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मंगलवार, 27 अक्टूबर 2020

माउंट आबू की सैर (तृतीय व अंतिम भाग)

माउंट आबू यात्रा  PART-3

Mount Abu ,Rajasthan Tourism: Travel Guide Mount Abu

सभी पाठकों को नमस्कार,

          हमारी माउंट आबू यात्रा के प्रथम दिवस व द्वितीय दिवस के बारे में मैं yatrafiber के पिछले ब्लॉग्स में लिख चुकी हूँ, आगे की यात्रा के अनुभव मैं इस ब्लॉग द्वारा साझा कर रही हूँ....

          अगले दिन यानि 20 सितम्बर, 2020 को सुबह वही 9 बजे तक हम तैयार हो गए तथा नाश्ता करके टॉड रॉक घूमने चल दिए। नक्की झील के पास से एक रास्ता है, जिसपर कुछ दूरी तय करने के बाद टॉड रॉक के लिए सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। सीढ़ियाँ चढ़ते समय आस-पास के क्षेत्र का सुंदर नजारा दिखाई देता है। बीच में हनुमान जी का एक छोटा सा मंदिर भी स्थित है। मंदिर से थोड़ा और आगे चढ़ने के पश्चात सीढ़ियों के स्थान पर पहाड़ी उबड़-खाबड़ रास्ता है, जिसपर चढ़ाई करते समय माउंटेन ट्रेकिंग का एहसास होता है।

माउंट आबू यात्रा  PART-1

माउंट आबू यात्रा  PART-2

 

 

          सबसे ऊपर जाकर टॉड रॉक स्थित है, जो कि एक बड़े मेंढ़क के आकार की चट्टान है। इस चट्टान को देखकर ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि एक बड़ा मेंढ़क पहाड़ के किनारे बैठकर नीचे स्थित नक्की झील में छलांग लगाने वाला है। बच्चों के साथ चढ़ाई कर हम थक चुके थे, अतः कुछ देर टॉड रॉक के पास ही छाया में बैठकर विश्राम किया। ऊपर एक छोटी सी दुकान भी है, जिसपर पानी, नींबू पानी, चिप्स, कुरकुरे, नमकीन, बिस्किट जैसी चीजें उपलब्ध हैं। हमने भी नींबू पानी का आनंद लिया। बहुत सारे लोग टॉड रॉक के साथ फोटो खिंचवाने में मग्न थे। कुछ देर विश्राम के बाद हम भी इधर-उधर टहलने लगे। इतनी ऊँचाई से नक्की झील की खूबसूरती देखने लायक थी। चट्टान का विचित्र आकार, ऊँचाई से दिखती नक्की झील, चारों तरफ पहाड़ों की हरी-भरी श्रृंखलाएँ तथा उनपर उतरते-चढ़ते बादलों के समूह, प्रकृति की इस सुंदर चित्रकारी के आकर्षण में बँधकर सैलानी यहाँ घंटों बैठना पसंद करते हैं। हमने भी टॉड रॉक के साथ-साथ चारों तरफ के सुंदर दृश्यों की बहुत सी तस्वीरें लीं तथा तकरीबन दो घंटे का समय वहाँ बीताने के बाद नीचे उतरना शुरू किया। उतरना प्रारंभ करते ही बूँदाबाँदी शुरू हो गई, परन्तु मार्ग के किनारे स्थित घने-ऊँचे वृक्षों के कारण मुश्किल से ही कुछ बूँदें हम तक पहुँच पा रही थीं। थोड़ा नीचे आने के बाद बारिश तेज हो गई थी, अतः हमने हनुमान मंदिर में शरण ली। लगभग 15 मिनट बाद बारिश रूक गई तथा हम लोग नीचे उतर गए।



          नक्की झील में वाटर रॉलर(जोर्ब बॉल), वाटर बॉल जैसे रोमांचकारी खेल भी उपलब्ध हैं। बीते कल हमने सिर्फ बॉटिंग की थी। अतः आज हम वाटर रॉलर का आनंद लेने पहुँचे। वहाँ पर दोनों पिताओं ने अपने-अपने बच्चों को संभाला और हम दोनों सहेलियों ने वाटर रॉलर में जाने का निर्णय लिया। वाटर रॉलर एक तरह की जलक्रीड़ा है। इसमें प्लास्टिक का एक रॉलर होता है, जिसकी दीवारों को पम्प से हवा भरकर फुलाया जाता है। अंदर से यह खोखला होता है। दोनों तरफ हवा पार होने तथा अंदर आने-जाने के लिए स्थान होता है। इसमें दो या तीन लोग एकसाथ अंदर जा सकते हैं, फिर इस रॉलर को झील के पानी में उतार दिया जाता है। रॉलर का एक सिरा रस्सी से किनारे पर बँधा रहता है। पानी पर तैरते रॉलर के अंदर बैठकर या खड़े होकर उसे तेजी से लुढ़काने में बड़ा मजा आता है। ऐसा करते हुए बचपन में प्लास्टिक की टंकी के अंदर घुसकर उसे लुढ़काने वाले खेल से जुड़ी यादें ताजा हो गईं। कुल मिलाकर हमने वाटर रॉलर में बहुत मस्ती की। इसका शुल्क 200 रुपये प्रति व्यक्ति है तथा छोटे बच्चों को इसमें ले जाना वर्जित है।

