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रविवार, 11 अक्टूबर 2020

माउंट आबू की सैर (प्रथम भाग)

माउंट आबू यात्रा  PART-1

 

Mount Abu ,Rajasthan Tourism: Travel Guide Mount Abu

सभी पाठकों को नमस्कार,

          'माउंट आबू' राजस्थान का एकमात्र 'हिल स्टेशन', जिसका नाम सुनते ही लोग राजस्थान की मरूस्थली छवि से इतर हरियाली से भरपूर पहाड़ों से घिरे ठंडे वातावरण वाले पर्यटन स्थल की कल्पना करने लगते हैं। कुछ दिन पूर्व ही हमारा माउंट आबू भ्रमण पर जाना हुआ और आज yatrafiber पर मैं उसी के अनुभव आपसे बाँट रही हूँ। 

 

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          राजस्थान के सिरोही जिले में स्थित माउंट आबू राजस्थान का एकमात्र ऐसा पहाड़ी नगर है, जहाँ राजस्थान की गर्म जलवायु का असर नजर नहीं आता, अपितु यहाँ का मनोरम वातावरण इसे बाकी राजस्थान से अलग बनाता है। 16 सितम्बर, 2020 को बातों-बातों में अकस्मात् ही हमारी माउंट आबू भ्रमण की योजना बन गई। मेरे पति के एक मित्र भी काफी दिन से सपरिवार माउंट आबू जाने के इच्छुक थे। जब उनसे इस विषय में बात की गई तो वे भी तुरन्त राजी हो गये। मैं, मेरे पति, हमारी दो वर्षीय पुत्री दिनाया, पति के मित्र, उनकी पत्नी उनका दो वर्षीय पुत्र काव्यांश, कुल मिलाकर हम 6 लोग माउंट आबू भ्रमण पर जाने वाले थे। जयपुर से आबू रोड तक जाने के लिए हमने रेलमार्ग को चुना तथा 18 सितम्बर, 2020 के लिए राजधानी एक्सप्रेस में आरक्षण करवा दिया।

          वायुमार्ग से माउंट आबू जाने के लिए नजदीकी हवाईअड्डा उदयपुर है, जो कि माउंट आबू से लगभग 185 किमी दूर स्थित है। उदयपुर से माउंट आबू के लिए सीधी बस उपलब्ध हैं, अन्यथा निजी वाहन भी किया जा सकता है। रेलमार्ग से माउंट आबू जाने के लिए आबू रोड नजदीकी रेलवे स्टेशन है, जो कि माउंट आबू से लगभग 27 किमी की दूरी पर स्थित है। आबू रोड से बस द्वारा या निजी वाहन करके माउंट आबू पहुँचा जा सकता है। जयपुर, उदयपुर जैसे शहरों से माउंट आबू सीधी बस सेवा द्वारा भी जुड़ा हुआ है।

          18 सितम्बर, 2020 को रात्रि 1.00 बजे हमारी ट्रेन की रवानगी का समय था। अतः 17 सितम्बर, 2020 को रात्रि 11.30 बजे हमने कैब बुक की तथा रास्ते में मित्र परिवार को लेते हुए लगभग घंटेभर की यात्रा के पश्चात रात्रि 12.30 बजे हम जयपुर जंक्शन रेलवे स्टेशन पहुँचे। नियत समय पर ट्रेन आई तथा हमने टी.टी. महोदय को टिकट दिखाकर अपनी-अपनी सीट ले ली। ट्रेन सुबह 6.15 बजे आबू रोड रेलवे स्टेशन पहुँचने वाली थी। अतः हमने अलार्म लगाया तथा नींद की आगोश में चले गये।

