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रविवार, 29 नवंबर 2020

भारत की दूसरी सबसे बड़ी कृत्रिम झील जयसमंद का नजारा

जयसमंद झील, उदयपुर

नमस्कार प्रिय पाठकों, 

पूर्व के वेनिस के नाम से प्रसिद्ध राजस्थान का खूबसूरत शहर उदयपुर देशी-विदेशी पर्यटकों के लिए सदैव आकर्षण का केन्द्र रहा है। यहाँ मौजूद छोटी-बड़ी कई सारी झीलों ने इसे झीलों की नगरी का खिताब दिलाया है। आज मैं yatrafiber पर इन्हीं में से एक जयसमंद झील के बारे में बताना चाहूँगी।

जयसमंद झील उदयपुर-सलम्बूर मार्ग पर उदयपुरसिटी रेलवे स्टेशन से लगभग 56 किमी की दूरी पर स्थित है। उदयपुर बस स्टेण्ड से इसकी दूरी लगभग 57 किमी है तथा महाराणा प्रताप हवाईअड्डे(डबोक) से इसकी दूरी लगभग 73 किमी है। रेलवे स्टेशन, बस स्टेण्ड तथा हवाईअड्डे से सार्वजनिक बसों द्वारा अथवा निजी वाहन करके जयसमंद झील तक पहुँचा जा सकता है।

जयसमंद झील का निर्माण महाराणा जयसिंह ने करवाया था। इसका निर्माण कार्य सन् 1687 में प्रारम्भ किया गया तथा सन् 1691 में पूर्ण हुआ। जयसमंद झील एशिया की दूसरी सबसे बड़ी कृत्रिम झील है। इसकी लंबाई लगभग 14 किमी है। इसकी अधिकतम गहराई 120 फीट है। गोमती नदी पर बाँध बनाकर इस झील का निर्माण किया गया है। इस बाँध की ऊँचाई लगभग 36 मीटर है। बाँध का निर्माण संगमरमर जैसे दिखने वाले सफेद सुमाजा पत्थरों से किया गया है। सुरक्षा का ध्यान रखते हुए इससे थोड़ी दूर एक अन्य बाँध भी बनवाया गया है। महाराणा सज्जनसिंह तथा महाराणा फतेहसिंह द्वारा इन बाँधों के बीच की भूमि को समतल करवाकर वृक्षारोपण करवाया गया है। कहा जाता है कि इस बाँध के उद्घाटन के समय महाराणा जयसिंह ने अपने वजन के बराबर सोना वितरित किया था।

प्राचीन समय में ढ़ेबर के नाम से प्रसिद्ध जयसमंद झील जब पूर्णतः भरी हुई होती है तो इसका क्षेत्रफल लगभग 50 वर्ग किमी होता है। कहा जाता है कि निर्माण के समय इसमें 9 नदियों तथा 99 नालों का जल आकर मिलता था। परन्तु वर्तमान में गोमती तथा उसकी सहायक नदियाँ इसकी जलापूर्ति का प्रमुख साधन हैं। आस-पास के गाँवों में नहरों के द्वारा झील के पानी से जलापूर्ति की जाती है। यह भी कहा जाता है कि एक बार जयसमंद झील का जलस्तर इतना अधिक बढ़ गया था कि आसपास के लगभग 10 गाँव इसमें समा गए। आज भी ग्रीष्मकाल में जब झील का जलस्तर कम हो जाता है तो इनके अवशेष दिखाई देते हैं।

जलापूर्ति के साधन के साथ-साथ सुंदर प्राकृतिक पिकनिक स्थल के रूप में इस विशाल झील का निर्माण करवाया गया था। इसकी पाल पर नीचे झील की तरफ जाती हुई सीढ़ियाँ बनवाई गई हैं। यहाँ थोड़ी-थोड़ी दूरी पर स्थित सूँड उठाए हाथी की मूर्तियाँ तथा छतरियाँ स्थापत्य कला का सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। कहा जाता है कि शाम की शीतल हवा का आनंद लेने के लिए रानियाँ इन छतरियों में आकर बैठा करती थीं। फिलहाल सैलानी यहाँ साँझ की ठंडी हवा के झोंको का आनंद लेते देखे जा सकते हैं। यह यहाँ के खूबसूरत वातावरण की खूबी ही है कि यहाँ कई फिल्मों की शूटिंग भी की गई है।


Jaisamand Lake

जयसमंद झील के पास ही पहाड़ी पर रूठी रानी का महल स्थित है। यहीं पर एक हवामहल भी स्थित है। इसके अतिरिक्त झील के पास अन्य महल भी बनवाए गए हैं। जयसमंद झील में कुछ छोटे-बड़े टापू भी स्थित हैं। इनमें से सबसे बड़े टापू का नाम बाबा का मगरा तथा सबसे छोटे टापू का नाम प्यारी है। प्राचीन समय में इन टापुओं पर मीणा जनजाति का बसेरा हुआ करता था।


जयसमंद झील के एक टापू पर निजी फर्म द्वारा जयसमंद आइलैंड रिसोर्ट का निर्माण करवाया गया है। यहाँ पाँचसितारा सुविधाएँ उपलब्ध हैं। सैलानी यहाँ रूककर जयसमंद झील के नजारों के साथ स्वादिष्ट भोजन, स्वीमिंग पूल व अन्य सुविधाओं का लुत्फ उठा सकते हैं। किनारे से यहाँ तक आने-जाने के लिए नाव की सुविधा उपलब्ध करवाई जाती है।

जयसमंद झील घूमने का शुल्क मात्र 10 रुपये प्रति व्यक्ति है। इसके अतिरिक्त झील में बॉटिंग का आनंद भी लिया जा सकता है। बॉटिंग के लिए दूरी के आधार पर 100 रुपये, 200 रुपये व 300 रुपये शुल्क लिया जाता है। सैलानी अपनी इच्छानुसार कम या अधिक दूरी वाली बॉटिंग कर सकते हैं। चारों तरफ हरी-भरी पहाड़ियों से घिरी स्वच्छ जल वाली जयसमंद झील की विशाल जलराशि में बॉटिंग करना बेहद सुखद अनुभव है। बॉटिंग करते समय यहाँ पक्षियों की जलक्रिड़ाएँ भी देखी जा सकती हैं। जयसमंद झील घूमने के लिए सबसे अच्छा समय मानसून है। पहाड़ों से उतरकर झील में आते बादलों के बीच बॉटिंग करना किसी रोमांच से कम नहीं है। यहाँ पक्षियों की भी बहुत सी प्रजातियाँ देखी जा सकती हैं। साथ ही यहाँ पर जयसमंद वन्यजीव अभयारण्य भी स्थित है।