          दोपहर के भोजन का समय हो गया था। पिछले दिन व सुबह फूड इन रेस्तरां के भोजन का स्वाद हमें काफी पसंद आया, अतः हमने किसी नए विकल्प की जगह वहीं दोपहर का भोजन लिया। इसके बाद निजी वाहन लेकर घूमने चल दिए। माउंट आबू में अर्बुदा देवी का मंदिर है, जो कि बहुत प्रसिद्ध है । यहाँ देवी के नौ अवतारों में से एक कात्यायनी देवी का मंदिर है। पौराणिक कथाओं के अनुसार जब पति का अपमान किए जाने पर अपने पिता से रूष्ट होकर हवन कुंड में कूदने से माता सती की मृत्यु हो गई थी और शिव जी अत्यधिक क्रोध में उनका शव कंधे पर लादकर कैलाश पर्वत ले जा रहे थे, तब शिव जी के क्रोध से होने वाले सृष्टि-विनाश को रोकने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती की मृत देह के 51 टुकड़े कर दिए थे। ये 51 टुकड़े जहाँ-जहाँ गिरे वहाँ शक्तिपीठ स्थापित हुईं। यहाँ पर माता सती के होंठ गिरे थे, अतः इसे अधर शक्तिपीठ के नाम से भी जाना जाता है।

          पहाड़ी के ऊपर मनोरम वातावरण में स्थित यह सफेद मंदिर बहुत ही सुंदर दिखाई पड़ता है। मंदिर तक जाने के लिए 365 सीढ़ियाँ चढ़कर जाना होता है। यह मंदिर रॉक-कट मंदिर निर्माण कला का उदाहरण है, क्योंकि इसका निर्माण ठोस चट्टानों को बहुत ही सुंदर तरीके से काटकर किया गया है। यहाँ बहुत सुंदर मूर्तियाँ स्थापित की गई हैं। मंदिर में दूधिया रंग के पानी का एक कुआ भी है, जिसे कामधेनु का रूप माना जाता है। मंदिर के पास ही माताजी की पादुका की भी पूजा होती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार यहीं पर माताजी ने राक्षसों के राजा बासकली को पैरों से दबाकर उसका संहार किया था। अतः यहाँ माताजी की पादुका स्थापित हैं। यहाँ काफी संख्या में भक्त दर्शन हेतु आते हैं, विशेष तौर पर नवरात्रों में यहाँ बहुत भीड़ रहती है। बादल हट जाने से अभी धूप बहुत तेज थी। अतः बच्चों के साथ सीढ़ियाँ चढ़ना संभव ना होने के कारण हमें नीचे से ही माताजी को प्रणाम करके संतोष करना पड़ा।

          इसके बाद हम ऋषि वशिष्ठ आश्रम दर्शन हेतु गए। जंगल के घुमावदार सुंदर मार्ग से होकर यहाँ पहुँचा जा सकता है। यह स्थान ऋषि वशिष्ठ की तपोस्थली रही है। कहा जाता है कि यहीं पर ऋषि वशिष्ठ ने भगवान राम को उनके भाईयों समेत ज्ञान दिया था। अतः हिंदुओं के लिए यह स्थान विशेष दर्जा रखता है। यहाँ पर लगभग 700 सीढ़ियाँ नीचे उतरकर भगवान शिव को समर्पित एक सुंदर छोटा मंदिर है। इसके अतिरिक्त भगवान राम, ऋषि वशिष्ठ की भी मूर्तियाँ स्थापित की गई हैं। यहाँ संगमरमर से निर्मित एक बैल के मुख से लगातार जल गिरता रहता है। इस बैल के मुख को भगवान शिव के वाहन नंदी का प्रतीक माना जाता है। इस समय यहाँ परिवार के साथ आए लोगों की बजाय समूह में घूमने आए युवकों की संख्या अधिक थी। वे लोग ऊपर ही अपने नाचने-गाने में व्यस्त थे। बरसात के कारण नीचे जाने वाली सीढ़ियाँ फिसलनभरी थीं तथा हमारे वाहनचालक ने बताया कि शाम का समय होने के कारण सुनसान रास्ते पर भालू आ जाने की भी संभावना रहती है। अतः हमने खतरा ना लेते हुए वापस लौटने का निर्णय लिया। परन्तु यदि आप साफ मौसम में दिन के समय आते हैं, तो नीचे जाकर इस आश्रम को जरूर देखें। यहाँ काफी संख्या में सैलानी आते हैं।

          माउंट आबू का यूनिवर्सल पीस हॉल भी काफी प्रसिद्ध है। इसे ऊँ शांति भवन या ब्रह्मकुमारी आश्रम के नाम से भी जाना जाता है। सफेद रंग के इस विशाल हॉल में लगभग 2000 लोगों के एक साथ बैठने की क्षमता है, परन्तु आश्चर्यजनक रूप से इतने बड़े हॉल में एक भी खंभा नहीं है, बावजूद इसके यह पूर्णतः सुरक्षित है। यहाँ जाने वाले व्यक्तियों को अनुयायियों द्वारा इसके बारे में तथा अध्यात्म के बारे में विस्तार से जानकारी दी जाती है। लोग बिना खंभे वाले इस भवन को देखने तथा मन की शांति व अध्यात्म के बारे में जानने हेतु यहाँ आते हैं।

          हमने ऊँ शांति भवन को बाहर से ही देखा। क्योंकि हमें उसी दिन वापस जयपुर के लिए निकलना था। रात्रि 10.00 बजे आबूरोड रेलवे स्टेशन से हमारी ट्रेन थी। हालांकि उस समय लगभग 5.00 ही बजे थे, परन्तु हम रास्ते में कुछ जगह झरनों पर भी रूकने वाले थे तथा अंधेरा होने के साथ माउंट आबू से आबूरोड जाने वाला रास्ता सुनसान होने लगता है। अतः जंगली जानवरों के भय तथा लूटपाट की आशंका के कारण वाहनचालक रात को आबूरोड जाना पसंद नहीं करते हैं। चलते समय नक्की झील के पास वाले बाजार में हम लोगों ने कॉफी पी और हमें वहाँ की कॉफी का स्वाद बहुत ही पसंद आया। इसके बाद हम आबूरोड के लिए निकल गए।

