इस ऑक्सीजन सिलेंडर से एक नली जुड़ी होती है, जो कि मुँह में आसानी से फिट हो जाती है, इसे जबड़ों के बीच दबाकर रखना होता है। इसी से श्वांस लेने हेतु गैस अंदर खींची जाती है तथा श्वांस छोड़ने पर गैस बुलबुलों के रूप में पानी में छोड़ दी जाती है। नाक पूर्णतया ढ़की रहती है। आँखों पर भी तैराकी के समय काम में लिया जाने वाला चश्मा लगाया जाता है। स्कूबा डाइविंग के लिए जाने वाले व्यक्ति को विशेष प्रकार के वस्त्र पहनने पड़ते हैं, जो पानी के अंदर दबाव से शरीर की रक्षा करते हैं तथा उत्पलावनता भी प्रदान करते हैं। पैरों में भी फिन्स बाँधे जाते हैं, ताकि तैरने में आसानी रहे।


स्कूबा डाइविंग करवाने वाले व्यक्ति के पास विशेष प्रशिक्षण का प्रमाण-पत्र तथा लाइसेंस होना आवश्यक है। स्कूबा डाइविंग करने के इच्छुक व्यक्तियों को भी पानी के अंदर की परिस्थितियों को समझने हेतु पहले प्रशिक्षण दिया जाता है तथा बाद में पानी के अंदर भी प्रशिक्षक साथ ही रहता है। हमने अंडमान व निकोबार के स्वराज(हैवलॉक) द्वीप पर स्कूबा डाइविंग की थी। इसका शुल्क 4000-6000 रुपये/व्यक्ति होता है। यहाँ लगभग 10-15 मीटर की गहराई तक स्कूबा डाइविंग करवाई जाती है। प्रशिक्षण व स्कूबा डाइविंग को मिलाकर कुल एक घंटे का समय लगता है।

स्कूबा डाइविंग के वस्त्रों तथा सभी उपकरणों से लेस होने के बाद हमें भी 15-20 मिनट प्रशिक्षण दिया गया तथा उसका अभ्यास करवाया गया। प्रशिक्षण के बाद पहली बार समुद्री जल के अंदर जाने के लिए हम बेहद उत्साहित थे। कुछ दूरी समुद्र की सतह पर तय करने के बाद जब हमने पानी के अंदर प्रवेश किया तो वहाँ का सुंदर नजारा देखते ही रह गए। ऊपर मीलों तक फैले नीले सागर के नीचे एक पूरी दुनिया बसी हुई थी। चारों तरफ कोरल रीफ (मूँगे की चट्टान) की रंग-बिरंगी चट्टानें बेहद शानदार नजारा प्रस्तुत कर रही थीं। समुद्र में समूह में रहने वाले एक नन्हे से जीव के कैल्शियम कार्बोनेट से बने कवच जमा होते-होते इतनी बड़ी-बड़ी और खूबसूरत चट्टानों का निर्माण कर देते हैं कि ये किसी दक्ष कलाकार की कलाकारी से कम नहीं लगतीं। ये कोरल रीफ समुद्र में रहने वाले बहुत से जीवों को भोजन व सुरक्षा प्रदान करती हैं। चारों तरफ उगी हुई जलीय वनस्पतियाँ तथा उनकी विशेष संरचनाएँ खूबसूरती में किसी उद्यान में लगी हुई पुष्प वाटिका से किसी भी प्रकार कम नहीं थीं। पास जाकर नुकसान नहीं पहुँचाने वाले ऐसे जलीय पादपों को छूकर देखने का अनुभव बिल्कुल नया था।

चारों तरफ जलीय जीवों की न जाने कितनी प्रजातियाँ तैरते हुए अपनी दुनिया में मग्न थीं। कहीं बिल्कुल नन्हीं-नन्हीं मछलियाँ झुंड बनाकर तैर रही थीं, तो कहीं कोई बड़ी मछली अकेली ही शान से विचरण कर रही थी। समुद्री दुनिया बेहद रंगबिरंगी होती है, ऐसा कोई रंग नहींं होगा, जिस रंग की वहाँ मछली ना हो। समुद्र तल में बिछी चिकनी सफेद रेत को हाथ से छूकर देखने वाला पल मैं कभी नहीं भूल सकती। कुछ छोटे-छोटे जीव चट्टानों से बाहर झाँक रहे थे। कभी कोई सफेद जलीय सर्प पास से लहराते हुए निकलकर भय मिश्रित रोमांच उत्पन्न कर देता तो कभी कोई विचित्र सी आकृति का जीव सामने आकर असमंजस में डाल देता।


          बाहर कभी शांत रहकर तो कभी लहरों का गर्जन कर लोगों को आकर्षित करने वाला समुद्र अपने अंदर इतनी अधिक खूबसूरती और विविधता समेटे हुए है, जो कि आँखों से देखे जाने पर भी यकीन से परे है। यहाँ-वहाँ बिखरे शंख, सीपियाँ तथा समुद्री पत्थर समुद्र तल का श्रृंगार और बढ़ा देते हैं। समुद्री दुनिया की लुभावनी खूबसूरती में खोकर कब स्कूबा डाइविंग का समय पूर्ण हुआ, हमें पता ही नहीं चला। बाहर के शोरगुल से अलग सागर की गोद में बसी इस बेहद हसीन व मनमोहक जलीय दुनिया को देखकर हम प्रकृति की कलाकारी के कायल हुए बिना न रह सके। जलीय रोमांच पसंद करने वाले व्यक्तियों के लिए स्कूबा डाइविंग एक बहुत अच्छा विकल्प है।

          उपर्युक्त वर्णित सभी जलीय गतिविधियों के दौरान हमने लाईफ जैकेट पहनी हुई थी। यह एक सुरक्षा उपकरण है, जो कि व्यक्ति को पानी में डूबने से बचाता है। गहरे जल में की जाने वाली सभी मनोरंजक गतिविधियों के समय लाईफ जैकेट अवश्य पहनी जानी चाहिए। इन गतिविधियों में छोटे बच्चों का शामिल होना निषेध है। इसके अतिरिक्त इन खेलों का आनंद हमेशा दक्ष प्रशिक्षक की उपस्थिति में ही लेना चाहिए तथा उनके दिशा-निर्देशों का पूर्णतः पालन करना चाहिए। क्योंकि जरा सी भी असावधानी किसी भी दुर्घटना का कारण बन सकती है, जिसके शारीरिक क्षति या जान जाने जैसे बेहद गंभीर परिणाम भी हो सकते हैं। यदि सुरक्षा का ध्यान रखते हुए इन जलक्रीड़ाओं को किया जाए तो यकीनन आपकी यादों के खजाने में बहुत से रोमांचकारी व यादगार लम्हे जुड़ जाएँगे।