जयसमंद झील के पास नर्बदेश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर भी स्थित है। मंदिर के बारे में पुजारी जी के द्वारा बताया गया कि इसका निर्माण भी झील के निर्माण के समय ही करवाया गया था। अतः जयसमंद झील भ्रमण के साथ शिव मंदिर में दर्शन का लाभ भी लिया जा सकता है। यहाँ लंगूरों के झुंड भी विचरण करते हुए देखे जा सकते हैं।


जयसमंद झील के पास ही एक सुंदर बगीचा भी है। बगीचे में बड़े वृक्ष, घास, बैठने के लिए बैंच, छतरी तथा बच्चों के लिए झूले भी लगे हुए हैं। जयसमंद झील के यादगार लम्हों को तस्वीरों के रूप में संजोने की इच्छा रखने वालों के लिए यहाँ फोटोग्राफर भी उपलब्ध हैं, जो कि प्रति फोटो 50-70 रुपये शुल्क लेते हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ कुछ घोड़ेवाले भी उपलब्ध हैं, जिन्हें दूरी के हिसाब से 50 रुपये या 100 रुपये चुकाकर जयसमंद के किनारे घुड़सवारी का आनंद लिया जा सकता है।



चारों ओर पहाड़ियाँ, जहाँ तक नजर जाए, वहाँ तक जल की उपस्थिति, बीच-बीच में उभरे हुए हरे-भरे टापू, चारों ओर पक्षियों का कलरव, सब कुछ मिलाकर प्रकृति की सुंदर चित्रकारी का प्रदर्शन करते हुए से प्रतीत होते हैं। सूर्य की किरणों में चाँदी से चमकते स्वच्छ जलयुक्त जयसमंद झील का यह सुरम्य वातावरण पर्यटकों को सहज ही मोहपाश में बाँध लेता है। यही कारण है कि उदयपुर घूमने आने वाले सभी सैलानी जयसमंद झील भ्रमण की इच्छा अवश्य रखते हैं।

(और पढ़ें - राजस्थान में इतना सुंदर झरना : भँवर माता)

(और पढ़ें - जयपुर के पास खूबसूरत पिकनिक स्थल : सिलिसेढ़ झील )

शुक्रवार, 13 नवंबर 2020

जयपुर के झालाना जंगलों में इतने पैंथर 😳😳

झालाना लेपर्ड सफारी, जयपुर

नमस्कार प्रिय पाठकों,

          राजस्थान की राजधानी जयपुर पर्यटन स्थल के रूप में सम्पूर्ण विश्व में प्रसिद्ध है। यहाँ बहुत सारे दर्शनीय स्थल स्थित हैं। आज मैं yatrafiber पर इन्हीं में से एक 'झालाना लेपर्ड रिजर्व' के बारे में बताने जा रही हूँ। झालाना लेपर्ड रिजर्व जयपुर जंक्शन रेलवे स्टेशन से लगभग 13 किमी तथा सिंधी कैंप बस अड्डे से लगभग 12 किमी की दूरी पर स्थित है। जयपुर हवाई अड्डे से इसकी दूरी लगभग 6 किमी है।

          झालाना लेपर्ड रिजर्व, जयपुर में अरावली पर्वतमाला की तलहटी में बसा प्राकृतिक वन्य क्षेत्र है। पूर्व समय में यह क्षेत्र राजपरिवार की निजी सम्पत्ति में आता था तथा राजपरिवार के सदस्य यहाँ शिकार करने आते थे। वर्तमान में झालाना आरक्षित वन्य क्षेत्र है तथा यहाँ शिकार पर पूर्णतया प्रतिबंध है।

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          झालाना लेपर्ड रिजर्व लगभग 23 वर्ग किमी क्षेत्रफल में फैला हुआ है। इस वन्य क्षेत्र में वर्तमान में लगभग 45 तेंदुए मौजूद हैं। कम वन्य क्षेत्र में तेंदुओं की अधिक तादात होने के कारण सफारी के दौरान इनके दिखाई दे जाने की अत्यधिक संभावना होती है। यही कारण है कि कुछ ही समय में झालाना लेपर्ड सफारी काफी संख्या में पर्यटकों को आकर्षित करने में सफल रही है। तेंदुओं के अतिरिक्त चीतल, बारहसिंगा, नीलगाय, मरूस्थली लोमड़ी, जरख, लंगूर आदि वन्यजीव भी यहाँ देखे जा सकते हैं।

          22 अक्टूबर, 2020 को हमने झालाना लेपर्ड सफारी पर जाने की योजना बनाई। लेपर्ड सफारी सुबह व शाम दोनों समय होती है। सैलानी अपनी इच्छानुसार दोनों या किसी एक समय सफारी कर सकते हैं। टिकट का शुल्क भी उसी अनुसार लगता है। हमने सफारी के लिए शाम का समय चुना। हम तथा हमारे दो मित्र परिवार, कुल मिलाकर 6 व्यस्क तथा 2 बच्चे लेपर्ड सफारी पर जाने वाले थे। लेपर्ड सफारी के लिए टिकट ऑनलाइन व ऑफलाइन दोनों तरीके से ली जा सकती हैं। हमने टिकट ऑफलाइन लीं। हम सबकी टिकट का कुल मूल्य 2400 रुपये था। वास्तव में इसमें टिकट के साथ उस जिप्सी का किराया भी शामिल था, जिसमें बैठकर हम झालाना लेपर्ड सफारी के लिए जाने वाले थे। झालाना रिजर्व में निजी वाहन द्वारा सफारी नहीं की जा सकती। वहाँ वन विभाग द्वारा संचालित इलेक्ट्रिक जिप्सियों में जंगल सफारी करवाई जाती है। ये खुली इलेक्ट्रिक जिप्सी बिल्कुल भी शोर नहीं करती हैं, जिससे वन्यजीवों की प्राकृतिक गतिविधियों में व्यवधान नहीं पड़ता तथा उन्हें देखना आसान हो जाता है। एक जिप्सी में ड्राइवर के अतिरिक्त 6 लोगों के बैठने की जगह होती है।

          शाम को 4 बजे हमने सफारी शुरू की। लेपर्ड रिजर्व के मुख्य द्वार से अंदर प्रवेश करते ही लंगूरों के झुंड द्वारा हमारा स्वागत किया गया। भारतीय ग्रे लंगूर यहाँ बड़ी तादात में पाए जाते हैं। झालाना लेपर्ड रिजर्व को तीन ज़ोन में बाँटा गया है। तीसरे ज़ोन में मानसून के समय रास्ते खराब हो जाने के कारण अभी प्रवेश निषेध था, जबकि ज़ोन-1 व ज़ोन-2 सफारी का आनंद लेने हेतु खुले थे।