          रास्ते में एक मोड़ पर नीचे गहरी घाटी में बहते झरने का दृश्य मंत्रमुग्ध कर देने वाला था। हम थोड़ी देर वहाँ रूके। कुछ तस्वीरें ली तथा वापस चल दिए। इसके कुछ किमी आगे सड़क के बिल्कुल नजदीक छोटा मगर सुंदर झरना देख हम रूके बिना नहीं रह सके। पहाड़ों से बहकर आने वाला झरने का जल काफी शीतल तथा पारदर्शी था। हम थोड़ी देर वहाँ रूके, झरने की तस्वीरें ली तथा फिर वापस अपने रास्ते चल दिए।

                                            

          आबू रोड पहुँचकर हमने वाहनचालक को पूरे दिन का किराया 1500 रुपये चुकाया। रेलवे स्टेशन के पास ही एक रेस्तरां में हमने रात्रि का भोजन लिया। भोजन के बाद हम रेलवे स्टेशन पहुँचे। हमारी ट्रेन आने में लगभग 40 मिनट का समय बाकी था, अतः हम लोग प्रतीक्षालय में बैठकर ट्रेन का इंतजार करने लगे। नियत समय पर ट्रेन आयी तथा हम माउंट आबू की खूबसूरत यादें लिए अपने घर के लिए रवाना हो गए।

सोमवार, 19 अक्टूबर 2020

माउंट आबू की सैर (द्वितीय भाग)

माउंट आबू यात्रा  PART-2

 Mount Abu ,Rajasthan Tourism: Travel Guide Mount Abu 

 

सभी पाठकों को नमस्कार,

          हमारी माउंट आबू यात्रा के प्रथम दिवस के बारे में मैं yatrafiber के पिछले ब्लॉग में लिख चुकी हूँ, आगे की यात्रा के अनुभव मैं इस ब्लॉग द्वारा साझा कर रही हूँ....

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माउंट आबू यात्रा  PART-3

 

          अगले दिन यानि 19 सितम्बर, 2020 को सुबह 9 बजे हम घूमने के लिए बिल्कुल तैयार थे। सबसे पहले हम पास ही स्थित एक रेस्तरां में नाश्ता करने गए। यहाँ के खाने का स्वाद हमें और अधिक बेहतर लगा। नाश्ते के बाद हमने नक्की झील घूमने का निर्णय लिया। नक्की झील मात्र कुछ ही दूरी पर स्थित होने के कारण हम पैदल घूमते हुए वहाँ चले गए।

          नक्की झील के बारे में पौराणिक मान्यता है कि इसे देवताओं द्वारा राक्षसों से बचने के लिए अपने नाखूनों से खोदा गया था। प्रारंभ में इसे नख की झील ही कहा जाता था, समय के साथ इसका नाम बदलकर नक्की झील पड़ गया। नक्की झील के बारे में एक और कथा भी प्रचलित है। रसिया बालम नाम के एक गरीब व्यक्ति को यहाँ की राजकुमारी से प्रेम हो गया था। राजकुमारी भी उसे चाहती थी। राजा ने राजकुमारी से विवाह की शर्त रखी कि जो भी व्यक्ति एक रात में झील खोद देगा, उसी से राजकुमारी का विवाह किया जाएगा। रसिया बालम ने अपने प्रेम को पाने के लिए रातभर में नक्की झील खोद दी। परन्तु राजकुमारी की माता को गरीब रसिया बालम से नफरत थी। अतः उसने रसिया बालम के साथ धोखा किया व सुबह होने से पहले ही मुर्गे की बाँग लगा दी। रसिया बालम अपना प्रेम ना मिल पाने से बहुत दुखी हुआ और वहीं अपने प्राण त्याग दिए। रसिया बालम तथा राजकुमारी (कुंवारी कन्या) का मंदिर भी यहाँ स्थित है।

          चारों ओर ऊँची पर्वत श्रृंखलाओं से घिरी नक्की झील लगभग ढ़ाई किमी के दायरे में फैली हुई है। मीठे पानी की यह झील राजस्थान की सबसे ऊँची झील है। नक्की झील के चारों ओर पर्वत श्रृखलाएँ, पहाड़ों पर टॉड रॉक, नन रॉक जैसी चट्टानी आकृतियाँ, झील के बीच-बीच में उभरी चट्टानें व टापू, झील में तैरते सफेद जलीय पक्षी तथा पहाड़ों से झील में उतरते बादल विहंगम दृश्य उत्पन्न करते हैं। यहाँ सर्दियों के समय कई बार तापमान 0℃ से भी नीचे चला जाता है। ऐसे में नक्की झील का पानी पूरी तरह जम जाता है।

          नक्की झील में बॉटिंग करना बहुत ही रोमांचकारी है। यहाँ पैडल बॉट तथा शिकारा बॉट दोनों ही उपलब्ध हैं। सैलानी अपनी रूची के अनुसार कोई सी भी बॉटिंग कर सकते हैं। हमने पैडल बॉट को चुना। पैडल बॉट का शुल्क 200 रुपये प्रति व्यक्ति था तथा 30 मिनट का समय बॉटिंग के लिए दिया गया था। सबसे पहले हमने 'लाईफ जैकेट' पहनी, जिसका मूल्य 5 रुपये प्रति जैकेट था। बहुत से लोग लाईफ जैकेट पहनना पसंद नहीं करते हैं, परन्तु यदि किसी को तैरना नहीं आता है तो उसे यह अवश्य पहननी चाहिए। क्योंकि यदि दुर्भाग्यवश कोई दुर्घटना हो भी जाती है और नाव पलट जाती है तो यह लाईफ जैकेट व्यक्ति को डूबने से बचाती है। यही कारण है कि हमने स्वयं के साथ बच्चों के लिए भी लाईफ जैकेट ली। झील में बॉटिंग करते समय चारों ओर का नजारा इतना अच्छा लगता है कि समय कब बीत जाता है, पता भी नहीं चलता।