          ट्रेन बिल्कुल नियत समय पर आबू रोड रेलवे स्टेशन पहुँची। आबू रोड रेलवे स्टेशन के बाहर बहुत से निजी वाहन उपलब्ध रहते हैं, जिनके द्वारा माउंट आबू जाया जा सकता है। हमने भी एक निजी वाहन किया, जिसका किराया 900 रुपये था। आबू रोड से बाहर निकलते ही ऊँचे-ऊँचे पहाड़ दिखना प्रारंभ हो जाते हैं। हरे-भरे घने जंगल युक्त पहाड़ों पर घुमावदार सड़क, इस सड़क के एक ओर ऊँचे पहाड़ तथा दूसरी ओर गहरी घाटी थी। गाड़ी की खिड़की से आने वाली ठंडी हवा मन को सुकून पहुँचा रही थी। यहाँ रास्ते में लंगूरों के झुंड के झुंड देखे जा सकते हैं, जिन्हें किसी भी प्रकार की खाद्य सामग्री डालने पर सख्त मनाही है। दिनाया तो शीतल हवा का आनंद लेते हुए सो चुकी थी, परंतु काव्यांश लंगूरों को देखकर बहुत खुश हो रहा था। गहरी घाटियाँ, पहाड़ों की ऊँची चोटियाँ, चारों ओर फैली हरियाली, घुमावदार सड़क, बीच-बीच में आते छोटे-छोटे कई झरने, पहाड़ों पर लहराते-इठलाते रूई के फाहों से प्रतीत होते बादल, सब कुछ मिलाकर एक बहुत सुंदर तस्वीर से मालूम हो रहे थे। लगभग एक घंटे के सुहावने सफर के बाद हम माउंट आबू पहुँचे।

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          माउंट आबू में हम नक्की झील के पास ही एक होटल में रूके। कमरों का किराया 2500 रुपये प्रति दिन था। दोनों कमरे छत पर बने हुए थे, जहाँ से सामने फैली हुई नक्की झील का शानदार नजारा दिखाई देता था। होटल के कमरे काफी सुविधाजनक थे। बाथरूम में सुबह दो घंटे के लिए गरम जल की भी व्यवस्था थी। हमने सामान अपने-अपने कमरे में रखा और नहा-धोकर तैयार हो गए।

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          नक्की झील के आस-पास के क्षेत्र में, पोलो मैदान के चारों तरफ बहुत से होटल स्थित हैं, जहाँ पर्यटक अपनी सुविधानुसार रूक सकते हैं, इनमें सस्ते से लेकर महँगे (5 - सितारा) होटल तक सभी उपलब्ध हैं। माउंट आबू में कई धर्मशालाएँ  भी उपलब्ध हैं। इसके अलावा वहाँ गुरूद्वारा, जैन धर्मशाला भी स्थित हैं, जहाँ रूका जा सकता है। साथ ही साथ वहाँ के बहुत से निवासी होटल की बजाय काफी सस्ती दर में अपने घर में सैलानियों को रहने की सुविधा देते हैं।

          होटल के बाहर कई रेस्तरां मौजूद हैं, जहाँ नाश्ते व भोजन का आनंद लिया जा सकता है। हमने भी पास ही स्थित एक रेस्तरां में नाश्ता किया। यहाँ के रेस्तरां में उत्तर भारतीय, दक्षिण भारतीय, पंजाबी, राजस्थानी विशेष ( दाल, बाटी, चूरमा) तथा गुजराती सभी प्रकार का नाश्ता व भोजन उपलब्ध है। गुजराती थाली तो विशेष तौर पर सभी रेस्तरां में मिलेगी, क्योंकि यहाँ आने वाले सैलानियों में गुजराती लोगों की संख्या काफी अधिक होती है।

          माउंट आबू घूमने के लिए रोडवेज बस उपलब्ध है, जो कि पूरे दिन में सैलानियों को माउंट आबू के सभी मुख्य पर्यटन बिंदु दिखाती है। कुछ होटल तथा निजी बसों वाले भी इस तरह की सुविधा देते हैं। इसके अलावा अगर कोई दुपहिया वाहन पसंद करता है तो माउंट आबू में दुपहिया वाहन किराये पर उपलब्ध हैं। इनका किराया जब पर्यटन अच्छा चल रहा हो, तब कुछ अधिक तथा जब पर्यटन कम चल रहा हो तब कम होता है। कुल मिलाकर यह किराया 300 से 1000 रुपये के बीच होता है। पेट्रोल का खर्चा किराए पर वाहन लेने वाले व्यक्ति का स्वयं का होता है। अगर कोई निजी वाहन चाहता है, तो वो भी यहाँ उपलब्ध हैं। गाड़ी का किराया इस बात पर निर्भर करता है कि पर्यटक कौन-कौन से पर्यटन बिंदुओं पर जाना चाहते हैं। एक तो मानसून के कारण कभी भी बारिश आने की संभावना और दूसरा हमारे साथ छोटे बच्चे भी थे, अतः हमने निजी वाहन करके घूमने का निर्णय लिया।