          हम पहले ज़ोन-1 में गए। वहाँ भी अंदर प्रवेश करते ही वृक्षों पर लंगूरों के झुंड के झुंड देखने को मिले। हम पैंथर(तेंदुआ) देखने के लिए काफी उत्सुक थे और साथ ही मन में कई शंकाएँ भी थीं, जिन्हें दूर किया हमारे वाहनचालक (श्री वेदप्रकाश) ने। वे पिछले 4 साल से यहाँ सफारी जिप्सी चला रहे हैं, अतः काफी अनुभवी थे। लंगूरों के अतिरिक्त नीलगायों का समूह भी मैदान में घास चर रहा था। थोड़ा आगे चलने के बाद हमें चीतल हिरणों का झुंड दिखाई दिया। हरे-भरे जंगल में बेफिक्र कुलांचे भरते हिरणों को देखना एक सुखद अनुभव रहा।


          आगे के रास्ते पर हमें कई सुंदर-सुंदर प्रजातियों के पक्षी दिखाई दिए। इसके अलावा वृक्षों की भी बहुत सी प्रजातियाँ देखने को मिलीं। लेकिन वास्तव में तो हम पैंथर को देखने के लिए उतावले हो रहे थे, जिनका फिलहाल कोई अता-पता नहीं था। रिजर्व में वन्यजीवों के लिए पानी के कुण्ड सफारी के लिए बनाए गए मार्ग के आस-पास ही  बनाए गए हैं, ताकि पानी पीने आए वन्यजीवों को सैलानियों द्वारा देखा जा सके। एक जगह पानी के कुण्ड के पास कुछ देर रूककर हमने इंतजार भी किया, परन्तु कोई वन्यजीव दिखाई ना देने के कारण हम आगे बढ़ गए।

          झालाना लेपर्ड रिजर्व में जगह-जगह ट्रेप कैमरे भी लगाए गए हैं, ताकि वन्यजीवों की गतिविधियों पर नजर रखी जा सके। पूरे ज़ोन-1 में घूमने के बाद भी हमें कोई पैंथर नहीं दिखा। अतः हमने ज़ोन-2 में जाने का निर्णय लिया। जैसे ही हम ज़ोन-1 से निकलकर ज़ोन-2 में पहुँचे, हमारे वाहनचालक के पास अन्य वाहनचालक का फोन आया कि ज़ोन-1 में पैंथर दिखाई दिया है। मोबाईल नेटवर्क उपलब्ध होने के कारण वहाँ वाहनचालक पैंथर दिखाई देने पर आपस में एक-दूसरे को सूचना दे देते हैं।

          हम वापस ज़ोन-1 में पहुँचे। वहाँ पहुँचकर पता चला कि जिस पानी के कुण्ड के पास हमने इंतजार किया था, उसी में पानी पीने के बाद एक पैंथर पास की ऊँची घास में गया है। वहाँ कई जिप्सी रूकी हुई थीं तथा सभी सैलानी दम साधे एकटक घास पर नजरें जमाए हुए थे। तभी एक जगह घास हिलती हुई नजर आई। पैंथर दिखने की उम्मीद में सभी ने वहाँ ध्यान केंद्रित किया हुआ था। लगातार हिलती घास को देखकर पता चल रहा था कि पैंथर आगे की ओर जा रहा था। फिर घास में हलचल होना बंद हो गई। कुछ देर इंतजार के बाद सबको लगा कि पैंथर शायद नीचे ढ़लान की तरफ चला गया है, लेकिन तभी उसने एक ऊँची छलांग लगाई और फिर घास में ओझल हो गया। पैंथर दिखाई देने पर सभी सैलानियों का उत्साह देखते ही बन रहा था। बहुत से वन्यजीव प्रेमी लगातार अपने कैमरे में ये दृश्य कैद करने में लगे हुए थे।

          इसके पश्चात हमने ज़ोन-2 में जाने का निर्णय लिया। ज़ोन-2 में भी शुरूआती खुले क्षेत्र में नीलगायों के झुंड चरने में मग्न थे। थोड़ा आगे जाने के बाद एक जगह हमें 2-3 जिप्सी रूकी हुई दिखाई दीं। पैंथर की उपस्थिति का अनुमान लगाते हुए हम भी वहाँ पहुँचे। वहाँ पहुँचकर हमने देखा कि थोड़ी दूरी पर एक बड़े वृक्ष के ऊपर एक पैंथर आराम से बैठा हुआ था। उसे बेफिक्र बैठे देखकर ऐसा लग रहा था, मानो वह फोटो खींचने वाले वन्यजीव प्रेमियों को फोटो के लिए पोज़ दे रहा है। कभी वह आराम से पंजों पर सिर टिकाकर बैठ जाता तो कभी चौकन्ना होकर पर्यटकों की तरफ देखने लग जाता। काफी देर तक उसे निहारने के बाद हमने एक बार आगे तक पूरे ज़ोन का चक्कर लगाने का निर्णय लिया। थोड़ा आगे जाने के बाद मार्ग के किनारे-किनारे पैंथर के ताजा पगमार्क बने हुए थे। अतः वहाँ पैंथर दिखाई देने की संभावना होने के कारण हमने कुछ देर इंतजार किया, परन्तु आसपास के क्षेत्र में कोई हलचल ना होने पर हम आगे बढ़ गए। ज़ोन-2 के अंतिम छोर तक जाकर आने तक मार्ग में हमने पक्षियों की काफी प्रजातियों को देखा। आते समय भी हमने पगमार्कों के पास के क्षेत्र में कुछ देर इंतजार किया, परन्तु पैंथर नहीं दिखने पर वापस लौट पड़े।

          वापस आते समय हमने देखा कि वह पैंथर अब भी वृक्ष पर ही जमा हुआ था, अतः हम भी वहीं रूक गए। थोड़ी देर बाद पैंथर वृक्ष से नीचे उतरने लगा, यह देखकर सभी उत्साहित हो गए। नीचे उतरने के बाद 2-3 मिनट तक वहीं घास में खड़े रहने के बाद वह यकायक तेजी से दौड़ा तथा वापस वृक्ष की ऊँची डाल पर चढ़ गया। पैंथर की अठखेलियाँ देख सैलानी खुशी से झूम उठे। कुछ देर बाद पैंथर वापस वृक्ष से नीचे उतरा तथा अंदर गहन जंगल में चला गया। हमने भी एक बार फिर ज़ोन-1 की तरफ रूख मोड़ दिया।