          झील के चारों तरफ रघुनाथ मंदिर, भारत माँ नमन स्मारक, गाँधी घाट तथा सुंदर फूलों वाले पौधों युक्त मार्ग स्थित है। झील के बीच में एक छोटा सा टापू स्थित है, जिसमें शिवलिंग स्थापित है। झील का पानी लगातार शिवलिंग का अभिषेक करता रहता है। यहाँ शिव परिवार भी स्थापित किया गया है। शिवलिंग के पास एक घंटी भी लगी हुई है। लोग बॉटिंग के साथ शिवलिंग के अभिषेक का भी लाभ पाते हैं। नक्की झील में उभरे एक छोटे से टापू पर फंव्वारा भी लगाया गया है। इस फंव्वारे से ऊँची जलधारा निकलती देख पर्यटकों का रोमांच और बढ़ जाता है।

          ओस भरी सुबह के उगते सूरज की किरणों से चमकते पानी वाली नक्की झील हो या दिन में बॉटिंग का आनंद लेते पर्यटकों से गुलजार नक्की झील, जलक्रीड़ाओं का लुत्फ उठाते सैलानियों की भीड़ से आबाद नक्की झील हो या रात को रंग-बिरंगी रोशनियों से घिरी शांत नक्की झील, इसका हर रूप देखने लायक है।

          नक्की झील के किनारे एक सुंदर बगीचा बना हुआ है। बगीचे में ऊँचे-घने वृक्षों के अलावा सजावटी पौधे भी लगाए गए हैं। बगीचे में लोगों के बैठने के लिए जगह-जगह बेंच बनी हुई हैं। इसके अलावा एक छतरी भी बनाई गई है, जिसमें लोग आराम करने के साथ फोटो खिंचवाते हुए भी दिख जाते हैं। हम भी थोड़ी देर वहीं आराम करने बैठ गए। इस बगीचे में बहुत से फोटोग्राफर भी उपलब्ध हैं, जिनसे झील के यादगार लम्हों को कैमरे में कैद करवाया जा सकता है। ये लगभग आधे-एक घंटे में फोटो का प्रिंट निकलवाकर दे देते हैं। इसका शुल्क 40-60 रुपये प्रति फोटो लिया जाता है। इसके अलावा पास ही स्थित दुकानों से किराये पर राजस्थानी वस्त्र लेकर उनमें भी फोटो खिंचवाई जा सकती है। इनका किराया 100-200 रुपये तक होता है। बगीचे में लकड़ी की तख्तियों पर रंगों से नाम लिखने वाले भी कई लोग मिल जाएँगे। लोग अपने घरों के लिए इनसे नाम की तख्तियाँ बनवाने के अलावा अपने प्रियजनों का नाम लिखवाकर उनके लिए उपहार के तौर पर भी इन तख्तियों को खरीदते हैं।

          बगीचे के एक कोने में बच्चों के लिए 'गेम जॉन' भी बना हुआ है। हम भी बच्चों के साथ वहाँ गए। वहाँ अलग-अलग तरह के कुछ झूले व खेल उपलब्ध हैं। दिनाया और काव्यांश वहाँ पहुँचते ही खुश हो गए और सभी झूलों के पास जाकर उनका मुआयना करने लगे। सभी खेलों के लिए अलग-अलग शुल्क निर्धारित है। बच्चों ने घोड़े पर बैठकर झूलने का आनंद लिया।

          

          नक्की झील के आसपास के क्षेत्र में काफी अच्छा बाजार भी स्थित है, जहाँ से लोग खरीददारी करना बहुत पसंद करते हैं। इस बाजार में विशेष तौर पर हस्तकला निर्मित सामग्री जैसे - वस्त्र, चादरें, पर्स, गहने, चप्पलें, खिलौने आदि मिलते हैं। हम लोगों ने भी यहाँ से हस्तकला निर्मित कुछ वस्त्र तथा चादरें खरीदीं। दोपहर हो गई थी और भूख भी लग रही थी, अतः पास ही एक रेस्तरां में जाकर हमने दोपहर का भोजन लिया। भोजन के पश्चात हमने एक निजी वाहन किया तथा घूमने निकल पड़े।

          सबसे पहले हम हनीमून पॉइंट देखने पहुँचे। हनीमून पॉइंट को अनादरा पॉइंट के नाम से भी जाना जाता है। वहाँ पहुँचते ही हमें आभास हो गया कि क्यों उस जगह का नाम हनीमून पॉइंट रखा गया है। पहाड़ के छोर पर खड़े होकर सामने दूर तक फैले हरे-भरे क्षेत्र की खूबसूरती, नीचे घाटी में बहते झरने से उत्पन्न कल-कल की ध्वनि, पक्षियों का कलरव, वृक्षों पर लंगूरों की उछल-कूद आदि सब दृश्य देखकर नवविवाहित जोड़ा तो क्या किसी भी व्यक्ति को यहाँ समय बीतने का अहसास ही नहीं होगा। यहाँ बैठकर ऐसा लगता है, मानो हम प्रकृति की गोद में ही आकर बैठ गए हों। शहरी जीवन की भागदौड़ भरी जिंदगी से कुछ समय निकालकर ऐसे शुद्ध प्राकृतिक वातावरण में आकर समय बिताना बहुत सुकूनभरा होता है। प्रकृति के करीब आकर सारा तनाव दूर हो जाता है तथा सकारात्मक ऊर्जा मिलती है। इसके पास ही एक थोड़ा ऊँचा पॉइंट और भी है, वहाँ से भी प्रकृति की सुंदर चित्रकारी को निहारा जा सकता है।


                                           

          