          माउंट आबू धार्मिक दृष्टि से जैन धर्म के लिए विशेष स्थान रखता है। यहाँ 11वीं से 13वीं सदी में निर्मित देलवाड़ा के जैन मंदिर स्थित हैं, जो कि मंदिर निर्माण कला का अद्भुत रूप पेश करते हैं। देलवाड़ा मंदिर वास्तव में 5 मंदिरों का समूह है। इनमें से सबसे प्राचीन 'विमल वसाही मंदिर' है, जो कि जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ को समर्पित है। इस मंदिर में भगवान आदिनाथ की आँखें असली हीरे की बनी हुई हैं। इस मंदिर का निर्माण पूर्ण रूप से सफेद संगमरमर को तराशकर किया गया है। इसके अतिरिक्त यहाँ लूना वसाही मंदिर, पित्तलहार मंदिर, श्री पार्श्वनाथ मंदिर, श्री महावीर स्वामी मंदिर आदि मंदिर स्थित हैं। इन मंदिरों में हिंदू देवी-देवताओं की भी प्रतिमाएँ उकेरी गई हैं। संगमरमर को बहुत बारीकी से तराशकर इतनी सुंदर कलाकारी की गयी है कि देखने वाले लोग आश्चर्यचकित रह जाते हैं। हॉल, गर्भगृह, मूर्तियाँ, मंडप, खंंभे सभी शिल्पकला का उत्तम रूप प्रस्तुत करते हैं। बाहर से सादगी युक्त तथा अंदर से विशेष कलाकारी वाले ये मंदिर कोरोना महामारी के कारण अभी बंद थे, अतः हमें बाहर से ही दर्शन करके संतोष करना पड़ा।

          देलवाड़ा के जैन मंदिरों के पश्चात हम राजस्थान तथा अरावली पर्वतमाला की सबसे ऊँची चोटी गुरुशिखर को देखने निकल पड़े। माउंट आबू से गुरुशिखर की दूरी लगभग 15 किमी है। माउंट आबू में एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने वाले सभी मार्ग बहुत सारे मोड़ लिए हुए तथा हरे-भरे वृक्षों से युक्त इतने सुंदर हैं कि पता ही नहीं चलता कब सफर पूरा होकर मंजिल आ जाती है। गुरुशिखर की ओर जाते हुए रास्ते में तेज बारिश शुरू हो गई, जिसने मार्ग को और भी रोमांचकारी बना दिया। गुरुशिखर पहुँचने के बाद भी बारिश का होना जारी रहा। अतः हमने कुछ देर गाड़ी में ही बैठे रहने का निर्णय लिया। गाड़ी में बैठे-बैठे हमने साथ लायी गयी मिठाई, नमकीन, मूँगफली वगैरह का नाश्ता किया। वैसे यहाँ कुछ छोटी-छोटी दुकानें भी स्थित हैं, जहाँ चाय-नाश्ता किया जा सकता है।

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          गुरुशिखर की ऊँचाई 1722 मीटर है। यहाँ पर भगवान विष्णु के रूप गुरू दत्तात्रेय का गुफा मंदिर स्थित है। मंदिर में दर्शन करने हेतु सीढ़ियों द्वारा कुछ दूर पैदल चलना पड़ता है। बारिश के कारण वहाँ कुछ लोग किराये पर छतरी भी उपलब्ध करा रहे थे। कुछ ही मिनटों में बारिश पूरी तरह रूक गई और हमने सीढ़ियाँ चढ़ना प्रारंभ किया। सीढ़ियों के किनारे भी कुछ खाने-पीने की व हस्त निर्माण सामग्री की दुकानें थीं। यहाँ की मैगी काफी प्रसिद्ध है, जो कि चाय-नाश्ते की हर दुकान पर उपलब्ध है। ऊपर पहुँचकर हमने मंदिर में दर्शन किए। ऊँची चोटी पर शांत व सुरम्य वातावरण में स्थित यह मंदिर अंदर से संगमरमर से निर्मित है। मंदिर से चोटी के सबसे ऊँचे भाग पर पहुँचने के लिए भी सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। सबसे ऊँचे स्थान पर भी एक छोटा सा मंदिर बना हुआ है। यहाँ पीतल का बड़ा सा घंटा भी लगा हुआ है, जो यहाँ आने वाले पर्यटकों के लिए आकर्षण का मुख्य केन्द्र है। लोग इस घंटे के पास खड़े होकर फोटो खिंचवाना बेहद पसंद करते हैं। अरावली की सबसे ऊँची चोटी पर खड़े होकर माउंट आबू की खूबसूरती को निहारना बहुत शानदार अनुभव है। मौसम के बदलते रूपों को यहाँ भली प्रकार अनुभव किया जा सकता है। एक पल धूप खिली रहेगी तो अगले ही पल आसमान में बादल छा जाएँगे। कभी बादलों का समूह आपको छूकर निकल जाएगा तो कभी चारों ओर छाई धुंध में आसपास का क्षेत्र भी स्पष्ट दिखाई देना बंद हो जाएगा। आधे घंटे का समय वहाँ बिताकर हम वापस आ गये।