          ज़ोन-1 में थोड़ा सा अंदर जाते ही लंगूरों की तेज आवाजें सुनकर हमें पैंथर की उपस्थिति का अंदेशा हुआ। तभी हमें एक और जिप्सी भी खड़ी हुई दिखाई दी। वहाँ पहुँचने पर उन लोगों ने बताया कि सामने घास में पैंथर बैठा हुआ है। सूखी घास में उससे मिलते-जुलते रंग के पैंथर को देखने के लिए हमारी आँखों को कुछ श्रम करना पड़ा। कुछ देर बैठे रहने के बाद पैंथर खड़ा हुआ, एक जम्हाई ली और अचानक ढ़लान पर तेजी से दौड़ा। एक बार को तो धड़कनें ही बढ़ गई, लगा कि जिप्सियों की ओर ही दौड़कर आ रहा है। फिर पता चला कि घास में छुपे पक्षियों को पकड़ना चाह रहा था। पक्षी हाथ नहीं लगे तो कुछ देर चुपचाप वहीं घास में छुप गया।

          कुछ देर बाद अचानक तेजी से दौड़कर एक वृक्ष पर चढ़ा ताकि उसपर बैठे लंगूरों में से किसी का शिकार कर सके, परन्तु लंगूर चौकन्ने थे, अतः बच निकले। पैंथर पेड़ से नीचे उतरा तथा वापस जाने लग गया। कुछ दूर जाकर फिर पलटा और एक दूसरे वृक्ष पर चढ़कर लंगूरों को पकड़ने की कोशिश की। ऊँची डालियों तक चढ़ने के बावजूद भी फूर्तिले लंगूर उसकी पहुँच से दूर चले गए। शिकार नहीं मिलने पर पैंथर वहीं पेड़ पर पैर लटकाकर बैठ गया। खुले वन्यक्षेत्र में यूँ पैंथर को शिकार पकड़ने की कोशिश करते देख सभी रोमांचित हो उठे।

          शाम गहरी होने लगी थी। रिजर्व बंद होने का समय होने वाला था, अतः हमने एक बार पुनः पूरे ज़ोन का चक्कर लगाकर आने का निर्णय लिया। दिनभर आराम करने के बाद शाम को माँसाहारी जीव शिकार हेतु निकलते हैं, अतः उनके दिखने की संभावना अधिक होती है। पूरे ज़ोन का चक्कर लगाने पर भी हमें कोई और वन्यजीव नहीं दिखा। 6.15 बज चुके थे, अतः हम भी वन्यजीव क्षेत्र से बाहर आ गए।


मानसून के बाद हरियाली से लदी अरावली की पहाड़ियों से घिरे खुले वन्यक्षेत्र में विचरण करते वन्यजीवों को देखना काफी रोमांचभरा अनुभव था। इसके अतिरिक्त जंगल के उबड़-खाबड़ मार्गों पर दौड़ती खुली जिप्सी में सफारी करने का मजा ही कुछ और था। बाहर से जयपुर आने वाले पर्यटकों के लिए यह एक शानदार भ्रमण स्थल है और यदि आप जयपुरवासी हैं तो कम से कम एक बार आपको झालाना लेपर्ड रिजर्व में सफारी का अनुभव अवश्य लेना चाहिए। यकीनन आपकी सफारी बहुत रोमांचक और मजेदार रहेगी।

मंगलवार, 27 अक्टूबर 2020

माउंट आबू की सैर (तृतीय व अंतिम भाग)

माउंट आबू यात्रा  PART-3

Mount Abu ,Rajasthan Tourism: Travel Guide Mount Abu

सभी पाठकों को नमस्कार,

          हमारी माउंट आबू यात्रा के प्रथम दिवस व द्वितीय दिवस के बारे में मैं yatrafiber के पिछले ब्लॉग्स में लिख चुकी हूँ, आगे की यात्रा के अनुभव मैं इस ब्लॉग द्वारा साझा कर रही हूँ....

          अगले दिन यानि 20 सितम्बर, 2020 को सुबह वही 9 बजे तक हम तैयार हो गए तथा नाश्ता करके टॉड रॉक घूमने चल दिए। नक्की झील के पास से एक रास्ता है, जिसपर कुछ दूरी तय करने के बाद टॉड रॉक के लिए सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। सीढ़ियाँ चढ़ते समय आस-पास के क्षेत्र का सुंदर नजारा दिखाई देता है। बीच में हनुमान जी का एक छोटा सा मंदिर भी स्थित है। मंदिर से थोड़ा और आगे चढ़ने के पश्चात सीढ़ियों के स्थान पर पहाड़ी उबड़-खाबड़ रास्ता है, जिसपर चढ़ाई करते समय माउंटेन ट्रेकिंग का एहसास होता है।

माउंट आबू यात्रा  PART-1

माउंट आबू यात्रा  PART-2

 

 

          सबसे ऊपर जाकर टॉड रॉक स्थित है, जो कि एक बड़े मेंढ़क के आकार की चट्टान है। इस चट्टान को देखकर ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि एक बड़ा मेंढ़क पहाड़ के किनारे बैठकर नीचे स्थित नक्की झील में छलांग लगाने वाला है। बच्चों के साथ चढ़ाई कर हम थक चुके थे, अतः कुछ देर टॉड रॉक के पास ही छाया में बैठकर विश्राम किया। ऊपर एक छोटी सी दुकान भी है, जिसपर पानी, नींबू पानी, चिप्स, कुरकुरे, नमकीन, बिस्किट जैसी चीजें उपलब्ध हैं। हमने भी नींबू पानी का आनंद लिया। बहुत सारे लोग टॉड रॉक के साथ फोटो खिंचवाने में मग्न थे। कुछ देर विश्राम के बाद हम भी इधर-उधर टहलने लगे। इतनी ऊँचाई से नक्की झील की खूबसूरती देखने लायक थी। चट्टान का विचित्र आकार, ऊँचाई से दिखती नक्की झील, चारों तरफ पहाड़ों की हरी-भरी श्रृंखलाएँ तथा उनपर उतरते-चढ़ते बादलों के समूह, प्रकृति की इस सुंदर चित्रकारी के आकर्षण में बँधकर सैलानी यहाँ घंटों बैठना पसंद करते हैं। हमने भी टॉड रॉक के साथ-साथ चारों तरफ के सुंदर दृश्यों की बहुत सी तस्वीरें लीं तथा तकरीबन दो घंटे का समय वहाँ बीताने के बाद नीचे उतरना शुरू किया। उतरना प्रारंभ करते ही बूँदाबाँदी शुरू हो गई, परन्तु मार्ग के किनारे स्थित घने-ऊँचे वृक्षों के कारण मुश्किल से ही कुछ बूँदें हम तक पहुँच पा रही थीं। थोड़ा नीचे आने के बाद बारिश तेज हो गई थी, अतः हमने हनुमान मंदिर में शरण ली। लगभग 15 मिनट बाद बारिश रूक गई तथा हम लोग नीचे उतर गए।