          इसके बाद हम माउंट आबू वन्यजीव अभयारण्य देखने पहुँचे। सन् 1960 में इसे अभयारण्य घोषित किया गया था। इस घने वन्यक्षेत्र में पेड़-पौधों की बहुत सी दुर्लभ प्रजातियाँ पाई जाती हैं। यह क्षेत्र भालुओं के लिए काफी अनुकूल है। यही कारण है कि यहाँ भालुओं की संख्या काफी अधिक है। माउंट आबू में आबादी क्षेत्र में भालुओं के आ जाने की घटनाएँ भी कई बार अखबार में छपती रहती हैं। भालू के अतिरिक्त सियार, जरख, लोमड़ी, सांभर, नीलगाय, चीतल, लंगूर, जंगली बिल्ली, तेंदुआ, जंगली सुअर आदि जंगली जानवर भी यहाँ बहुतायत में पाए जाते हैं। अभयारण्य में जीव-जंतुओं को किसी भी प्रकार की खाद्य सामग्री डालने पर पूर्णतः रोक है। इसके अतिरिक्त अभयारण्य में प्लास्टिक ले जाने पर भी रोक है। इस अभयारण्य में पक्षियों की भी बहुत सारी दुर्लभ प्रजातियाँ देखी जा सकती हैं। घने जंगल में इस तरह खुले घूमते वन्य जीवों को करीब से देखना काफी रोमांचित कर देने वाला अनुभव है।


          वहीं पर हम ट्रेवर्स टैंक देखने गए। ट्रेवर्स टैंक देखने के लिए टिकट का मूल्य 55 रुपये प्रति व्यक्ति है। इसके अलावा वाहन का शुल्क 210 रुपये था। पहाड़ों के बीच में बनाए गए इस खूबसूरत कृत्रिम तालाब का नाम ट्रेवर नाम के अभियंता(इंजीनियर) के नाम पर रखा गया है। यहाँ मगरमच्छ प्रजनन के उद्देश्य से मगरमच्छ का जोड़ा छोड़ा गया था, अब यहाँ मगरमच्छ के बच्चे भी देखे जा सकते हैं। तालाब के पास से एक पदमार्ग बनाया गया है। यहीं से कुछ दूरी पर उबड़-खाबड़ मार्ग से ऊपर जाकर वॉच टावर का अनुभव लिया जा सकता है। ऊपर एक छतरी भी लगाई गई है। ऊँचाई पर खड़े होकर चारों तरफ के मनोरम प्राकृतिक दृश्यों को निहारा जा सकता है। ऊपर खड़े होकर नीचे तालाब में तैरते मगरमच्छों को देखना भी एक अनोखा अनुभव है। कुछ समय ऊपर बीताकर हम नीचे आ गए। शाम होने वाली थी। माउंट आबू से दिखाई देने वाला सूर्यास्त का खूबसूरत नजारा विश्वप्रसिद्ध है। अतः हम लोग 'सनसेट पॉइंट' के लिए निकल गए।



          सनसेट पॉइंट से लगभग 1 किमी पहले ही वाहनों को रोक दिया जाता है। वहाँ से आगे या तो पैदल जा सकते हैं, या फिर घोड़े पर बैठकर भी जा सकते हैं। घोड़े का शुल्क 100 रुपये प्रति व्यक्ति है। इसके अतिरिक्त हाथगाड़ी भी उपलब्ध हैं। एक छोटी सी गाड़ी में दो लोगों के बैठने की जगह होती है, इसे वे लोग हाथों से धक्का देकर चलाते हैं। हाथगाड़ी का शुल्क भी 100 रुपये प्रति व्यक्ति है। हमने घोड़े का विकल्प चुना। बच्चे तो घोड़े पर बैठते ही खुश हो गए। दिनाया घोड़े पर बैठकर तालियाँ बजाते हुए कहने लगी, "दिनाया का घोड़ा टिक टिक टिक" तो काव्यांश पूरे रास्ते "लकड़ी की काठी, काठी पर घोड़ा" गाता रहा। मंजिल पर पहुँचकर भी दोनों बच्चे घोड़े से उतरना ही नहीं चाहते थे। उनकी इन बालसुलभ क्रीड़ाओं को देखकर हम लोग हँसे बिना नहीं रह पाए। खैर मुश्किल से उन्हें नीचे उतारा और एक ऐसी जगह जाकर हम बैठ गए, जहाँ से सूर्यास्त का नजारा अच्छी तरह से देखा जा सके।

          सूर्यास्त होने में कुछ समय बाकी था, अतः काफी लोग वहाँ बैठकर इंतजार कर रहे थे। सनसेट पॉइंट पर भी बहुत से फोटोग्राफर मिल जाएँगें, जिनसे सूर्यास्त के साथ फोटो खिंचवाई जा सकती है। चाय की चुस्कियों के बीच यह कयास लगाया जा रहा था कि मानसून के कारण छाए बादलों के बीच सूर्यास्त दिखेगा भी या नहीं। बादलों की स्थिति देखकर तो यही लग रहा था कि सूर्यास्त नहीं दिखने वाला, परन्तु उम्मीद पर दुनिया कायम है, शायद यही सोचते हुए सभी लोग वहाँ डेरा जमाए हुए थे। धीरे-धीरे साँझ ढ़ल रही थी और ढ़लती साँझ के साथ सूर्यास्त ना दिखने के आसार देख लोगों की भीड़ भी कम होती जा रही थी। खैर इतने इंतजार के बाद महज एक-दो मिनट के लिए ही सही, सूर्यदेव ने दर्शन दिए। डूबते सूरज को देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो बड़ा सा लाल गोला आसमान से उतरकर धरती की गोद में समा रहा है।

          सूर्यास्त होते ही अंधकार गहरा होना प्रारंभ हो गया। अतः हम लोग वापस लौट पड़े। वापस आते समय हम महिलाएँ बच्चों सहित हाथगाड़ी में बैठीं तथा वे दोनों मित्र पैदल घूमते हुए गाड़ी तक पहुँचे। गाड़ी से हम लोग वापस होटल पहुँचे। हमने वाहन चालक को पूरे दिन का किराया 1200 रुपये चुकाया। कुछ देर विश्राम करने के बाद रेस्तरां में जाकर रात्रि का भोजन लिया तथा फिर कुछ देर पास ही स्थित बाजार में टहलने के बाद अपने-अपने कमरों में जाकर सो गये।

                                                                                                                    क्रमशः..................................