          गुरुशिखर से वापस आते समय हम 'शूटिंग पॉइंट' पर रूके। यहाँ से आसपास के पहाड़ों व घाटियों का बहुत सुंदर नजारा दिखाई देता है। यही कारण है कि यहाँ बहुत सी फिल्मों की शूटिंग की गई है और इसी कारण इसका नाम शूटिंग पॉइंट पड़ा है। काफी लोग शूटिंग पॉइंट पर प्राकृतिक नजारों के बीच अपनी तस्वीरें लेने में व्यस्त थे। हमने भी बहुत सी तस्वीरें लीं तथा कुछ देर वहीं बैठकर शांत व सुंदर प्रकृति का आनंद लिया। शाम हो गई थी और सूर्यदेव अस्त होने को थे। यहाँ हमें डूबते सूर्य का खूबसूरत नजारा देखने का मौका मिला। बादलों के बीच टँगे लाल-नारंगी सूरज की किरणों से सिंदूरी होती शाम का यह सुंदर दृश्य इतना मनमोहक होता है कि जब तक सूर्य पूर्णतः अस्त होकर अंधकार ना फैलने लगे, तब तक यहाँ से उठने की चाहत बिलकुल नहीं होती है।




          सूर्यास्त के बाद हम शूटिंग पॉइंट से अचलगढ़ पहुँचे। अचलगढ़ गाँव में अचलगढ़ का किला स्थित है, जो कि वर्तमान में खंडहर सा हो गया है। हम किले में नहीं गए। अचलगढ़ गाँव में ही अचलेश्वर महादेव का बहुत प्राचीन मंदिर स्थित है। मंदिर के द्वार पर दोनों ओर गज-प्रतिमाएँ लगी हुई हैं। शिव मंदिरों में मुख्यतः शिवलिंग स्थापित होता है, परन्तु इस मंदिर में शिवजी के अंगूठे के निशान की पूजा होती है। कहा जाता है कि जब यहाँ की भूमि डोल रही थी, तब लोगों की पुकार पर शिवजी ने यहाँ अपने पैर का अंगूठा रखकर भूमि को स्थिर किया था। अंगूठे के उसी चिह्न की पूजा यहाँ की जाती है। यहाँ शिव परिवार को भी स्थापित किया गया है। मंदिर में शिवजी के प्रिय वाहन नंदी की पीतल की बड़ी सी मूर्ति भी स्थापित की गयी है। इतने प्राचीन मंदिर की दीवारों व खंभों पर पत्थरों को तराशकर उकेरी गई आकृतियों को देखकर आश्चर्य होता है कि कैसे उस समय इतना अद्भुत शिल्पकार्य किया गया होगा, जो कि आज भी असंभव सा प्रतीत होता है। मंदिर के बाहर एक छोटा सा बाजार भी है, जहाँ हस्तकला द्वारा निर्मित सामग्री के अलावा अन्य कई वस्तुएँ भी उपलब्ध हैं।

          अचलेश्वर महादेव जी के दर्शन करने के पश्चात हम होटल वापस आ गए। हमने गाड़ी के पूरे दिन के किराए के रूप में 1000 रुपये का भुगतान किया। रात्रि के 8.30 बज रहे थे, अतः सुबह वाले रेस्तरां में ही हमने रात्रि का भोजन लिया। दिनभर घूमने-फिरने से थकान हो रही थी, अतः हम लोग सोने चले गए।

                                                                                                                           क्रमशः.........................

16 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छा लिखा। देखना,महसूस करना और और उसे शब्दों में अभिव्यक्ति देना । वाकई काबिले तारीफ है। अद्भुत प्रतिभा है।

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