          नक्की झील में वाटर रॉलर(जोर्ब बॉल), वाटर बॉल जैसे रोमांचकारी खेल भी उपलब्ध हैं। बीते कल हमने सिर्फ बॉटिंग की थी। अतः आज हम वाटर रॉलर का आनंद लेने पहुँचे। वहाँ पर दोनों पिताओं ने अपने-अपने बच्चों को संभाला और हम दोनों सहेलियों ने वाटर रॉलर में जाने का निर्णय लिया। वाटर रॉलर एक तरह की जलक्रीड़ा है। इसमें प्लास्टिक का एक रॉलर होता है, जिसकी दीवारों को पम्प से हवा भरकर फुलाया जाता है। अंदर से यह खोखला होता है। दोनों तरफ हवा पार होने तथा अंदर आने-जाने के लिए स्थान होता है। इसमें दो या तीन लोग एकसाथ अंदर जा सकते हैं, फिर इस रॉलर को झील के पानी में उतार दिया जाता है। रॉलर का एक सिरा रस्सी से किनारे पर बँधा रहता है। पानी पर तैरते रॉलर के अंदर बैठकर या खड़े होकर उसे तेजी से लुढ़काने में बड़ा मजा आता है। ऐसा करते हुए बचपन में प्लास्टिक की टंकी के अंदर घुसकर उसे लुढ़काने वाले खेल से जुड़ी यादें ताजा हो गईं। कुल मिलाकर हमने वाटर रॉलर में बहुत मस्ती की। इसका शुल्क 200 रुपये प्रति व्यक्ति है तथा छोटे बच्चों को इसमें ले जाना वर्जित है।

          दोपहर के भोजन का समय हो गया था। पिछले दिन व सुबह फूड इन रेस्तरां के भोजन का स्वाद हमें काफी पसंद आया, अतः हमने किसी नए विकल्प की जगह वहीं दोपहर का भोजन लिया। इसके बाद निजी वाहन लेकर घूमने चल दिए। माउंट आबू में अर्बुदा देवी का मंदिर है, जो कि बहुत प्रसिद्ध है । यहाँ देवी के नौ अवतारों में से एक कात्यायनी देवी का मंदिर है। पौराणिक कथाओं के अनुसार जब पति का अपमान किए जाने पर अपने पिता से रूष्ट होकर हवन कुंड में कूदने से माता सती की मृत्यु हो गई थी और शिव जी अत्यधिक क्रोध में उनका शव कंधे पर लादकर कैलाश पर्वत ले जा रहे थे, तब शिव जी के क्रोध से होने वाले सृष्टि-विनाश को रोकने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती की मृत देह के 51 टुकड़े कर दिए थे। ये 51 टुकड़े जहाँ-जहाँ गिरे वहाँ शक्तिपीठ स्थापित हुईं। यहाँ पर माता सती के होंठ गिरे थे, अतः इसे अधर शक्तिपीठ के नाम से भी जाना जाता है।

          पहाड़ी के ऊपर मनोरम वातावरण में स्थित यह सफेद मंदिर बहुत ही सुंदर दिखाई पड़ता है। मंदिर तक जाने के लिए 365 सीढ़ियाँ चढ़कर जाना होता है। यह मंदिर रॉक-कट मंदिर निर्माण कला का उदाहरण है, क्योंकि इसका निर्माण ठोस चट्टानों को बहुत ही सुंदर तरीके से काटकर किया गया है। यहाँ बहुत सुंदर मूर्तियाँ स्थापित की गई हैं। मंदिर में दूधिया रंग के पानी का एक कुआ भी है, जिसे कामधेनु का रूप माना जाता है। मंदिर के पास ही माताजी की पादुका की भी पूजा होती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार यहीं पर माताजी ने राक्षसों के राजा बासकली को पैरों से दबाकर उसका संहार किया था। अतः यहाँ माताजी की पादुका स्थापित हैं। यहाँ काफी संख्या में भक्त दर्शन हेतु आते हैं, विशेष तौर पर नवरात्रों में यहाँ बहुत भीड़ रहती है। बादल हट जाने से अभी धूप बहुत तेज थी। अतः बच्चों के साथ सीढ़ियाँ चढ़ना संभव ना होने के कारण हमें नीचे से ही माताजी को प्रणाम करके संतोष करना पड़ा।

          इसके बाद हम ऋषि वशिष्ठ आश्रम दर्शन हेतु गए। जंगल के घुमावदार सुंदर मार्ग से होकर यहाँ पहुँचा जा सकता है। यह स्थान ऋषि वशिष्ठ की तपोस्थली रही है। कहा जाता है कि यहीं पर ऋषि वशिष्ठ ने भगवान राम को उनके भाईयों समेत ज्ञान दिया था। अतः हिंदुओं के लिए यह स्थान विशेष दर्जा रखता है। यहाँ पर लगभग 700 सीढ़ियाँ नीचे उतरकर भगवान शिव को समर्पित एक सुंदर छोटा मंदिर है। इसके अतिरिक्त भगवान राम, ऋषि वशिष्ठ की भी मूर्तियाँ स्थापित की गई हैं। यहाँ संगमरमर से निर्मित एक बैल के मुख से लगातार जल गिरता रहता है। इस बैल के मुख को भगवान शिव के वाहन नंदी का प्रतीक माना जाता है। इस समय यहाँ परिवार के साथ आए लोगों की बजाय समूह में घूमने आए युवकों की संख्या अधिक थी। वे लोग ऊपर ही अपने नाचने-गाने में व्यस्त थे। बरसात के कारण नीचे जाने वाली सीढ़ियाँ फिसलनभरी थीं तथा हमारे वाहनचालक ने बताया कि शाम का समय होने के कारण सुनसान रास्ते पर भालू आ जाने की भी संभावना रहती है। अतः हमने खतरा ना लेते हुए वापस लौटने का निर्णय लिया। परन्तु यदि आप साफ मौसम में दिन के समय आते हैं, तो नीचे जाकर इस आश्रम को जरूर देखें। यहाँ काफी संख्या में सैलानी आते हैं।