रविवार, 11 अक्टूबर 2020

माउंट आबू की सैर (प्रथम भाग)

माउंट आबू यात्रा  PART-1

 

Mount Abu ,Rajasthan Tourism: Travel Guide Mount Abu

सभी पाठकों को नमस्कार,

          'माउंट आबू' राजस्थान का एकमात्र 'हिल स्टेशन', जिसका नाम सुनते ही लोग राजस्थान की मरूस्थली छवि से इतर हरियाली से भरपूर पहाड़ों से घिरे ठंडे वातावरण वाले पर्यटन स्थल की कल्पना करने लगते हैं। कुछ दिन पूर्व ही हमारा माउंट आबू भ्रमण पर जाना हुआ और आज yatrafiber पर मैं उसी के अनुभव आपसे बाँट रही हूँ। 

 

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 माउंट आबू यात्रा  PART-3

 

          राजस्थान के सिरोही जिले में स्थित माउंट आबू राजस्थान का एकमात्र ऐसा पहाड़ी नगर है, जहाँ राजस्थान की गर्म जलवायु का असर नजर नहीं आता, अपितु यहाँ का मनोरम वातावरण इसे बाकी राजस्थान से अलग बनाता है। 16 सितम्बर, 2020 को बातों-बातों में अकस्मात् ही हमारी माउंट आबू भ्रमण की योजना बन गई। मेरे पति के एक मित्र भी काफी दिन से सपरिवार माउंट आबू जाने के इच्छुक थे। जब उनसे इस विषय में बात की गई तो वे भी तुरन्त राजी हो गये। मैं, मेरे पति, हमारी दो वर्षीय पुत्री दिनाया, पति के मित्र, उनकी पत्नी उनका दो वर्षीय पुत्र काव्यांश, कुल मिलाकर हम 6 लोग माउंट आबू भ्रमण पर जाने वाले थे। जयपुर से आबू रोड तक जाने के लिए हमने रेलमार्ग को चुना तथा 18 सितम्बर, 2020 के लिए राजधानी एक्सप्रेस में आरक्षण करवा दिया।

          वायुमार्ग से माउंट आबू जाने के लिए नजदीकी हवाईअड्डा उदयपुर है, जो कि माउंट आबू से लगभग 185 किमी दूर स्थित है। उदयपुर से माउंट आबू के लिए सीधी बस उपलब्ध हैं, अन्यथा निजी वाहन भी किया जा सकता है। रेलमार्ग से माउंट आबू जाने के लिए आबू रोड नजदीकी रेलवे स्टेशन है, जो कि माउंट आबू से लगभग 27 किमी की दूरी पर स्थित है। आबू रोड से बस द्वारा या निजी वाहन करके माउंट आबू पहुँचा जा सकता है। जयपुर, उदयपुर जैसे शहरों से माउंट आबू सीधी बस सेवा द्वारा भी जुड़ा हुआ है।

          18 सितम्बर, 2020 को रात्रि 1.00 बजे हमारी ट्रेन की रवानगी का समय था। अतः 17 सितम्बर, 2020 को रात्रि 11.30 बजे हमने कैब बुक की तथा रास्ते में मित्र परिवार को लेते हुए लगभग घंटेभर की यात्रा के पश्चात रात्रि 12.30 बजे हम जयपुर जंक्शन रेलवे स्टेशन पहुँचे। नियत समय पर ट्रेन आई तथा हमने टी.टी. महोदय को टिकट दिखाकर अपनी-अपनी सीट ले ली। ट्रेन सुबह 6.15 बजे आबू रोड रेलवे स्टेशन पहुँचने वाली थी। अतः हमने अलार्म लगाया तथा नींद की आगोश में चले गये।

          ट्रेन बिल्कुल नियत समय पर आबू रोड रेलवे स्टेशन पहुँची। आबू रोड रेलवे स्टेशन के बाहर बहुत से निजी वाहन उपलब्ध रहते हैं, जिनके द्वारा माउंट आबू जाया जा सकता है। हमने भी एक निजी वाहन किया, जिसका किराया 900 रुपये था। आबू रोड से बाहर निकलते ही ऊँचे-ऊँचे पहाड़ दिखना प्रारंभ हो जाते हैं। हरे-भरे घने जंगल युक्त पहाड़ों पर घुमावदार सड़क, इस सड़क के एक ओर ऊँचे पहाड़ तथा दूसरी ओर गहरी घाटी थी। गाड़ी की खिड़की से आने वाली ठंडी हवा मन को सुकून पहुँचा रही थी। यहाँ रास्ते में लंगूरों के झुंड के झुंड देखे जा सकते हैं, जिन्हें किसी भी प्रकार की खाद्य सामग्री डालने पर सख्त मनाही है। दिनाया तो शीतल हवा का आनंद लेते हुए सो चुकी थी, परंतु काव्यांश लंगूरों को देखकर बहुत खुश हो रहा था। गहरी घाटियाँ, पहाड़ों की ऊँची चोटियाँ, चारों ओर फैली हरियाली, घुमावदार सड़क, बीच-बीच में आते छोटे-छोटे कई झरने, पहाड़ों पर लहराते-इठलाते रूई के फाहों से प्रतीत होते बादल, सब कुछ मिलाकर एक बहुत सुंदर तस्वीर से मालूम हो रहे थे। लगभग एक घंटे के सुहावने सफर के बाद हम माउंट आबू पहुँचे।