          माउंट आबू का यूनिवर्सल पीस हॉल भी काफी प्रसिद्ध है। इसे ऊँ शांति भवन या ब्रह्मकुमारी आश्रम के नाम से भी जाना जाता है। सफेद रंग के इस विशाल हॉल में लगभग 2000 लोगों के एक साथ बैठने की क्षमता है, परन्तु आश्चर्यजनक रूप से इतने बड़े हॉल में एक भी खंभा नहीं है, बावजूद इसके यह पूर्णतः सुरक्षित है। यहाँ जाने वाले व्यक्तियों को अनुयायियों द्वारा इसके बारे में तथा अध्यात्म के बारे में विस्तार से जानकारी दी जाती है। लोग बिना खंभे वाले इस भवन को देखने तथा मन की शांति व अध्यात्म के बारे में जानने हेतु यहाँ आते हैं।

          हमने ऊँ शांति भवन को बाहर से ही देखा। क्योंकि हमें उसी दिन वापस जयपुर के लिए निकलना था। रात्रि 10.00 बजे आबूरोड रेलवे स्टेशन से हमारी ट्रेन थी। हालांकि उस समय लगभग 5.00 ही बजे थे, परन्तु हम रास्ते में कुछ जगह झरनों पर भी रूकने वाले थे तथा अंधेरा होने के साथ माउंट आबू से आबूरोड जाने वाला रास्ता सुनसान होने लगता है। अतः जंगली जानवरों के भय तथा लूटपाट की आशंका के कारण वाहनचालक रात को आबूरोड जाना पसंद नहीं करते हैं। चलते समय नक्की झील के पास वाले बाजार में हम लोगों ने कॉफी पी और हमें वहाँ की कॉफी का स्वाद बहुत ही पसंद आया। इसके बाद हम आबूरोड के लिए निकल गए।

          रास्ते में एक मोड़ पर नीचे गहरी घाटी में बहते झरने का दृश्य मंत्रमुग्ध कर देने वाला था। हम थोड़ी देर वहाँ रूके। कुछ तस्वीरें ली तथा वापस चल दिए। इसके कुछ किमी आगे सड़क के बिल्कुल नजदीक छोटा मगर सुंदर झरना देख हम रूके बिना नहीं रह सके। पहाड़ों से बहकर आने वाला झरने का जल काफी शीतल तथा पारदर्शी था। हम थोड़ी देर वहाँ रूके, झरने की तस्वीरें ली तथा फिर वापस अपने रास्ते चल दिए।

                                            

          आबू रोड पहुँचकर हमने वाहनचालक को पूरे दिन का किराया 1500 रुपये चुकाया। रेलवे स्टेशन के पास ही एक रेस्तरां में हमने रात्रि का भोजन लिया। भोजन के बाद हम रेलवे स्टेशन पहुँचे। हमारी ट्रेन आने में लगभग 40 मिनट का समय बाकी था, अतः हम लोग प्रतीक्षालय में बैठकर ट्रेन का इंतजार करने लगे। नियत समय पर ट्रेन आयी तथा हम माउंट आबू की खूबसूरत यादें लिए अपने घर के लिए रवाना हो गए।

सोमवार, 19 अक्टूबर 2020

माउंट आबू की सैर (द्वितीय भाग)

माउंट आबू यात्रा  PART-2

 Mount Abu ,Rajasthan Tourism: Travel Guide Mount Abu 

 

सभी पाठकों को नमस्कार,

          हमारी माउंट आबू यात्रा के प्रथम दिवस के बारे में मैं yatrafiber के पिछले ब्लॉग में लिख चुकी हूँ, आगे की यात्रा के अनुभव मैं इस ब्लॉग द्वारा साझा कर रही हूँ....

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माउंट आबू यात्रा  PART-3

 

          अगले दिन यानि 19 सितम्बर, 2020 को सुबह 9 बजे हम घूमने के लिए बिल्कुल तैयार थे। सबसे पहले हम पास ही स्थित एक रेस्तरां में नाश्ता करने गए। यहाँ के खाने का स्वाद हमें और अधिक बेहतर लगा। नाश्ते के बाद हमने नक्की झील घूमने का निर्णय लिया। नक्की झील मात्र कुछ ही दूरी पर स्थित होने के कारण हम पैदल घूमते हुए वहाँ चले गए।

          नक्की झील के बारे में पौराणिक मान्यता है कि इसे देवताओं द्वारा राक्षसों से बचने के लिए अपने नाखूनों से खोदा गया था। प्रारंभ में इसे नख की झील ही कहा जाता था, समय के साथ इसका नाम बदलकर नक्की झील पड़ गया। नक्की झील के बारे में एक और कथा भी प्रचलित है। रसिया बालम नाम के एक गरीब व्यक्ति को यहाँ की राजकुमारी से प्रेम हो गया था। राजकुमारी भी उसे चाहती थी। राजा ने राजकुमारी से विवाह की शर्त रखी कि जो भी व्यक्ति एक रात में झील खोद देगा, उसी से राजकुमारी का विवाह किया जाएगा। रसिया बालम ने अपने प्रेम को पाने के लिए रातभर में नक्की झील खोद दी। परन्तु राजकुमारी की माता को गरीब रसिया बालम से नफरत थी। अतः उसने रसिया बालम के साथ धोखा किया व सुबह होने से पहले ही मुर्गे की बाँग लगा दी। रसिया बालम अपना प्रेम ना मिल पाने से बहुत दुखी हुआ और वहीं अपने प्राण त्याग दिए। रसिया बालम तथा राजकुमारी (कुंवारी कन्या) का मंदिर भी यहाँ स्थित है।

          चारों ओर ऊँची पर्वत श्रृंखलाओं से घिरी नक्की झील लगभग ढ़ाई किमी के दायरे में फैली हुई है। मीठे पानी की यह झील राजस्थान की सबसे ऊँची झील है। नक्की झील के चारों ओर पर्वत श्रृखलाएँ, पहाड़ों पर टॉड रॉक, नन रॉक जैसी चट्टानी आकृतियाँ, झील के बीच-बीच में उभरी चट्टानें व टापू, झील में तैरते सफेद जलीय पक्षी तथा पहाड़ों से झील में उतरते बादल विहंगम दृश्य उत्पन्न करते हैं। यहाँ सर्दियों के समय कई बार तापमान 0℃ से भी नीचे चला जाता है। ऐसे में नक्की झील का पानी पूरी तरह जम जाता है।