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          माउंट आबू में हम नक्की झील के पास ही एक होटल में रूके। कमरों का किराया 2500 रुपये प्रति दिन था। दोनों कमरे छत पर बने हुए थे, जहाँ से सामने फैली हुई नक्की झील का शानदार नजारा दिखाई देता था। होटल के कमरे काफी सुविधाजनक थे। बाथरूम में सुबह दो घंटे के लिए गरम जल की भी व्यवस्था थी। हमने सामान अपने-अपने कमरे में रखा और नहा-धोकर तैयार हो गए।

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          नक्की झील के आस-पास के क्षेत्र में, पोलो मैदान के चारों तरफ बहुत से होटल स्थित हैं, जहाँ पर्यटक अपनी सुविधानुसार रूक सकते हैं, इनमें सस्ते से लेकर महँगे (5 - सितारा) होटल तक सभी उपलब्ध हैं। माउंट आबू में कई धर्मशालाएँ  भी उपलब्ध हैं। इसके अलावा वहाँ गुरूद्वारा, जैन धर्मशाला भी स्थित हैं, जहाँ रूका जा सकता है। साथ ही साथ वहाँ के बहुत से निवासी होटल की बजाय काफी सस्ती दर में अपने घर में सैलानियों को रहने की सुविधा देते हैं।

          होटल के बाहर कई रेस्तरां मौजूद हैं, जहाँ नाश्ते व भोजन का आनंद लिया जा सकता है। हमने भी पास ही स्थित एक रेस्तरां में नाश्ता किया। यहाँ के रेस्तरां में उत्तर भारतीय, दक्षिण भारतीय, पंजाबी, राजस्थानी विशेष ( दाल, बाटी, चूरमा) तथा गुजराती सभी प्रकार का नाश्ता व भोजन उपलब्ध है। गुजराती थाली तो विशेष तौर पर सभी रेस्तरां में मिलेगी, क्योंकि यहाँ आने वाले सैलानियों में गुजराती लोगों की संख्या काफी अधिक होती है।

          माउंट आबू घूमने के लिए रोडवेज बस उपलब्ध है, जो कि पूरे दिन में सैलानियों को माउंट आबू के सभी मुख्य पर्यटन बिंदु दिखाती है। कुछ होटल तथा निजी बसों वाले भी इस तरह की सुविधा देते हैं। इसके अलावा अगर कोई दुपहिया वाहन पसंद करता है तो माउंट आबू में दुपहिया वाहन किराये पर उपलब्ध हैं। इनका किराया जब पर्यटन अच्छा चल रहा हो, तब कुछ अधिक तथा जब पर्यटन कम चल रहा हो तब कम होता है। कुल मिलाकर यह किराया 300 से 1000 रुपये के बीच होता है। पेट्रोल का खर्चा किराए पर वाहन लेने वाले व्यक्ति का स्वयं का होता है। अगर कोई निजी वाहन चाहता है, तो वो भी यहाँ उपलब्ध हैं। गाड़ी का किराया इस बात पर निर्भर करता है कि पर्यटक कौन-कौन से पर्यटन बिंदुओं पर जाना चाहते हैं। एक तो मानसून के कारण कभी भी बारिश आने की संभावना और दूसरा हमारे साथ छोटे बच्चे भी थे, अतः हमने निजी वाहन करके घूमने का निर्णय लिया।

          माउंट आबू धार्मिक दृष्टि से जैन धर्म के लिए विशेष स्थान रखता है। यहाँ 11वीं से 13वीं सदी में निर्मित देलवाड़ा के जैन मंदिर स्थित हैं, जो कि मंदिर निर्माण कला का अद्भुत रूप पेश करते हैं। देलवाड़ा मंदिर वास्तव में 5 मंदिरों का समूह है। इनमें से सबसे प्राचीन 'विमल वसाही मंदिर' है, जो कि जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ को समर्पित है। इस मंदिर में भगवान आदिनाथ की आँखें असली हीरे की बनी हुई हैं। इस मंदिर का निर्माण पूर्ण रूप से सफेद संगमरमर को तराशकर किया गया है। इसके अतिरिक्त यहाँ लूना वसाही मंदिर, पित्तलहार मंदिर, श्री पार्श्वनाथ मंदिर, श्री महावीर स्वामी मंदिर आदि मंदिर स्थित हैं। इन मंदिरों में हिंदू देवी-देवताओं की भी प्रतिमाएँ उकेरी गई हैं। संगमरमर को बहुत बारीकी से तराशकर इतनी सुंदर कलाकारी की गयी है कि देखने वाले लोग आश्चर्यचकित रह जाते हैं। हॉल, गर्भगृह, मूर्तियाँ, मंडप, खंंभे सभी शिल्पकला का उत्तम रूप प्रस्तुत करते हैं। बाहर से सादगी युक्त तथा अंदर से विशेष कलाकारी वाले ये मंदिर कोरोना महामारी के कारण अभी बंद थे, अतः हमें बाहर से ही दर्शन करके संतोष करना पड़ा।

          देलवाड़ा के जैन मंदिरों के पश्चात हम राजस्थान तथा अरावली पर्वतमाला की सबसे ऊँची चोटी गुरुशिखर को देखने निकल पड़े। माउंट आबू से गुरुशिखर की दूरी लगभग 15 किमी है। माउंट आबू में एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने वाले सभी मार्ग बहुत सारे मोड़ लिए हुए तथा हरे-भरे वृक्षों से युक्त इतने सुंदर हैं कि पता ही नहीं चलता कब सफर पूरा होकर मंजिल आ जाती है। गुरुशिखर की ओर जाते हुए रास्ते में तेज बारिश शुरू हो गई, जिसने मार्ग को और भी रोमांचकारी बना दिया। गुरुशिखर पहुँचने के बाद भी बारिश का होना जारी रहा। अतः हमने कुछ देर गाड़ी में ही बैठे रहने का निर्णय लिया। गाड़ी में बैठे-बैठे हमने साथ लायी गयी मिठाई, नमकीन, मूँगफली वगैरह का नाश्ता किया। वैसे यहाँ कुछ छोटी-छोटी दुकानें भी स्थित हैं, जहाँ चाय-नाश्ता किया जा सकता है।

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          गुरुशिखर की ऊँचाई 1722 मीटर है। यहाँ पर भगवान विष्णु के रूप गुरू दत्तात्रेय का गुफा मंदिर स्थित है। मंदिर में दर्शन करने हेतु सीढ़ियों द्वारा कुछ दूर पैदल चलना पड़ता है। बारिश के कारण वहाँ कुछ लोग किराये पर छतरी भी उपलब्ध करा रहे थे। कुछ ही मिनटों में बारिश पूरी तरह रूक गई और हमने सीढ़ियाँ चढ़ना प्रारंभ किया। सीढ़ियों के किनारे भी कुछ खाने-पीने की व हस्त निर्माण सामग्री की दुकानें थीं। यहाँ की मैगी काफी प्रसिद्ध है, जो कि चाय-नाश्ते की हर दुकान पर उपलब्ध है। ऊपर पहुँचकर हमने मंदिर में दर्शन किए। ऊँची चोटी पर शांत व सुरम्य वातावरण में स्थित यह मंदिर अंदर से संगमरमर से निर्मित है। मंदिर से चोटी के सबसे ऊँचे भाग पर पहुँचने के लिए भी सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। सबसे ऊँचे स्थान पर भी एक छोटा सा मंदिर बना हुआ है। यहाँ पीतल का बड़ा सा घंटा भी लगा हुआ है, जो यहाँ आने वाले पर्यटकों के लिए आकर्षण का मुख्य केन्द्र है। लोग इस घंटे के पास खड़े होकर फोटो खिंचवाना बेहद पसंद करते हैं। अरावली की सबसे ऊँची चोटी पर खड़े होकर माउंट आबू की खूबसूरती को निहारना बहुत शानदार अनुभव है। मौसम के बदलते रूपों को यहाँ भली प्रकार अनुभव किया जा सकता है। एक पल धूप खिली रहेगी तो अगले ही पल आसमान में बादल छा जाएँगे। कभी बादलों का समूह आपको छूकर निकल जाएगा तो कभी चारों ओर छाई धुंध में आसपास का क्षेत्र भी स्पष्ट दिखाई देना बंद हो जाएगा। आधे घंटे का समय वहाँ बिताकर हम वापस आ गये।




          गुरुशिखर से वापस आते समय हम 'शूटिंग पॉइंट' पर रूके। यहाँ से आसपास के पहाड़ों व घाटियों का बहुत सुंदर नजारा दिखाई देता है। यही कारण है कि यहाँ बहुत सी फिल्मों की शूटिंग की गई है और इसी कारण इसका नाम शूटिंग पॉइंट पड़ा है। काफी लोग शूटिंग पॉइंट पर प्राकृतिक नजारों के बीच अपनी तस्वीरें लेने में व्यस्त थे। हमने भी बहुत सी तस्वीरें लीं तथा कुछ देर वहीं बैठकर शांत व सुंदर प्रकृति का आनंद लिया। शाम हो गई थी और सूर्यदेव अस्त होने को थे। यहाँ हमें डूबते सूर्य का खूबसूरत नजारा देखने का मौका मिला। बादलों के बीच टँगे लाल-नारंगी सूरज की किरणों से सिंदूरी होती शाम का यह सुंदर दृश्य इतना मनमोहक होता है कि जब तक सूर्य पूर्णतः अस्त होकर अंधकार ना फैलने लगे, तब तक यहाँ से उठने की चाहत बिलकुल नहीं होती है।




          सूर्यास्त के बाद हम शूटिंग पॉइंट से अचलगढ़ पहुँचे। अचलगढ़ गाँव में अचलगढ़ का किला स्थित है, जो कि वर्तमान में खंडहर सा हो गया है। हम किले में नहीं गए। अचलगढ़ गाँव में ही अचलेश्वर महादेव का बहुत प्राचीन मंदिर स्थित है। मंदिर के द्वार पर दोनों ओर गज-प्रतिमाएँ लगी हुई हैं। शिव मंदिरों में मुख्यतः शिवलिंग स्थापित होता है, परन्तु इस मंदिर में शिवजी के अंगूठे के निशान की पूजा होती है। कहा जाता है कि जब यहाँ की भूमि डोल रही थी, तब लोगों की पुकार पर शिवजी ने यहाँ अपने पैर का अंगूठा रखकर भूमि को स्थिर किया था। अंगूठे के उसी चिह्न की पूजा यहाँ की जाती है। यहाँ शिव परिवार को भी स्थापित किया गया है। मंदिर में शिवजी के प्रिय वाहन नंदी की पीतल की बड़ी सी मूर्ति भी स्थापित की गयी है। इतने प्राचीन मंदिर की दीवारों व खंभों पर पत्थरों को तराशकर उकेरी गई आकृतियों को देखकर आश्चर्य होता है कि कैसे उस समय इतना अद्भुत शिल्पकार्य किया गया होगा, जो कि आज भी असंभव सा प्रतीत होता है। मंदिर के बाहर एक छोटा सा बाजार भी है, जहाँ हस्तकला द्वारा निर्मित सामग्री के अलावा अन्य कई वस्तुएँ भी उपलब्ध हैं।

          अचलेश्वर महादेव जी के दर्शन करने के पश्चात हम होटल वापस आ गए। हमने गाड़ी के पूरे दिन के किराए के रूप में 1000 रुपये का भुगतान किया। रात्रि के 8.30 बज रहे थे, अतः सुबह वाले रेस्तरां में ही हमने रात्रि का भोजन लिया। दिनभर घूमने-फिरने से थकान हो रही थी, अतः हम लोग सोने चले गए।

                                                                                                                           क्रमशः.........................