          नक्की झील में बॉटिंग करना बहुत ही रोमांचकारी है। यहाँ पैडल बॉट तथा शिकारा बॉट दोनों ही उपलब्ध हैं। सैलानी अपनी रूची के अनुसार कोई सी भी बॉटिंग कर सकते हैं। हमने पैडल बॉट को चुना। पैडल बॉट का शुल्क 200 रुपये प्रति व्यक्ति था तथा 30 मिनट का समय बॉटिंग के लिए दिया गया था। सबसे पहले हमने 'लाईफ जैकेट' पहनी, जिसका मूल्य 5 रुपये प्रति जैकेट था। बहुत से लोग लाईफ जैकेट पहनना पसंद नहीं करते हैं, परन्तु यदि किसी को तैरना नहीं आता है तो उसे यह अवश्य पहननी चाहिए। क्योंकि यदि दुर्भाग्यवश कोई दुर्घटना हो भी जाती है और नाव पलट जाती है तो यह लाईफ जैकेट व्यक्ति को डूबने से बचाती है। यही कारण है कि हमने स्वयं के साथ बच्चों के लिए भी लाईफ जैकेट ली। झील में बॉटिंग करते समय चारों ओर का नजारा इतना अच्छा लगता है कि समय कब बीत जाता है, पता भी नहीं चलता।

          झील के चारों तरफ रघुनाथ मंदिर, भारत माँ नमन स्मारक, गाँधी घाट तथा सुंदर फूलों वाले पौधों युक्त मार्ग स्थित है। झील के बीच में एक छोटा सा टापू स्थित है, जिसमें शिवलिंग स्थापित है। झील का पानी लगातार शिवलिंग का अभिषेक करता रहता है। यहाँ शिव परिवार भी स्थापित किया गया है। शिवलिंग के पास एक घंटी भी लगी हुई है। लोग बॉटिंग के साथ शिवलिंग के अभिषेक का भी लाभ पाते हैं। नक्की झील में उभरे एक छोटे से टापू पर फंव्वारा भी लगाया गया है। इस फंव्वारे से ऊँची जलधारा निकलती देख पर्यटकों का रोमांच और बढ़ जाता है।

          ओस भरी सुबह के उगते सूरज की किरणों से चमकते पानी वाली नक्की झील हो या दिन में बॉटिंग का आनंद लेते पर्यटकों से गुलजार नक्की झील, जलक्रीड़ाओं का लुत्फ उठाते सैलानियों की भीड़ से आबाद नक्की झील हो या रात को रंग-बिरंगी रोशनियों से घिरी शांत नक्की झील, इसका हर रूप देखने लायक है।

          नक्की झील के किनारे एक सुंदर बगीचा बना हुआ है। बगीचे में ऊँचे-घने वृक्षों के अलावा सजावटी पौधे भी लगाए गए हैं। बगीचे में लोगों के बैठने के लिए जगह-जगह बेंच बनी हुई हैं। इसके अलावा एक छतरी भी बनाई गई है, जिसमें लोग आराम करने के साथ फोटो खिंचवाते हुए भी दिख जाते हैं। हम भी थोड़ी देर वहीं आराम करने बैठ गए। इस बगीचे में बहुत से फोटोग्राफर भी उपलब्ध हैं, जिनसे झील के यादगार लम्हों को कैमरे में कैद करवाया जा सकता है। ये लगभग आधे-एक घंटे में फोटो का प्रिंट निकलवाकर दे देते हैं। इसका शुल्क 40-60 रुपये प्रति फोटो लिया जाता है। इसके अलावा पास ही स्थित दुकानों से किराये पर राजस्थानी वस्त्र लेकर उनमें भी फोटो खिंचवाई जा सकती है। इनका किराया 100-200 रुपये तक होता है। बगीचे में लकड़ी की तख्तियों पर रंगों से नाम लिखने वाले भी कई लोग मिल जाएँगे। लोग अपने घरों के लिए इनसे नाम की तख्तियाँ बनवाने के अलावा अपने प्रियजनों का नाम लिखवाकर उनके लिए उपहार के तौर पर भी इन तख्तियों को खरीदते हैं।

          बगीचे के एक कोने में बच्चों के लिए 'गेम जॉन' भी बना हुआ है। हम भी बच्चों के साथ वहाँ गए। वहाँ अलग-अलग तरह के कुछ झूले व खेल उपलब्ध हैं। दिनाया और काव्यांश वहाँ पहुँचते ही खुश हो गए और सभी झूलों के पास जाकर उनका मुआयना करने लगे। सभी खेलों के लिए अलग-अलग शुल्क निर्धारित है। बच्चों ने घोड़े पर बैठकर झूलने का आनंद लिया।

          

          नक्की झील के आसपास के क्षेत्र में काफी अच्छा बाजार भी स्थित है, जहाँ से लोग खरीददारी करना बहुत पसंद करते हैं। इस बाजार में विशेष तौर पर हस्तकला निर्मित सामग्री जैसे - वस्त्र, चादरें, पर्स, गहने, चप्पलें, खिलौने आदि मिलते हैं। हम लोगों ने भी यहाँ से हस्तकला निर्मित कुछ वस्त्र तथा चादरें खरीदीं। दोपहर हो गई थी और भूख भी लग रही थी, अतः पास ही एक रेस्तरां में जाकर हमने दोपहर का भोजन लिया। भोजन के पश्चात हमने एक निजी वाहन किया तथा घूमने निकल पड़े।

          सबसे पहले हम हनीमून पॉइंट देखने पहुँचे। हनीमून पॉइंट को अनादरा पॉइंट के नाम से भी जाना जाता है। वहाँ पहुँचते ही हमें आभास हो गया कि क्यों उस जगह का नाम हनीमून पॉइंट रखा गया है। पहाड़ के छोर पर खड़े होकर सामने दूर तक फैले हरे-भरे क्षेत्र की खूबसूरती, नीचे घाटी में बहते झरने से उत्पन्न कल-कल की ध्वनि, पक्षियों का कलरव, वृक्षों पर लंगूरों की उछल-कूद आदि सब दृश्य देखकर नवविवाहित जोड़ा तो क्या किसी भी व्यक्ति को यहाँ समय बीतने का अहसास ही नहीं होगा। यहाँ बैठकर ऐसा लगता है, मानो हम प्रकृति की गोद में ही आकर बैठ गए हों। शहरी जीवन की भागदौड़ भरी जिंदगी से कुछ समय निकालकर ऐसे शुद्ध प्राकृतिक वातावरण में आकर समय बिताना बहुत सुकूनभरा होता है। प्रकृति के करीब आकर सारा तनाव दूर हो जाता है तथा सकारात्मक ऊर्जा मिलती है। इसके पास ही एक थोड़ा ऊँचा पॉइंट और भी है, वहाँ से भी प्रकृति की सुंदर चित्रकारी को निहारा जा सकता है।


                                           

          

          इसके बाद हम माउंट आबू वन्यजीव अभयारण्य देखने पहुँचे। सन् 1960 में इसे अभयारण्य घोषित किया गया था। इस घने वन्यक्षेत्र में पेड़-पौधों की बहुत सी दुर्लभ प्रजातियाँ पाई जाती हैं। यह क्षेत्र भालुओं के लिए काफी अनुकूल है। यही कारण है कि यहाँ भालुओं की संख्या काफी अधिक है। माउंट आबू में आबादी क्षेत्र में भालुओं के आ जाने की घटनाएँ भी कई बार अखबार में छपती रहती हैं। भालू के अतिरिक्त सियार, जरख, लोमड़ी, सांभर, नीलगाय, चीतल, लंगूर, जंगली बिल्ली, तेंदुआ, जंगली सुअर आदि जंगली जानवर भी यहाँ बहुतायत में पाए जाते हैं। अभयारण्य में जीव-जंतुओं को किसी भी प्रकार की खाद्य सामग्री डालने पर पूर्णतः रोक है। इसके अतिरिक्त अभयारण्य में प्लास्टिक ले जाने पर भी रोक है। इस अभयारण्य में पक्षियों की भी बहुत सारी दुर्लभ प्रजातियाँ देखी जा सकती हैं। घने जंगल में इस तरह खुले घूमते वन्य जीवों को करीब से देखना काफी रोमांचित कर देने वाला अनुभव है।


          वहीं पर हम ट्रेवर्स टैंक देखने गए। ट्रेवर्स टैंक देखने के लिए टिकट का मूल्य 55 रुपये प्रति व्यक्ति है। इसके अलावा वाहन का शुल्क 210 रुपये था। पहाड़ों के बीच में बनाए गए इस खूबसूरत कृत्रिम तालाब का नाम ट्रेवर नाम के अभियंता(इंजीनियर) के नाम पर रखा गया है। यहाँ मगरमच्छ प्रजनन के उद्देश्य से मगरमच्छ का जोड़ा छोड़ा गया था, अब यहाँ मगरमच्छ के बच्चे भी देखे जा सकते हैं। तालाब के पास से एक पदमार्ग बनाया गया है। यहीं से कुछ दूरी पर उबड़-खाबड़ मार्ग से ऊपर जाकर वॉच टावर का अनुभव लिया जा सकता है। ऊपर एक छतरी भी लगाई गई है। ऊँचाई पर खड़े होकर चारों तरफ के मनोरम प्राकृतिक दृश्यों को निहारा जा सकता है। ऊपर खड़े होकर नीचे तालाब में तैरते मगरमच्छों को देखना भी एक अनोखा अनुभव है। कुछ समय ऊपर बीताकर हम नीचे आ गए। शाम होने वाली थी। माउंट आबू से दिखाई देने वाला सूर्यास्त का खूबसूरत नजारा विश्वप्रसिद्ध है। अतः हम लोग 'सनसेट पॉइंट' के लिए निकल गए।



          सनसेट पॉइंट से लगभग 1 किमी पहले ही वाहनों को रोक दिया जाता है। वहाँ से आगे या तो पैदल जा सकते हैं, या फिर घोड़े पर बैठकर भी जा सकते हैं। घोड़े का शुल्क 100 रुपये प्रति व्यक्ति है। इसके अतिरिक्त हाथगाड़ी भी उपलब्ध हैं। एक छोटी सी गाड़ी में दो लोगों के बैठने की जगह होती है, इसे वे लोग हाथों से धक्का देकर चलाते हैं। हाथगाड़ी का शुल्क भी 100 रुपये प्रति व्यक्ति है। हमने घोड़े का विकल्प चुना। बच्चे तो घोड़े पर बैठते ही खुश हो गए। दिनाया घोड़े पर बैठकर तालियाँ बजाते हुए कहने लगी, "दिनाया का घोड़ा टिक टिक टिक" तो काव्यांश पूरे रास्ते "लकड़ी की काठी, काठी पर घोड़ा" गाता रहा। मंजिल पर पहुँचकर भी दोनों बच्चे घोड़े से उतरना ही नहीं चाहते थे। उनकी इन बालसुलभ क्रीड़ाओं को देखकर हम लोग हँसे बिना नहीं रह पाए। खैर मुश्किल से उन्हें नीचे उतारा और एक ऐसी जगह जाकर हम बैठ गए, जहाँ से सूर्यास्त का नजारा अच्छी तरह से देखा जा सके।

          सूर्यास्त होने में कुछ समय बाकी था, अतः काफी लोग वहाँ बैठकर इंतजार कर रहे थे। सनसेट पॉइंट पर भी बहुत से फोटोग्राफर मिल जाएँगें, जिनसे सूर्यास्त के साथ फोटो खिंचवाई जा सकती है। चाय की चुस्कियों के बीच यह कयास लगाया जा रहा था कि मानसून के कारण छाए बादलों के बीच सूर्यास्त दिखेगा भी या नहीं। बादलों की स्थिति देखकर तो यही लग रहा था कि सूर्यास्त नहीं दिखने वाला, परन्तु उम्मीद पर दुनिया कायम है, शायद यही सोचते हुए सभी लोग वहाँ डेरा जमाए हुए थे। धीरे-धीरे साँझ ढ़ल रही थी और ढ़लती साँझ के साथ सूर्यास्त ना दिखने के आसार देख लोगों की भीड़ भी कम होती जा रही थी। खैर इतने इंतजार के बाद महज एक-दो मिनट के लिए ही सही, सूर्यदेव ने दर्शन दिए। डूबते सूरज को देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो बड़ा सा लाल गोला आसमान से उतरकर धरती की गोद में समा रहा है।

          सूर्यास्त होते ही अंधकार गहरा होना प्रारंभ हो गया। अतः हम लोग वापस लौट पड़े। वापस आते समय हम महिलाएँ बच्चों सहित हाथगाड़ी में बैठीं तथा वे दोनों मित्र पैदल घूमते हुए गाड़ी तक पहुँचे। गाड़ी से हम लोग वापस होटल पहुँचे। हमने वाहन चालक को पूरे दिन का किराया 1200 रुपये चुकाया। कुछ देर विश्राम करने के बाद रेस्तरां में जाकर रात्रि का भोजन लिया तथा फिर कुछ देर पास ही स्थित बाजार में टहलने के बाद अपने-अपने कमरों में जाकर सो गये।

                                                                                                                    क्रमशः..................................